बे-सबक तैयारी का हादसा!

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इन सबके बीच गिरधारी नायक (1983 बैच) (डीजी जेल) पीछे ही छूट गए. जबकि नायक को न केवल नक्सल ऑपरेशन का लंबा अनुभव है, बल्कि उन्हें एक सख्त, ईमानदार और अनुशासित अधिकारी के रूप में भी देखा जाता है. डीजीपी का पद भी पुलिस मुख्यालय में लंबे समय से चल रही राजनीति का शिकार हो गया. राज्य सरकार पीएचक्यू को एक अदद डीजीपी भी नहीं दे पाई है. जबकि राज्य के लिए यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है.

इस पूरी घटना के संदर्भ में यह बात भी ध्यान देने लायक है कि इसके दो दिन पहले से कांकेर जिले में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों की तलाश में बड़ा ऑपरेशन चला रखा था. बीएसएफ और जिला पुलिस बल के जवान संयुक्त रूप से दो दिन से दुर्ग और राजनांदगांव की सीमा से लगे इलाकों में माओवादियों की तलाश कर रहे थे. यह इलाका महाराष्ट्र से सटा हुआ है. इसी बीच नक्सलियों ने झीरम घाटी में वारदात को अंजाम दे दिया. पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) के एक वरिष्ठ अफसर की मानें तो यह नक्सलियों की पुरानी रणनीति है. वे दूसरी तरफ ध्यान खींचने के लिए हमले करते हैं.

नक्सली हमले में घायल जवान फोटोः एएफपी

पुलिस को थी नक्सलियों के मूवमेंट की जानकारी
झीरम घाटी और आस-पास के इलाके में नक्सलियों के मूवमेंट की सूचना पुलिस को पांच मार्च से ही मिलनी शुरू हो गई थी. इसे सीआरपीएफ के आला अफसरों से भी शेयर किया गया था. इंटेलीजेंस ब्यूरो ने भी राज्य सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में सात मार्च को एक बड़े नक्सल हमले की आशंका जताई थी. पीएचक्यू की मानें तो पांच मार्च को ही जगदलपुर एसपी अजय यादव और सुकमा एसपी अभिषेक शांडिल्य को नक्सलियों के मूवमेंट की सूचना भेज दी गई थी. सूचना में पुलिस अफसरों को अलर्ट किया गया था कि ओडीशा सीमा से नक्सलियों का दल झीरम घाटी और उससे लगे क्षेत्रों में घुसा है. दूसरा अलर्ट छह मार्च को जारी किया गया. इसमें पुलिस इंटेलीजेंस ने बताया था कि माओवादी भगत उर्फ पंकज उर्फ गगन्ना अपने साथियों के साथ उनागुर, कालेंग, गुप्तेश्वर इलाकों में घूमता हुआ देखा गया है. इस दौरान तोंगपाल के प्रतापिगिरी में माओवादी सुखराम और उसके साथियों को देखा गया था. नक्सली कमांडर जगदीश उइके को भी सुकमा और कटेकल्याण इलाके में देखा गया था. पुलिस के सूचना तंत्र ने पहले ही बता दिया था कि नक्सली झीरम घाटी के पास चल रहे सड़क निर्माण के कार्य पर नजर रख रहे हैं. नौ मार्च को पीएचक्यू ने फिर से दोनों जिलों के पुलिस अधीक्षकों को सूचना भेजकर सतर्क रहने के निर्देश दिए थे. यह अलर्ट भी किया गया था कि भगत उर्फ गगन्ना 150 से अधिक साथियों के साथ तोंगपाल में देखा गया है और ये लोग सुरक्षा बलों पर हमला कर सकते हैं. कहा जा रहा है कि इस घटना को अंजाम देने के लिए माओवादियों के मलकानगिरी (ओडीशा) से छत्तीसगढ़ पहुंचने की सूचना भी पुलिस मुख्यालय को पहले ही मिल चुकी थी.

फिलहाल इस घटना की जांच भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) करेगी. लेकिन जब पिछली जांचों के सबक ही अब तक लागू नहीं हो पाए उस स्थिति में यह कहना मुश्किल होगा कि इन नतीजों से सुरक्षा बलों को वास्तव कितनी सुरक्षा मिल पाएगी.

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बीते 10 साल में 2,129 लोगों की मौत

इंस्टीट्यूट ऑफ कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस साल में छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा में 2,129 लोग मारे गए हैं. इनमें सुरक्षा बल के जवानों और आम नागरिकों की मौत का आंकड़ा 1,447 है. पिछले चार साल मे नक्सली हमलों में तेजी आई है. वर्ष 2011 के बाद माओवादियों ने अपने पुराने मिथक तोड़ते हुए बीते चाल साल में राजनेताओं और आम लोगों को भी अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है. 2011 से लेकर 2014 तक माओवादियों ने कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है. वहीं साउथ एशिया टैरोरिज्म पोर्टल से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक माओवादी हिंसा के कारण 2005 से 2012 के बीच छत्तीसगढ़ में कुल 1,855 मौतें हुई हैं. इनमें 569 आम नागरिकों, सुरक्षा बलों के 693 जवान और 593 माओवादियों की मौत शामिल है.

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