बस्तर: मुश्किल चुनावी डगर

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[box]‘चुनावकर्मियों की जो टोलियां जंगल में रास्ता भटक जाती हैं वे अक्सर खुद ही ईवीएम में फर्जी मत डालकर लौट आती हैं’[/box]

बस्तर में सैकड़ों ऐसे मतदान केंद्र हैं जहां पहुंचने के लिए कई स्तर पर समन्वय की जरूरत पड़ती है. चुनाव के सिलसिले में माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में तीन बार जा चुके एक चुनावकर्मी हमें बताते हैं, ‘ कहीं-कहीं पहुंचने के लिए तो आपको दो दिन तक लगातार चलना पड़ता है. बहुत बार ऐसा होता है कि चुनावकर्मियों के दल जंगल में खो जाते हैं. ऐसे में अक्सर यह होता है कि वे सुरक्षित जगह की तलाश करते हैं और नजदीकी गांव के लोगों को बुलाकर मतदान करवा लेते हैं या फिर खुद ही मतदान करके औपचारिकता पूरी कर देते हैं. ये वोट किसी एक पार्टी को नहीं जाते फिर भी कुछ हद तक सत्ताधारी पार्टी को इसका फायदा मिलता है.’

2009 के लोकसभा चुनावों में माओवाद प्रभावित इलाके के तकरीबन 50 मतदान केंद्र तथाकथित ‘सुरक्षित’ जगहों पर स्थानांतरित किए गए थे. दिलचस्प बात है कि इन चुनावों के ठीक छह महीने पहले विधानसभा चुनावों में इन्हीं केंद्रों पर मतदान हुआ था. उन केंद्रों पर भी मतदान दर्ज किया गया था जहां पहुंचना एक चुनाव अधिकारी के मुताबिक लगभग नामुमकिन है. आंकडों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर मत भाजपा के पक्ष में पड़े थे. 2008 के चुनावों में भाजपा ने बस्तर क्षेत्र की 12 में से 11 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को यहां महज एक सीट मिल पाई थी. जबकि 2003 के चुनावों में कांग्रेस के पास यहां की तीन सीटें थीं.

माओवाद प्रभावित इलाकों में चुनाव कराने की मुश्किल और खतरों की वजह से फर्जी मतदान के आरोपों को बल मिलता है. पिछले विधानसभा चुनाव में कुछ मतदान केंद्रों पर जहां शून्य मतदान हुआ था वहीं उसके नजदीकी केंद्रों पर भारी मतदान हुआ. भाजपा का दावा है कि कांग्रेस के फर्जी मतदान के आरोप झूठे हैं. नारायणपुर से विधायक और अनुसूचित जाति-जनजाति विकास मंत्री केदार कश्यप कहते हैं, ‘हमारी पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए बहुत काम किया है. ऐसे में हम वहां क्यों नहीं जीतेंगे? ‘ हालांकि सीपीआई के नेता मनीष कुंजाम बस्तर में फर्जी मतदान के आरोपों को सही मानते हैं. उनके मुताबिक, ‘ कांग्रेस के पास जब मौका था तब उसने भी यही किया. ‘

दरअसल 90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस समय भाजपा के पास 49 सीटें हैं और 37 सीटें कांग्रेस के पास हैं. दो विधायक बसपा के हैं. इस लिहाज से बस्तर क्षेत्र की 12 सीटें राज्य में सरकार बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इस समय इनमें से 11 सीटों पर भाजपा के विधायक काबिज हैं. कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट है. ऐसे में यदि चुनाव आयोग कांग्रेस की मांग मानते हुए मतदान की निगरानी के लिए छिपे हुए कैमरे और जीपीएस डिवाइसों की मांग मान लेता है तो अगले विधानसभा चुनाव में यह क्षेत्र ऐसे नतीजे दे सकता है जिनमें आदिवासियों की पसंदगी ईमानदारी से जाहिर हो.

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