मंडेला का कर्ज

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1984 की सिख विरोधी हिंसा हो या 2002 में गुजरात में हुए दंगे या फिर इन दोनों अंतरालों के बीच, और इनके पहले-बाद भी फूटते दंगे- हर जगह जैसे यही नीयत दिखाई देती है कि इंसाफ के तकाजों को तब तक नजरअंदाज किया जाए जब तक इसकी आवाज घुट कर दम न तोड़ दे और लोग नाइंसाफी को अपनी किस्मत मान कर इसे भूलने को मजबूर न हो जाएं. बल्कि गुजरात में जिन नरेंद्र मोदी को इस इंसाफ की जवाबदेही लेनी चाहिए थी, वे सीना ठोक कर कह रहे हैं कि उनके राज्य में 10 साल में दंगे नहीं हुए. वे अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी हैं.

जाहिर है, मंडेला हमारे आदर्श तो हैं, लेकिन हमारा यथार्थ नहीं. हमारा यथार्थ नरेंद्र मोदी हैं जो शायद यह मानते हैं कि जख्म पुराने पड़ कर सूख जाते हैं, उन पर विकास की पन्नी चिपकाई जा सकती है, उन्हें भूला जा सकता है.

जबकि सच्चाई यही है कि कोई जख्म दबाने से ठीक नहीं होता. ऐसी कई दवाएं होती हैं जो शारीरिक विकारों को शरीर के भीतर ही दफन करने का काम करती हैं. लेकिन ये विकार दूसरे- और कहीं ज्यादा खतरनाक- ढंग से बाहर आते हैं. 1984 की सिख विरोधी हिंसा हो, 1992 का बाबरी ध्वंस या 2002 की गुजरात हिंसा, ये सब किसी न किसी रूप में नई नफरत और नई विकृतियों की शक्ल लेकर सामने आते हैं. पिछले 20 बरस में ऐसे दंगों के समांतर जो आतंकवाद हमने झेला है वह इसी विकार की संतान है.

वैसे मंडेला को हमने सिर्फ सांप्रदायिक मोर्चे पर नहीं छला है, जातिगत भेदभावों के मोर्चे पर भी नाकाम किया है. भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के अलावा दलितों और आदिवासियों की जो हालत है वह बताती है कि हमारे संविधान ने भले गांधी के आदर्शों को अंगीकार किया, हमारे समाज में वह नैतिक और राजनीतिक दृढ़ता आनी बाकी है जो हर तरह की गैरबराबरी के विरुद्ध खड़ी हो सके. मंडेला ने कहा था कि भारत ने दक्षिण अफ्रीका को मोहनदास दिया, दक्षिण अफ्रीका ने उन्हें महात्मा बनाकर लौटाया. मंडेला का यह ऋण हम तभी चुका सकते हैं जब अपने समाज में कई महात्मा पैदा करें जो हमारे यहां हर तरह के भेदभाव के विरुद्ध लड़ने को तैयार हों.

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