बिन धन, लोकलुभावन!

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इस मसले पर मुख्यमंत्री रमन सिंह कहते हैं, ‘अपनी घोषणाओं को हम हर हाल में पूरा करेंगे. जहां तक बजट का सवाल है हम अपने वित्तीय अनुशासन से इसकी पूर्ति करेंगे.’ लेकिन मुख्यमंत्री यह नहीं बताते कि वे किस तरह के वित्तीय अनुशासन की बात कर रहे हैं.

वर्ष 2013-14 में बजट पेश करते हुए मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा था, ‘राज्य की कुल प्राप्तियां 43,977 करोड़ रुपये तथा कुल व्यय 44,169  करोड़ रुपये अनुमानित की गयी हैं. इन वित्तीय प्राप्ति और व्यय में अंतर के कारण 192 करोड़ रुपये का घाटा अनुमानित है. साथ ही वर्ष 2012-13 के संभावित घाटे 1,485 करोड़ रुपये को शामिल करते हुए कुल बजटीय घाटा 1,677 करोड़ रुपये अनुमानित है. इस घाटे की पूर्ति वित्तीय अनुशासन तथा अतिरिक्त आय के संसाधन जुटाकर की जाएगी.’ इस हिसाब से देखा जाए तो 2013-14 में ही एक हजार 677 करोड़ रुपये का घाटा अनुमानित था.

प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता रामचंद्र सिंहदेव बताते हैं, ‘राज्य सरकार तो कंगाल हो चुकी है. पिछले ही साल सरकार ने कामकाज चलाने के लिए अब तक का सबसे बड़ा लोन यानी साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिया था. इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी खजाना बिल्कुल खाली हो चुका है. अब कैसे योजनाओं को पूरा किया जाएगा यह तो मुख्यमंत्री ही जानें.’

वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ था तब अविभाजित मध्य प्रदेश के हिस्से के रूप में राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के लिए कुल बजट प्रावधान केवल पांच हजार 704 करोड़ रुपये था. यह अलग राज्य बनने के बाद क्रमशः बढ़ता गया और अब 13 साल में 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है.

हालांकि सूबे के मुखिया को अपने घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा करने की जल्दी शायद इसलिए भी है कि लोकसभा चुनाव सामने हैं या फिर रमन सिंह अपनी हैट्रिक से गदगद हैं और जनता का अहसान चुकाना चाहते हैं. हालांकि योजनाओं को लागू करने की जल्दबाजी चाहे किसी भी कारण से हो पर इस त्वरित क्रियान्वयन में मुख्यमंत्री एक बात भूल रहे हैं कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय भार से वे कैसे निपटेंगे. सरकार का खर्च तो हर साल बढ़ रहा है लेकिन आय कैसे बढ़ेगी इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.

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