बहकावे में नाबालिग़


केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी (रोकथाम, देखभाल एवं पुनर्वास) विधेयक-2021 का मसौदा तैयार किया है। इस पर विभिन्न पक्षों से सुझाव माँगे गये हैं। विधेयक में तस्करी के दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति को कम-से-कम सात वर्ष क़ैद की सज़ा होगी, जिसे बढ़ाकर 10 वर्ष तक किया जा सकेगा। इसके अलावा दोषी पर कम-से-कम एक लाख रुपये से लेकर पाँच लाख रुपये तक का ज़ुर्माना भी लगाया जा सकेगा।
झारखण्ड सरकार लगातार मानव तस्करी रोकने की दिशा में क़दम उठा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस मामले को लेकर गम्भीर हैं। अधिकारियों को मानव तस्करों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने का आदेश दिया। इसी का नतीजा है कि फरवरी, 2021 में 14 नाबालिग़ों (12 लड़के एवं दो लड़कियों सहित) को छुड़ाया गया। पिछले महीने तमिलनाडु के तिरुपुर में फँसे आदिवासी लड़कियों और महिलाओं को वापस लाया गया। तस्करों के चंगुल से लाये गये लड़के-लड़कियों के पुनर्वास की व्यवस्था सरकार ने की है। झारखण्ड सरकार लगातार मानव तस्करी के ख़िलाफ़ क़दम उठा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरने समय-समय पर समीक्षा कर रहे हैं। राज्य में जहाँ से भी मानव तस्करी के शिकार बच्चों, नाबालिग़ लड़के-लड़कियों या युवतियों, महिलाओं की जानकारी मिलती है, उन्हें तस्करों के चंगुल से छुड़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
राज्य में अप्रैल, 2020 से मार्च, 2021 तक 199 लड़कियों को तस्करों के चंगुल से निकाला जा चुका है। वहीं अप्रैल, 2021 से अब तक 55 को तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया है। सरकार बचाव कार्य के बाद पुनर्वास की व्यवस्था भी कर रही है। राज्य सरकार का क़दम सराहनीय है। लेकिन मानव तस्करी की रोकथाम के लिए ये प्रयास पर्याप्त नहीं है। मानव तस्करी के पीछे के कारणों को तलाश कर उसके निदान की दिशा में और ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है; तभी झारखण्ड के माथे से मानव तस्करी का कलंक मिट पाएगा।


“झारखण्ड से मानव तस्करी के कलंक को मिटाना सरकार की प्राथमिकता है। मानव तस्कर रोधी इकाइयों की स्थापना का आदेश दिया गया है। ग्रामीण इलाक़ों में मानव तस्करी पर नज़र रखने के लिए राज्य भर में विशेष महिला पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी। बचाकर लाये गये पीडि़तों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था की गयी है। कोरोना संक्रमण से प्रभावित बच्चों की स्थिति का किसी को फ़ायदा नहीं उठाने दिया जाएगा। हम अपने बच्चों की देखभाल करेंगे। कोई भी बच्चा किसी भी प्रकार के अनुचित साधनों का शिकार नहीं होगा। सरकार जल्द ही ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए एक विस्तृत योजना लेकर आएगी। जिन्होंने दुर्भाग्य से अपने माता-पिता को खो दिया है।”
हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखण्ड

 

 

“मानव तस्करी का शिकार ज़्यादातर महिलाएँ, लड़कियाँ और बच्चे होते हैं। इनमें 80 फ़ीसदी 18 साल से कम उम्र की नाबालिग़ लड़कियाँ होती हैं। कई बार वे आत्मनिर्भर बनने और परिवार का भरण-पोषण करने की सोच के चलते दलालों के चंगुल में फँस जाती हैं। मानव तस्करी के 90 फ़ीसदी मामलों में क़रीबी रिश्तेदारों, परिचितों का हाथ होता है। पीडि़तों को जिस तरह की मानसिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है कि उनके काउंसलिंग और पुनर्वास करने में दो-तीन साल लग जाते हैं। मानव तस्करी पर रोक तभी लग सकती है, जब उन्हें अपने ही घर या ज़िले के आसपास जीवनयापन के लिए काम की व्यवस्था होगी।”
संजय मिश्रा, झारखण्ड प्रमुख, अटसेक