पर्यावरण की मार

जंगल की कटाई तीसरी दुनिया के देशों में ज़्यादा है। यह वही देश हैं, जहाँ विकास की प्रक्रिया तो धीमी है; लेकिन जनसंख्या वृद्धि पर ज़ीरो हैं। इस कारण से वर्षा वन, जो प्रकृति की ख़ुबसूरत देन हैं; तेज़ी से काटे जा रहे हैं। जंगल कटने से कार्बन डाईऑक्साइड बढ़ रही है और भूमि कटान तेज़ी से हो रहा है। हिमालय पर्वत पर वन कटान से भू-क्षरण तेज़ी से हो रहा है। एक सर्वे कहता है कि हिमालयी क्षेत्र में भूक्षरण की दर प्रतिवर्ष सात मिलीमीटर तक पहुँच गयी है, जिससे कई बार 500 से 1000 फ़ीसदी तक गाद घाटियों और झीलों में भर जाती है। उत्तराखण्ड, हिमाचल और कश्मीर में हाल की तबाहियों का प्रमुख कारण जगंलों का बेहिसाब कटान है।

भारत का पंचामृत मंत्र

 2030 तक भारत अपनी ग़ैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावॉट तक पहुँचाएगा।

 2030 तक भारत अपनी 50 फ़ीसदी ऊर्जा की आवश्यकता नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करेगा।

 अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा।

 साल 2030 तक अपनी अर्थ-व्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 फ़ीसदी से भी कम करेगा।

 साल 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।

दुनिया में जलवायु परिवर्तन से बीमारी का पहला मामला आया सामने

जलवायु परिवर्तन से बीमार होने का पहला मामला कनाडा में सामने आया है। इसी महीने की 8 तारीख़ को कनाडा की 70 साल की बुज़ुर्ग महिला दुनिया की पहली महिला बन गयीं, जिनके रोग का कारण जलवायु परिवर्तन बताया गया है। इस महिला का नाम उजागर नहीं किया गया है। लेकिन ख़बरें से पता चलता है कि उसे कनाडा के कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रान्त में कूटने लेक अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहाँ डॉ. काइल मेरिट ने उनके रोग को जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ बताया है। डॉक्टर काइल के मुताबिक, साल के शुरू में चलीं गर्म हवाओं से यह महिला एक साथ कई स्वास्थ्य समस्याओं से घिर गयी, जिनकी हालत अब और गम्भीर हो गयी है। अस्थमा और डायबिटीज से भी पीडि़त इस महिला को साँस लेने में दिक़्क़त सहित कुछ अन्य तकलीफ़ों से दो-चार होना पड़ा है। डॉक्टरों के मुताबिक, यह महिला आज हाइड्रेटेड रहने के लिए संघर्ष कर रही है। वैसे डॉक्टर मेरिट का मत है कि रोगियों के लक्षणों का इलाज करने तक सीमित रहने से ज़्यादा बेहतर समस्या के कारणों की पहचान और उनका निदान करने पर होना चाहिए।

प्लास्टिक जन्य प्रदूषण का ख़तरा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक नयी रिपोर्ट में महासागरों और अन्य जल क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण की तेज़ी से बढ़ती मात्रा पर चिन्ता जतायी गयी है। इसके साल 2030 तक दोगुना हो जाने का अनुमान जताया गया है। यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन कॉप-26 से 10 दिन पहले जारी इस रिपोर्ट में प्लास्टिक को भी एक जलवायु समस्या क़रार दिया गया है।

रिपोर्ट में प्लास्टिक से स्वास्थ्य, अर्थ-व्यवस्था, जैव-विविधता और जलवायु पर होने वाले दुष्प्रभावों को रेखांकित किया गया है। साथ ही वैश्विक प्रदूषण संकट से निपटने के लिए अनावश्यक, टालने योग्य और समस्या की वजह बनने वाले प्लास्टिक में ठोस कमी लाये जाने पर बल दिया गया है। प्लास्टिक की मात्रा में ज़रूरी गिरावट को सम्भव बनाने के लिए जीवाश्म ईंधनों के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में तेज़ रफ़्तार से आगे बढऩे, उनसे सब्सिडी हटाने और उत्पादों को फिर से इस्तेमाल में लाने (चक्रीय) जैसे उपाय अपनाने का सुझाव दिया गया है। ‘फ्रॉम प्लास्टिक टू सॉल्यूशन : अ ग्लोबल असेसमेंट ऑफ मरीन मीटर एंड प्लास्टिक पॉल्यूशन’ शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि प्लास्टिक से सभी पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए ख़तरा बढ़ रहा है। प्लास्टिक के गहराते संकट से निपटने और उसके दुष्प्रभावों की दिशा पलटने के लिए समझ व ज्ञान तो बढ़ रहा है; लेकिन इसे कारगर कार्रवाई में बदलने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत रहेगी।

यूएन एजेंसी ने ज़ोर देकर कहा है कि प्लास्टिक एक गम्भीर जलवायु समस्या भी है। इसमें बताया गया है कि सन् 2015 में प्लास्टिक से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 1.7 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर था। साल 2050 में यह आँकड़ा बढक़र क़रीब 6.5 गीगाटन तक पहुँच जाने का अनुमान है। यह सम्पूर्ण कार्बन बजट का 15 फ़ीसदी है। अर्थात् ग्रीनहाउस गैस की वह मात्रा, जिसे वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को पैरिस समझौते के लक्ष्यों के भीतर रखने के लिए उत्सर्जित किया जा सकता है।

यूएन पर्यावरण एजेंसी की कार्यकारी निदेशक इन्गर एण्डरसन के मुताबिक, यह रिपोर्ट तत्काल कार्र्यवाही करने और महासागरों की रक्षा और उनकी पुन: बहाली के पक्ष में अब तक का सबसे मज़बूत वैज्ञानिक तर्क है। उन्होंने बताया कि एक बड़ी चिन्ता टूटकर बिखर जाने वाले उत्पादों से जुड़ी है। जैसे कि प्लास्टिक के महीन कण और बेहद कम मात्रा में मिलाये जाने वाले रासायनिक पदार्थ जो ज़हरीले हैं और मानव स्वास्थ्य, वन्यजीवन स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए नुक़सानदेह हैं।

जानकारी के मुताबिक, समुद्र में कचरे की कुल मात्रा में से 85 फ़ीसदी प्लास्टिक ही है। साल 2040 तक इसकी मात्रा तीन गुना होने की आशंका है, और महासागरों में हर साल 2 करोड़ 30 लाख 70 हज़ार मीट्रिक टन कचरा पहुँचेगा। यह तटीय रेखा के प्रति मीटर हिस्से के लिए लगभग 50 किलोग्राम प्लास्टिक बन जाता है। इससे समुद्री जीवन, पक्षियों, कछुओं और स्तनपायी पशुओं के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा होने की आशंका है। प्लास्टिक के दुष्प्रभावों से मानव शरीर भी अछूता नहीं है। समुद्री भोजन, पेय पदार्थों और साधारण नमक में भी मिल जाने वाले प्लास्टिक का सेवन नुक़सानदेह है। इसके अलावा हवा में लटके महीन कण, त्वचा को बेधते हैं और साँस के ज़रिये भी अन्दर आ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पुनरावर्तन (री-साइक्लिंग) का सहारा लेकर, प्लास्टिक प्रदूषण संकट से बाहर निकल पाना सम्भव नहीं है। इसके अलावा उन्होंने अन्य हानिकारक विकल्पों, जैसे कि जैव-आधारित या जैव रूप से नष्ट होने योग्य के इस्तेमाल पर भी सचेत किया है, जिनसे आम प्लास्टिक की तरह ही जोखिम पैदा हो सकते हैं। रिपोर्ट में प्लास्टिक उत्पादन और खपत में तत्काल कमी लाने का आग्रह किया गया है, और सम्पूर्ण मूल्य श्रृंखला में रूपान्तरकारी बदलाव को प्रोत्साहन दिया गया है।

यूएन एजेंसी ने प्लास्टिक के स्रोत, स्तर और उसकी नियति की पहचान करने के लिए ठोस और कारगर निगरानी प्रणालियों में निवेश की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। इस क्रम में चक्रीय तौर-तरीक़ों (प्लास्टिक के इस्तेमाल को घटाने, फिर से इस्तेमाल में लाने और पुनरावर्तन) व अन्य विकल्पों को अपनाना भी ज़रूरी होगा।

भारत का विकसित देशों पर हमला

 

भारत ने इस बार ग्लासगो में आयोजित वल्र्ड लीडर समिट ऑफ कॉप-26 में अपने एजेंडे को कहीं बेहतर तरीक़े और स्पष्टता से रेखांकित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के अभियान का नेतृत्व किया और अपने सम्बोधन में पंचामृत का नारा दिया, जिसे दूसरे देशों के मुखियाओं से काफ़ी प्रशंसा मिली।

मोदी ने कहा कि भारत 2070 तक नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें इस बात के लिए काफ़ी तारीफ़ मिली। इसका एक कारण यह रहा कि एक विकासशील देश के लिहाज़ से आर्थिक और पर्यावरणीय ज़रूरतों को सन्तुलित करने की कोशिश की इसमें गम्भीर कोशिश की गयी है। भारत सरकार ने भी मोदी के भाषण को तरजीह दी। लिहाज़ा देश के टीवी चैनलों ने इसका सीधा प्रसारण किया। वैसे इस बात को लेकर काफ़ी विशेषज्ञों ने निराशा जतायी है कि भारत ने लक्ष्यों को अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य साल 2050 के भी दो दशक बाद हासिल करने का वादा किया है। हाँ, कुछ विशेषज्ञों ने भारत की आबादी और अन्य कारणों के आधार पर इस लक्ष्य को व्यावहारिक माना है।

सम्मलेन में मोदी के भाषण से यह भी ज़ाहिर हुआ कि वे विकसित देशों के दबाव में नहीं दिखे। उन्होंने एक तरह से विकसित देशों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि दुनिया की आबादी का 17 फ़ीसदी देश होने बावजूद यह कुल कार्बन उत्सर्जन में महज़ 5 फ़ीसदी से भी कम भागीदारी करता है। इससे पर्यावरण के मामले में भारत का पक्ष मज़बूत हुआ है।

मोदी ने कहा- ‘आज विश्व की आबादी का 17 फ़ीसदी होने के बावजूद, जिसकी उत्सर्जन में ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पाँच फ़ीसदी रही है, उस भारत ने अपना कर्तव्य पूरा करके दिखाने में कोई कोर-क़सर बाक़ी नहीं छोड़ी है।’

प्रधानमंत्री ने कहा- ‘मुझे ख़ुशी है कि भारत जैसा विकासशील देश करोड़ों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने में जुटा है और करोड़ों लोगों की जीवन में आसानी लाने पर रात-दिन काम कर रहा है।’ सम्मलेन में मोदी ने विकसित देशों के विकासशील देशों पर दबाव बनाने पर उनकी खिंचाई भी की। मोदी ने कहा- ‘यह सच्चाई हम सभी जानते हैं कि जलवायु वित्त को लेकर आज तक किये गये वादे खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी जलवायु कार्यवाही पर अपनी महत्त्वाकांक्षा बढ़ा रहे हैं, तब क्लामेट फाइनेंस पर दुनिया की इच्छा वही नहीं रह सकती, जो पेरिस समझौते के समय थी। जलवायु परिवर्तन पर इस वैश्विक मंथन के बीच मैं भारत की ओर से इस चुनौती से निपटने के लिए पाँच अमृत तत्त्व रखना चाहता हूँ। पंचामृत की सौगात देना चाहता हूँ।’

मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज जब मैं आपके बीच आया हूँ, तो भारत के ट्रैक रिकॉर्ड को भी लेकर आया हूँ। मेरी बातें सिर्फ़ शब्द नहीं हैं; ये भावी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य का जयघोष है। मोदी ने कहा कि आज भारत स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता में दुनिया भर में चौथे स्थान पर है। उन्होंने कहा कि विश्व की पूरी आबादी से भी अधिक यात्री, भारतीय रेल से हर वर्ष यात्रा करते हैं। इस विशाल रेलवे तंत्र ने अपने आपको साल 2030 तक नेट ज़ीरो बनाने का लक्ष्य रखा है। अकेली इस पहल से सालाना 60 मिलियन टन एमिशन की कमी होगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सोलर पॉवर में एक क्रान्तिकारी क़दम के रूप में हमने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबन्धन की पहल की। जलवायु अनुकूलन के लिए हमने आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे के लिए गठबन्धन का निर्माण किया है। ये करोड़ों ज़िन्दगियों को बचाने के लिए एक संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण पहल है।

ग्लासगो सम्बोधन में मोदी ने कहा- ‘मैं आज आपके सामने एक शब्द मुहिम (वन-वर्ड मूवमेंट) का प्रस्ताव रखता हूँ। यह एक शब्द जलवायु के सन्दर्भ में एक शब्द-एक विश्व का मूल आधार बन सकता है; अधिष्ठान बन सकता है। यह एक शब्द है- लाइफ, एल. आई. एफ. ई. यानी लाइफस्टाइल फॉर इन्वॉयरमेंट।’

मोदी सम्मेलन में हिस्सा लेने से पहले भी सक्रिय रहे। मोदी ने सम्मलेन के अपने सम्बोधन से पहले कहा- ‘हमें अनुकूलन को अपनी विकास नीतियों और योजनाओं का मुख्य हिस्सा बनाना होगा। भारत में नल से जल, स्वच्छ भारत मिशन और उज्ज्वला जैसी योजनाओं से न सिर्फ़ हमारे नागरिकों को लाभ मिला है, बल्कि उनके जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।’

प्रधानमंत्री ने कहा कि कई पारम्परिक समुदायों को प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का ज्ञान है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह ज्ञान आने वाली पीढिय़ों तक पहुँचे, इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल जीवन शैली का संरक्षण भी अनुकूलन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

भारत में मोदी सरकार के तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ एक साल से चल रहे आन्दोलन के बीच ग्लास्गो में मोदी ने कहा- ‘भारत समेत अधिकतर विकासशील देशों के किसानों के लिए जलवायु एक बड़ी चुनौती है। खेती के तरीक़ों में बदलाव आ रहा है। बेसमय बारिश और बाढ़ या लगातार आ रहे तुफ़ानों से फ़सलें तबाह हो रही हैं। पेयजल के स्रोत से लेकर किफ़ायती आवास तक सभी को जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ साथ आने की ज़रूरत है। अनुकूलन के तरीक़ों चाहें लोकल हों; लेकिन पिछले देशों को इसके ग्लोबल समर्थन मिलना चाहिए।’

प्रधानमंत्री ने सन् 2015 में पेरिस में कॉप-21 में इससे पहले हिस्सा लिया था। इस बार के सम्मलेन को कॉप-26 (कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) कहा गया, जिसका मक़सद जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर रूपरेखा तैयार करना था। सम्मलेन 13 नवंबर तक चला। याद रहे छ: साल पहले फ्रांस की राजधानी में हुए सम्मेलन में इस सदी के अन्त तक ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फारेनहाइट) से नीचे रखने के लक्ष्य पर सहमति जतायी गयी थी। इस साल सम्मेलन के लिए 25,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने पंजीकरण कराया है। ब्रिटिश अधिकारी आलोक शर्मा इसकी अध्यक्षता करेंगे।

 

 

“26 साल के जलवायु सम्मेलनों के बावजूद कथित तौर पर ‘आँय, बाँय, शाँय’ जारी रखने वाले नेता आलोचना के पात्र हैं। कॉप बैठकों के दौरान किये जाने वाले वादों की पारदर्शिता पर सन्देह के असंख्य कारण हैं। नेतागण कुछ भी नहीं कर रहे हैं। वे बस ऐसे रास्ते तैयार कर रहे हैं, जिनसे उन्हें फ़ायदा मिलता हो, और विनाशकारी प्रणाली से मुनाफ़ा मिलना जारी रह सके। प्रकृति और लोगों का दोहन, मौज़ूदा और भावी जीवन की परिस्थितियों की तबाही जारी रखने के लिए नेताओं द्वारा किये जाने वाला यह एक सक्रिय चयन है।”

ग्रेटा थनबर्ग

पर्यावरण अभियानकर्ता