बारंबार बंटाधार

अदालत ने हड़ताली डाक्टरों को भी हड़ताल खत्म करने को कहा. सरकार ने अदालत के कडे़ रुख के बाद यह जवाब दिया कि न्यायिक आयोग तो वह पहले ही गठित कर चुकी है और बाकी सारी बातें भी वह मानने को तैयार है. लेकिन अदालत में इस तरह का वादा करने के बाद भी अपने चहेते विधायक और चहेते पुलिस अधिकारी के मोह में धृतराष्ट्र बनी अखिलेश सरकार ने हड़ताल खत्म कराने की किसी गंभीर कोशिश के बजाय डाक्टरों की हड़ताल पर एस्मा लागू कर दिया. इस पर एक बार फिर सरकार को अदालत की कड़ी फटकार सुननी पड़ी. अगले दिन हड़ताल पर एक जनहित याचिका की नियमित सुनवाई में अदालत ने सरकार से पूछा कि जब अदालत ने हड़ताल खत्म करवाने का निर्देश दिया था तो सरकार ने एस्मा क्यों लागू किया. एस्मा पहले लागू क्यों नहीं किया गया. अदालत की इस लताड़ के बाद सरकार की नींद खुली और आनन-फानन में आईएमए के नुमाइंदों को मुख्यमंत्री से बातचीत के लिए बुलाया गया. विधायक के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराई गई और गिरफ्तार किए 24 छात्रों को रिहा करने का आदेश दिया गया. और इस तरह सात दिन पूरे प्रदेश को परेशान करने के बाद हड़ताल खत्म हो सकी.

सवाल उठता है कि जिस समाधान तक पहले दिन ही पहुंचा जा सकता था उस तक पहुंचने के लिए सरकार को एक हफ्ते का समय क्यों लगा. क्यों मुख्यमंत्री सिर्फ ‘हम जांच करा रहे हैं,’ कह कर जिम्मेदारी से बचते रहे? क्यों पीडि़त डाक्टरों की एफआईआर दर्ज नहीं की गई? क्यांे अदालत की फटकार के बाद ही सरकार हरकत में आ पाई? मगर सरकार के निष्क्रिय होने का यह पहला मामला ही नहीं है. 2013 के अंतिम महीनों में राज्य कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान भी सरकार का यही रूख रहा था जब दस दिन तक राज्य के तमाम सरकारी दफ्तरों मंे हड़ताल रहने, चिकित्सा सेवाओं के ठप पड़ जाने के बावजूद सरकार की तरफ से कर्मचारियों से बातचीत का रास्ता तक नहीं खोला गया था. मगर जब एक जनहित याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सरकार को फटकार लगाई तब जाकर सरकार होश में आई और कर्मचारियों की हड़ताल खत्म हो सकी.

कानपुर की घटना भी ठीक मुजफ्फरनगर की घटना की तरह ही थी. मुजफ्फरनगर में जिस तरह एक हत्याकाण्ड के बाद प्रशासनिक अक्षमता और राजनीतिक दबाव ने हत्याकांड को सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला में बदल दिया उसी तरह कानपुर में भी हुआ. इरफान सोलंकी 2011 में भी कानपुर में केसा की एमडी और आईएएस अधिकारी रितु माहेश्वरी के आफिस में तोड़-फोड़ और अभद्रता करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे. 2012 में भी फरीदाबाद में काले शीशे लगी गाडि़यों के काफिले को रोके जाने पर स्थानीय पुलिस कर्मियों से उनकी जोरदार झड़प हुई थी लेकिन वे अखिलेश सरकार के चहेते हैं और इसीलिए हाल में विदेश दौरे पर गई मंत्रियों की टीम में भी उन्हें शामिल किया गया था. इसी तरह यशस्वी यादव भी महाराष्ट्र कैडर में इतनी ख्याति अर्जित कर चुके हैं कि एक बार उनकी बर्खास्तगी तक की नौबत आ गई थी. लेकिन अपनेपन के चलते समाजवादी पार्टी उन्हें महाराष्ट्र कैडर से यूपी में ले आई. ये दोनों ही लोग समाजवाद के इतने लाड़ले हैं कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने हड़ताल के कारण लोगों के मरते जाने के बारे में एक सवाल के जवाब में उल्टे पत्रकार को ही झिड़ककर यह पूछ लिया कि क्या तुम्हारे परिवार का कोई मर गया है.

फिलहाल मुजफ्फरनगर के बाद कानपुर के कलंक का दाग समाजवाद के दामन पर लग चुका है और हाई कोर्ट के आदेश से यशस्वी यादव यशहीन होकर डीजीपी मुख्यालय मंे नत्थी हो चुके हंै. अदालत ने बाकी अधिकारियों को अभी तक न हटाए जाने पर फिर सरकार को लताड़ लगाई है मगर उत्तर प्रदेश सरकार है कि मानती ही नहीं. वह तो कहती है कि सूबे में सब कुछ ठीक-ठाक है और उसका दावा है कि उससे बेहतर कोई भी नहीं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here