भूख का सिस्टम

मस्तिष्क में भूख तथा तृप्ति को महसूस करने के ये केंद्र एक जटिल संतुलन में काम करते हैं. यहां प्रश्न यह भी उठता है कि इन केंद्रों को कंट्रोल करने का खटका किसके हाथ है?  कौन है जो इनको चलाता, बंद करता, कम-ज्यादा करता है? सच तो यह है कि यह रहस्य पूरी तरह से खुला ही नहीं है. शरीर में बहुत से हार्मोंस हैं. मेटाबोलिक पदार्थ हैं, तंत्रिकाएं हैं, मस्तिष्क के अन्य हिस्से भी हैं. कंट्रोल का काम ये सब मिलकर करते हैं. इतने कंट्रोल हैं साहब, तब तो बहुत छीनाझपटी का माहौल रहता होगा हाईपोथैलेमस के आसपास! कोई खटका दबा रहा है तो कोई उलटा या सीधा घुमा रहा है. पर ऐसा नहीं होता है. सब नियम से चलता है. भगवान के बनाए सिस्टम में यही एक बात मनुष्य से अलग है कि उसमें एक जटिल अनुशासन होता है. हर कंट्रोल सिस्टम को पता है कि उसे क्या तथा कितना कंट्रोल करना है. इसीलिए कोई आपाधापी नहीं होती. हां, जब होती है तब शरीर बीमार हो जाता है.

हाईपोथैलेमस को अपनी तरह से कंट्रोल करने वाले ये सारे हार्मोन आदि कहां से आते हैं? दरअसल ये विभिन्न पदार्थ शरीर में विभिन्न स्थानों से पैदा होकर रक्त में प्रवेश करते हैं. मैं इनके तकनीकी  नाम लेकर कोई भ्रम नहीं पैदा करूंगा. कठिन-कठिन से नाम लेकर पाठकों पर अपने ज्ञान का आतंक पैदा करने का सुनहरा अवसर छोड़ रहा हूं. ऐसा समझ लें कि कुछ पदार्थ आमाशय में बनते हैं, कुछ छोटी आंत में, कुछ पैंक्रियाज आदि में. कुछ तो आपकी चर्बी से पैदा होते हैं. फिर पेट खाली होने पर अमाशय तथा आंतें पिचक जाती हैं. अंदर से इस प्रकार एक संदेश वेगस नामक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क को भेजा जाता है कि साहब यहां पेट खाली पड़ा है, तनिक इस आदमी को याद तो दिलाओ कि कुछ खाए. भूख लगना आपको यह याद दिलाता है कि पेट खाली है.

भूख पर असर डालने वाले ये सारे पदार्थ तथा तंत्रिकाएं दो तरह से काम करते हैं- या तो ये हाईपोथैलेमस का भूख बढ़ाने वाला खटका दबा देते हैं या फिर तृप्ति पैदा करने वाला. इधर मन भी अपना काम करता रहता है. मन के अलावा फिर आपकी आदतें, भेजना को लेकर बचपन से आजतक का सांस्कृतिक पारिवारिक माहौल भी अपना असर डालते हैं. मां की बनाई कोई पसंदीदा डिश क्योंकर जीवनभर में कभी-भी आपकी भूख बढ़ा देती है? …तो ये सारे असर हाईपोथैलेमस पर पड़ते हैं जो भूख पैदा करता है या भूख मारता है.

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