बड़ा कागजी है पैरहन

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कालेज से निकलकर फिल्म पंजाबी और तमिल के बीच के कल्चरल डिफरेंसिस को खूब दिखाती है, लेकिन उसके पास दो समुदायों के बीच कल्चरल हारमनी लाने वाली समझ नहीं है, और वैसे दृश्य भी नहीं है. वह पंजाबी-तमिल परिवारों में शादी के माध्यम से समझौता तो करा देती है, लेकिन दोस्ती नहीं करा पाती. वैसे उसे दोस्ती की फ्रिक भी नहीं है, उसने चिकन और इडली के बीच की दूरियों को कम करने का जिम्मा आप पर छोड़ा हुआ है. फिल्म चीजों को जनर्लाइज करने में भी दिलचस्पी लेती है. हीरो बैंक की ही नौकरी करता है और हीरोइन शेंपू बनाने वाली कंपनी की है. कमाल है भाई, उल्टा नहीं हो सकता था क्या!  वह अपनी सबसे बड़ी ताकत आलिया को भी हलका दिखाने से पीछे नहीं हटती. ‘हिटलर भी दिल का बुरा आदमी नहीं था’ जैसे संवाद एक समझदार लड़की के किरदार के लिए तो नहीं ही होने चाहिए थे. लेकिन फिर भी आलिया फिल्म में चमकती हैं और सिर्फ वे ही चमकती हैं. आलिया हमारी फिल्मों का भविष्य है, यह तय है. आलिया के अलावा फिल्म में सिर्फ रोनित रॉय हैं जिनका जिक्र करना बेहद जरूरी है. उनका चेहरा क्रोध और अकड़ को ऐसे बोलता है जैसा कम ही अभिनेता बोल पाते हैं.

अपने कागजी पैरहन में खुश 2 स्टेट्स सिर्फ एक लकड़ी से जली आग के आगे ढाई घंटे नाचती है. खुद भी थकती है, हमें भी थकाती है.

1 COMMENT

  1. आलिया की एकतरफा तरीफ क्यों? पूरी फिल्म में आलिया का कोई एक संवाद बता दीजीए जिसमे मद्रासी लहजे का समावेश हो। सिर्फ बिजली सा चमकदार दिखना ही अभिनय नहीं होता। …और महज शब्दों की बाजीगरी समीक्षा नहीं होती। हर फिल्म को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए न कि किसी अन्य फिल्म के चश्मे से, चाहे वो चश्मा 3 इडियट्स का ही क्यों न हो।

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