बैंक अफसरों ने आरबीआई को जिमेदार ठहराया

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2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकारी बैंकों में एनपीए के कारणों का अध्ययन किया गया। इसका सबसे बड़ा कारण विकास के नाम पर दिए गए कजऱ् इसके ‘मैक्रो इकोनोमिक Ó और ‘रेगुलेटरीÓ इसके मुख्य कारण रहे। भ्रष्टाचार और दुराचार इसके मुख्य मुद्दे नहीं थे। 2008 में यूरोप और अमेरिका के निजी बैंकों को सरकार ने धन देकर बचाया। जिनको सरकारी सहायता ने बचाया उनके कुछ ऐसे नाम भी है जो व्यापार की दुनिया में बहुत बड़ा नाम रखते हैं। 2007-08 को यह संकट सरकारी बैंकों या भ्रष्टाचार की वजह से नहीं अपितु निजी बैंकों के लालच की वजह से आया था।

यह स्वामित्व की बात नहीं पर ‘रेगुलेशनÓ की गुणवत्ता, रिपोर्टिंग प्रबंधन की है जो बैंकिग दक्षता को बढ़ता है। अपने देश में भी निजी क्षेत्र के बैंक ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और बैंक ऑफ राजस्थान को भी राज्य की सहायता से बचाया गया था। कारण स्पष्ट है बैंकिंग कोई स्टील या होटल का धंधा नहीं है। एआईबीओसी के अनुसार देश में बैंकिंग ‘बेलआऊटÓ काफी आसान है। आईएमएफ के मुताबिक 1970 से 2011 के बीच ‘बेलआऊट’ ‘जीडीपी’ का 6.8 फीसद था। इमरजिंग कोस्ट जीडीपी का 10 फीसद थी। इसी अवधि में भारत में बैंकों का ‘बेलआऊटÓ खर्च मात्र एक फीसद था जो किसी गिनती में नहीं आता।

जो लोग बैंकों के निजीकरण पर ज़ोर दे रहे हैं उनका तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर सरकार का नियंत्रण रहता है और राजनैतिक लोग उसका पूरा लाभ उठाते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निश्चित तौर पर सरकारी प्रभाव में रहते हैं और कारपोरेटस भी उनमें जोड़-तोड़ कर लेते हैं। इनसे बैंकों की प्रणाली में आई कमियों का लाभ कुछ भ्रष्ट बैंक अधिकारियों के साथ तालमेल बिठा कर लालची व्यापारी उठा लेते हैं। बैंकों की इस प्रकार की कमियों को दूर करने की ज़रूरत है न ही उनके निज़ीकरण की। मंदी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की विफलता थी। 2008 की मंदी के अलावा भी बैंकों में हुई गड़बड़ी के कारण बैंकों पर ताले पड़ गए थे।

सरकार क्या करे?

निजीकरण बैंको को पेश आ रही समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। यह सत्य है कि सरकारी बैंकों के काम के तरीके वगैरा में भारी बदलाव लाने की ज़रूरत है। सरकार को पूरे बैंकिंग सैक्टर को फिर से खड़ा करने के लिए गंभीरता से सोचना चाहिए। निजीकरण निश्चित रूप से कोई रामबाण नहीं है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही क्यां?

यह बताना ज़रूरी है कि 1955 में जब सरकार ने इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर उसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का नाम दे दिया गया था, तभी से बैंक व्यवस्था का महत्व बढ़ गया था। जब 1969 और 1970 में राष्ट्रीयकरण हुआ तो इसे और ताकत मिल गई।

सरकारी बैंकों का आधार सिकुडऩे के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था में इनका महत्व बना हुआ है। इन बैंको की दूर दराज तक फैली शाखाओं के ज़रिए इनकी पहुंच देश की सबसे ज़्यादा आबादी तक है। सरकार के सरकारी एजेंडे की रीढ़ की हड्डी भी ये बैंक है। जनधन योजना के मामले में भी ये बैंक अग्रणी हैं।

किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में बैंकों की भूमिका मात्र बैंक की ही नहीं है बल्कि वहां के विकास में भी इनका बड़ा योगदान है। ग्रामीण लोगों लिए बीमा और वित्तीय शिक्षा जैसे कार्य भी यही बैंक कर रहे हैं। यह स्पष्ट है कि देश में सरकारी बैंकों का महत्व कम नहीं किया जा सकता। भारतीय अर्थव्यवस्था में एक मज़बूत बैंकिंग व्यवस्था का होना अति आवश्यक है। यही देश के विकास की रीढ़ की हड्डी है।