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जिसके दर्शन मात्र से पाप कटते हैं
श्रद्धा और आस्था से ओत-प्रोत हजारों व्यक्ति हर साल नर्मदा जी की कठिन यात्रा पर निकलते हैं। वही नर्मदा जिसके बारे में हिन्दुओं में मान्यता है कि उसके दर्शन मात्र से पाप कट जाते हैं। नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहलू को समझना हो तो साहित्यकार अमृतलाल वेगड़ को पढि़ए। 90 साल के वेगड़ 1977 से कई दफा नदी की परिक्रमा कर चुके हैं और इस विषय पर उन्होंने गुजराती और हिंदी में कई सुन्दर किताबें लिखी हैं। अपनी जिन्दगी का लगभग एक-चौथाई समय उन्होंने इसके किनारे की उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर पैदल चलते हुए गुज़ारा हैं।
अगर वेगड़ के यात्रा वृतांत को पढने का आपके पास समय नहीं, तो कोई बात नहीं। आप यह छोटा सा किस्सा पढ़ लें। सचमुच का किस्सा।
मध्य प्रदेश के मालवा में कुछ जगहों के नाम इतने संगीतात्मक हैं कि मन में सितार की तरह बज उठते हैं…….. गंधर्वपुरी, तराना, ताल, सोनकच्छ। इन्ही में से एक है क्षिप्रा, इंदौर के पास का एक कस्बा। उस कस्बे के पास से गुजरते हुए पिछले दिनों एक पत्रकार मित्र को एक अनोखा नर्मदा यात्री मिला। भगवा कपड़े पहने उस यात्री की उम्र का अंदाज लगाना मुश्किल था। उसने एक टूटी साइकिल पर 2,600 किलोमीटर लम्बी परिक्रमा करने की ठानी थी। नितांत अकेले। उसकी सारी जमा-पूँजी के साथ-साथ उस साइकिल पर सवार था एक रोबीला जर्मन शेफर्ड कुत्ता। तमाम सामान से लदी फदी उस साइकिल को पैडल मारने में वह अनोखा तीर्थ यात्री भरी दोपहरी में हांफ रहा था। पर उसे यह गंवारा नहीं था कि अपने खास मित्र को वह पैदल चलने कहे।
नर्मदा की पवित्र यात्रा पर कुत्ता क्यों? ‘मेरे पीछे घर पर कौन उसे देखेगा,Ó उसका मासूम जवाब था।
इन दो अनोखे तीर्थ यात्रियों के किस्से से मालूम पड़ता है कि नर्मदा के किनारे बसने वाले लोगों के जीवन में इस नदी का और उसकी परिक्रमा का क्या महत्व हैं। वह कुत्ता और उसका मालिक घर-परिवार से दूर महीनों नर्मदा के किनारे गुजारेंगे। मांग कर खाएंगे। उपले और जलावन इकठ्ठा कर अपना खाना खुद पकाएंगे। जहाँ आश्रय मिला, सो जायेंगे और अगर जगह नहीं मिली तो तारों की छाँव है ही। और साथ में करेंगे नर्मदा मैय्या की पूजा।
नर्मदा की महत्ता इस इलाके में इसलिए है क्योंकि इसके आँचल में पलने वाले लाखों लोगों के लिए यह नदी सदियों से भरण-पोषण का जरिया रही है। इस इलाके की यह एकमात्र नदी है जो कभी सूखती नहीं है। मध्य प्रदेश में अमरकंटक की पहाडिय़ों से निकल कर 1,300 किलोमीटर का सफर तय कर नर्मदा जी जब भरुच (गुजरात) के पास अरब सागर में मिलती हैं तो रास्ते में जीवन बांटते चलती हैं। इसका पानी न केवल मनुष्यों और पशु-पक्षियों के पीने के काम आता है, बल्कि खेतों को सींचता है, कल-कारखाने चलाता है और बिजली पैदा करता है। हजारों मछुआरों के परिवार इसी नदी के सहारे पलते हैं। पूरे इलाके के असंख्य नदी-नाले, तालाब, कुंए और टूयुबवेल इसीकी बदौलत जिंदा रहते हैं।