पांव की नस

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इन्होंने जहां चाहा वहां पहुंचाया तुमको
घंटों जूतों में कैद रखा तुमने इन्हें
थकान से चूर तुम तो सोते समय भी
पैरों को ठंडे पानी से धोना भूल गये
और पड़ गये बिस्तर पर

खींच कर अपना हाथ उंगलियों से टोता हूं नस को
धीरे धीरे सहलाता हूं, दबाता हूं
जातियों के जन्म की कोई मनुवादी धारणा
कौंधती है दिमाग में
इतनी पीड़ा कि फूट पड़ती है हंसी और कराह एक साथ
ओह! पिण्डली की एक नस ने हिला कर रख दिया है
मेरे पूरे वजूद को
कितना असमर्थ कर दिया है इसने
पांव को उतार कर ज़मीन पर टिकाना भी नामुमकिन
कमबख़्त एक नस ने जरा सा ऐंठकर
हर मुमकिन को कर दिया
नामुमकिन!

1 COMMENT

  1. राजेश जोशी जी की कविता आम जीवन को टटोलकर मन को छू लेती है पाव की नस से जीवन के पूरे अवस्स्द समस्या और तकलीफो का लेखा जोखा दिया है अच्छी कविता के लिये साधुवाद

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