बाबा को बीस साल का कारावास | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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बाबा को बीस साल का कारावास

 

 

सरकारी समर्थन से कृतज्ञ पर कोप से भयभीत

अष्ट भुजा शुक्ल

 

नाम- राम रहीम यानी गंगा जमुनी वाला मामला। सिख समुदाय में दोनों की समान स्वीकृति। काम भक्तो का बेड़ा पार। बखिया उधड़ गई तो गैंगवार। निरंकुश, गुंडई, सरकारी तंत्र के समर्थन से कृतज्ञ और कोप से भयभीत।

अपना देश और समाज वाकई कितना अकिंचन, भीरू और अंधभक्ति का शिकार है। भोली-भाली जनता चमत्कार प्राफिल्य है- नाचे गावे तूरे तान तेकर दुनिया राखै मान- यह मुहावरा मेरी अइया कहा करती थी। इसी चमत्कार प्रियता का उदाहरण तब दिखा जब गुरमीत की अनुयायी ज़्यादातर महिलाएं इससे बेजार थी कि उनके पूज्य भगवान को कारागार की हवा खानी पड़ेगी।

हमारे समय का है यह दुर्भाग्य कि ज्ञान,अध्यात्म और भक्ति के निरंतर उद्दण्ड प्रदर्शन में बदल जाने के नाते तमाम मायावी और लीला करने वाले संप्रदायों की पौ बारह हो गई है। ये तुलसी,कबीर,तुकाराम और नानक को भुनाते हुए देवताओं की स्तुतिगान करने वाली भजनवालियों का संगीतमय कलेवा करते हुए भक्तों पर कृपा बरसाते रहते हैं और खुद को साधकों और यहां तक कि भगवान के आसन तक पहुंचा लेते हैं।

हमारे समय की गिद्ध राजनीति ऐसी मदहोश करने वाली भक्ति को बढ़ावा देकर आग में घी डालती रहती है। विश्वगुरू का फेंटा बांध देश को ये छोटे मोटे जाति-धर्म वाले गुरू खूब भुनाना सीख गए हैं। पंचमकार एक किस्म के साधक और साधना की दार्शनिक शब्दावली रही है जिसे इन्होंनें निजता के अधिकार में शामिल कर लिया है।

इन नए बाबाओं, भगवानों, गुरूओं और जाति धर्म रक्षकों में गुंडई और वर्चस्व का एक और तत्व जुड़ गया है अवैध तौर पर अस्त्र-शस्त्र संग्रह। इन्हें ढोने वाले बहुत से किराए के टट्टू सहज ही मिल जाते हैं और प्रसिद्धि के कसीदे काढऩे वाले महत्वाकांक्षी चेले- चेलियां भी। इस तरह के सांप्रदायिक कारेबार को पहले पखंडवाद कहा गया है। दुर्भाग्य से लगातर हो रहे पाखंड की राजनीति से पाख्ंाड के अध्यात्म को खूब बढ़ावा मिला है। जिससे इस संश्लिष्ट तंत्र से पार पाना काफी मुश्किल है। बरहाल वहां की भुक्त भोगी कुछ साध्वियों का निर्भीक ज़मीर उठ खड़ा हुआ। यह लगातार भीरू और आत्मकेंद्रित हो रहे समाज में आशा की उजली किरण जैसा है। तमाम राजनीति करने वाले राजनेता और मर्द साधु ऐसे ढोंगी महात्माओं के समर्थन में गला फाड़ रहे हंै। ईश्वर करे कि राजनीति करने वाली साध्वियों की सोच इनसे भिन्न और पीडि़ताओं के समर्थन में हो।

फिलहाल ज्ञान, अध्यात्म और भक्ति के नाम पर लगातार फैलती इस महामारी से भोली-भाली जनता के लिए बचाव ही इलाज का सूत्र ज़्यादा कारगर होगा। तथाकथित अनुयायियों के भीतर सब कुछ फूंक डालने का बेलगाम हौसला और कानून को हाथ में लेने की हिम्मत कहां से आती है? गरीब गुरबों और अमन पसंद सीधे-साधे लोगों पर रोब गालिब करने वाला पुलिस प्रशासन क्यों अपराधियों के प्रति इतना मिमियाने लगता है? फिलहाल ऐसे लोगों को कड़ी सजा मिले। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि एक सामान्य

कैदी की तरह पेश आया जाए जिससे इनकी नसें ढीली हो सकें।

प्रोफेसर संस्कृत,कवि,लेखक

साभार-फेसबुक

 

 

वह अधिकारी, जिसने शहर बचाया!

निमरत कौर

 

और वह एक महिला थी। उसके ग्यारह महीने का एक शिशु भी है। उसने ढेरों अधिकारियों की तुलना में ज़्यादा हिम्मत दिखाई।

अगस्त की 25 तारीख को जब पंचकूला में डेरा भक्त हिंसा और आगजनी कर रहे थे तो इस महिला ने हिम्मत दिखाई। इसकी हिम्मत पर हरियाणा की खट्टर सरकार और केंद्र की सरकार खामोश ही रहेगी लेकिन इसकी हिम्मत और मेहनत को देश के नागारिकों को तारीफ करनी चाहिए। यह महिला उस दिन खासी व्यस्त रही। लोगों की मदद करते हुए वह दूसरी सुबह भोर में तीन बजे के बाद ही घर लौटी।

सोचिए, यह वह समय था जब हरियाणा के पंचकूला में तैनात सिपाही, हिंसक भीड़ से डर कर दौड़ रहे थे। तब यह महिला एक बहादुर योद्धा की तरह सामने आई। इसने जो कोशिश की उससे पंचकूला में खून-खराबा नहीं हुआ, संपत्ति का नुकसान कम से कम हुआ।

यह महिला है पंचकूला की डिप्टी कमिश्नर गौरी पाराशर जोशी। पहले यह पत्रकार थी। बाद में यह डिप्टी कमिश्नर बनी। इसने अपने शिशु की चिंता छोड़ कर उस दिन लोहा लिया, अपनी चोटों और फट गए कपड़ों की परवाह किए बिना।

उस शाम जब सब कहीं हिंसा, आगजनी हो रही थी उसने अपने अकेले सहायक पीएसओ के साथ दफ्तर जाने का फैसला लिया और आदेश दिया कि हालात खराब हैं और इसे सेना के हवाले किया। इससे हालात और ज़्यादा बिगडऩे से बचे।

इसके बाद वह उस जगह पहुंची जहां उपद्रवी भीड़ पथराव और आगजनी में लगी हुई थी। उसके मन में शहर की सुरक्षा थी। वह शहर के हर उस सेक्टर में पहुंची जहां आगजनी हो रही थी, पथराव हो रहा था। मारपीट हो रहीं थी और गोलियां चल रही थी। घायल लोग सड़क पर थे। जब वह घर लौटी थी तो घर के सभी सदस्य सन्न रह गए खून से सने उसके कपड़ों को देखकर।

अंग्रजी साहित्य से दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज की स्नातकोत्तर गौरी, खुद घायल हो गई थी लेकिन वह अस्पताल जाने के लिए इसलिए तैयार नहीं हुई क्योंकि अस्पतालों में लगातार बढ़ रहे घायलों कीे देखरेख ज़्यादा ज़रूरी थी। उसने अपनी चोटों को कम गंभीर माना। यह जानकारी दी अजित बालाजी जोशी ने जो चंडीगढ़ के डिप्टी कमिश्नर हैं

सच तो यह है कि यदि इस महिला ने जागरूकता न दिखाई होती तो पूरा अंदेशा था कि पंचकूला में भी 2016 के जाट आंदोलन सा हिंसा का फैलाव होता।

साभार: फेसबुक

 

 

और भी बाबा रहे हैं दुष्कर्म के अपराधी

राम रहीम के मामले की ही तरह ही संत रामपाल का भी मामला है। उन्हें सितंबर 2014 में पंचकूला अदालत में पहुंचना था। उनके भक्तों की ऐतिहासिक तौर पर उपद्रव करने के लिए प्रसिद्धि है। उनके अनुयायी भी हजारों की तादाद में वहां पहुंचे थे।

रामपाल को हत्या के एक मामले में सम्मन भेजा गया था। जुलाई 2014 में उनके हजारों अनुयायियों ने हिसार अदालत में हो रही सुनवाई में दखल दिया और कार्रवाई को नहीं चलने दी

रामपाल ने खुद को 42 बार इसी तरीके से गिरफ्तार होने से बचाया। उसके अनुयायी हंगामे करते और गिरफ्तारी नहीं हो पाती। आखिर 19 नवंबर 2014 को उसे गिरफ्तार किया गया। इसमें भी उसके अनुयायियों ने दो सप्ताह की देर करा दी। वे मानव जंजीर बनाते, रेल पर लेट जाते जिससे हिसार के सतलोक आश्रम में पुलिस न घुस पाए।

नित्यानंद एक स्वयंभू बाबा हंै। वे तब विवाद में घिरे जब कन्नड़ के एक टीवी चैनेल में अभिनेत्री आरती राव ने बातचीत में यह माना कि उनके साथ नित्यानंद ने अवैध संबंध बनाए और उसे किसी को न बताने के लिए भी कहा। चैनेल पर हुए प्रसारण के बाद नित्यानंद के कई अनुयायी आगे आए और उन्होंने बताया कि उनके साथ भी बाबा ने ऐसा किया। तब कर्नाटक केे तत्कालीन मुख्यमंत्री सदानंद गौडा ने गिरफ्तारी के आदेश दिए। आश्रम मेें हालात तब बेकाबू हो गए जब एक पत्रकार को उनके अनुयायियों ने पीट कर आश्रम से बाहर निकाल दिया।

आसाराम बापू की गिरफ्तारी एक सितंबर 2013 को हुई। जोधपुर आश्रम के बाहर पुलिस और पत्रकारों के साथ उनके शिष्यों ने बाकायदा लोहा लिया। इस हिंसा के सिलसिले में तेरह लोग गिरफ्तार किए गए। बापू पर आरोप था कि उन्होंने सोलह साल की किशोरी के साथ अपने आश्रम में बलात्कार किया। उसने उनके खिलाफ 20 अगस्त 2013 को पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी।

हिंसा पर उतारू भीड़ ने पत्रकारों के साथ हुई मारपीट के दौरान माइक और कैमरे छीन लिए और कई पत्रकारों को खासा पीटा जो कवरेज के लिए आए थे।

आशुतोष महाराज, दिव्य ज्योति जागृति संस्था के संस्थापक हैं। उन सिखों के साथ उनकी हमेशा मारपीट होती थी जो उनके प्रवचनों और धार्मिक भावनाओं का विरोध करते थे। दिसंबर 2009 में सिख विरोधियों और पुलिस के बीच लुधियाना में महाराज के सम्मेलन में खासी हिंसा हुई जिसमें एक की मौत हो गई। पुलिस ने गोलियां चलाईं उन विरोधियों पर जो लाठियों और तलवारों के साथ सम्मेलन स्थल पर पहुंचे थे। हिंसा के बाद कफ्र्यू दो दिनों के लिए पांच पुलिस स्थानों पर लगा दिया गया। महाराज की 20 जनवरी 2014 को मौत हुई।

सारथी बाबा ओडीसा के स्वयंभू बाबा हंै। एक टीवी चैनेल ने एक रिपोर्ट जारी की चार अगस्त 2015 को जिसमें उन्हें जीन्स और टी शर्ट पहन कर हैदराबाद के एक होटल की लॉबी में एक लड़की के साथ जाते हुए देखा गया। पांच अगस्त को सारथी बाबा के समर्थकों ने भुवनेश्वर में बाबा के पक्ष में संवाददाता सम्मेलन किया और कहा कि टीवी चैनेल पर जो फोटो प्रसारित हुए हैं वे उनके भले हो पर उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया।

Photo: Prabhjot Gill

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