परंपरा का पुन: प्रयोग

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आज देवास जिले में कुल दस हजार से भी ज्यादा तालाब बन चुके हैं. धतूरिया, टोंककला, गोरवा, हरनावदा और चिडावत जैसे कई गांव तो ऐसे हैं जहां 100 से भी ज्यादा तालाब हैं. लोगों ने कुछ साल पहले नलकूपों की अरथी निकलकर कभी नलकूप न खोदने का भी प्रण कर लिया है.

निपनिया गांव के पोप सिंह राजपूत को तालाब बनाने के लिए उमराव ने अपनी व्यक्तिगत गारंटी पर 14 लाख रु का लोन दिलवाया था. लोन मिलने के बाद पोप सिंह ने 10 बीघे का विशाल तालाब बनवाया. पोप सिंह बताते हैं, ‘पहले तो साल में बस एक ही फसल हो पाती थी. वो भी सोयाबीन जैसी जिसमें पानी कम लगता है. आज हम साल में दो फसल कर लेते हैं. तालाब का पानी नलकूपों की तुलना में ज्यादा उपजाऊ भी है, इसलिए फसल भी अच्छी होती है.’ बैंक से लिए गए लोन के बारे में वे बताते हैं, ‘लोन तो मैंने दो साल पहले ही चुका दिया है. उसके बाद तो मैं 10 बीघा जमीन और खरीद चुका हूं. जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है.’

[box]‘जितनी जमीन पर मैंने तालाब बनाया था, उतनी ही जमीन मुझे इस तालाब ने कमाकर दे दी है[/box]

इस अभियान से शुरुआत से जुड़े रहे कृषि विभाग के मोहम्मद अब्बास बताते हैं कि तालाबों से किसानों को खेती के अलावा कई फायदे हुए. असिंचित जमीन अब सिंचित हो गई है और उसकी कीमत लगभग डेढ़ गुना तक बढ़ गई है. साथ ही यहां पलायन पर भी रोक लगी है.

टोंक कला में हमारी मुलाकात देवेंद्र सिंह खिंची से होती है.वे कुछ साल पहले इंदौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके लौटे हैं और अब पूरा समय खेती को देते हैं. वे बताते हैं, ‘अगर अच्छा पानी मिले तो किसानी से बढ़कर कोई अन्य व्यवसाय हो ही नहीं सकता.’ देवेंद्र हमें अपना खूबसूरत तालाब दिखाते हैं. इस तालाब की पाल पर चारों तरफ पेड़ लगे हैं और कुछ ही दूरी पर कई गायें बंधी हैं. वे अपनी जैविक खेती के बारे में बताते हैं, ‘बरसात में खेतों की उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बह जाती है. यह सारा पानी बहकर तालाब में आता है तो तालाब उस मिट्टी को रोक लेते हैं. साथ ही हम इन गायों का गोबर भी तालाब में डाल देते हैं. इस कारण तालाब का पानी अपने आप में बहुत उपजाऊ हो जाता है और गोबर मछलियों के लिए चारे का काम करता है. इसके बाद जब फरवरी-मार्च में हम तालाब का सारा पानी निकाल लेते हैं तो इसकी सफाई करते हैं. इसमें जो खेतों से बहकर आई मिट्टी और गोबर जमा हुआ होता है उसे हम वापस खेतों में डाल देते हैं. यह जमीन के लिए बेहतरीन खाद का काम करता है.’ अब्बास कहते हैं, ‘यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है कि आज किसान खुद आपको तालाबों के फायदे अपने अनुभव के साथ बता रहे हैं.’ देवेंद्र लगभग 75 बीघा जमीन पर खेती करते हैं. इसमें से काफी जमीन पर उन्होंने मिर्च की खेती की है जिसके बारे में वे बताते हैं कि इससे एक ही मौसम में लगभग डेढ़ लाख रु प्रति बीघे का मुनाफा हो जाता है. तालाबों में पाली गई मछलियों से भी देवेंद्र साल भर में लगभग दो लाख रु कमा रहे हैं.

अब हम चिड़ावद गांव की तरफ बढ़ते हैं. यहां हमारी मुलाकात विक्रम सिंह पटेल से होती है. उन्होंने अपने घर से लगभग चार सौ फुट दूर एक गोबर गैस प्लांट भी लगाया है. वे बताते हैं कि उनके परिवार को साल भर इसी प्लांट से गैस मिल जाता है और उन्हें बाजार से गैस नहीं खरीदना पड़ता. गोबर गैस अकसर सर्दियों में जम जाया करता है. लेकिन पटेल ने अपने प्लांट के ऊपर ही गोबर से खाद बनाने के लिए ‘चार-चकरी’ बनाई है. इस कारण नीचे प्लांट में इतनी गर्मी रहती है कि सर्दियों में भी गैस जमता नहीं.

देवास के हर गांव में आज सफलताओं की ऐसी कई छोटी-बड़ी कहानियां मौजूद हैं. पानी और चारा होने के कारण लोगों ने दोबारा गाय-भैंस पालना शुरू कर दिया है और अकेले धतूरिया गांव से ही एक हजार लीटर दूध प्रतिदिन बेचा जा रहा है. पर्यावरण पर भी इन तालाबों का सकारात्मक असर हुआ है. आज विदेशी पक्षियों और हिरनों के झुंड इन तालाबों के पास आसानी से देखे जा सकते हैं. किसानों ने भी पक्षियों की चिंता करते हुए अपने तालाबों के बीच में टापू बनाए हैं. इन टापुओं पर पक्षी अपने घोंसलें बनाते हैं और चारों तरफ से पानी से घिरे रहने के कारण अन्य जानवर इन घोंसलों को नुकसान भी नहीं पहुंचा पाते. यहां के विजयपुर गांव में तो एक किसान ने सेब के पेड़ तक उगाए हैं. सिर्फ ठंडी जगहों पर उगने वाले सेब के पेड़ को मालवा के इस क्षेत्र में हरा-भरा देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं.

जो देवास कभी इसलिए चर्चित था कि वहां रोज ट्रेन से पानी पहुंचाया जाता है आज वही देवास पानी से सराबोर है और देश भर से लोग यहां पानी सहेजने के तरीके सीखने आ रहे हैं. यह सफल मॉडल अब महोबा में भी तैयार हो रहा है. इसकी शुरुआत तब हुई जब पुष्पेन्द्र भाई, इंडियावॉटरपोर्टल के सिराज केसर और गांधी शांति प्रतिष्ठान के प्रभात झा अपने कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर महोबा के जिलाधिकारी के पास पहुंचे. युवा जिलाधिकारी अनुज झा खुद भी पानी की समस्या का हल तलाश रहे थे. देवास के प्रयोग से उत्साहित झा ने इस काम में हर संभव मदद करने का वादा किया. इसके बाद उन्होंने किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल महोबा से देवास भेजा. वहां से किसान बस इसी संकल्प के साथ लौटे कि कुछ ही सालों में महोबा को भी देवास बनाना है.

पुष्पेन्द्र भाई और उनके साथियों ने मिलकर जिलाधिकारी अनुज झा की सहायता से यहां एक कृषक गोष्ठी आयोजित की. देवास में तालाबों की नींव रखने वाले उमाकांत उमराव को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया और महोबा में भी तालाब बनाने का अभियान चल पड़ा. एक ही महीने के भीतर महोबा में लगभग 40 तालाब बन चुके हैं. बरबई गांव के किसान देवेंद्र शुक्ला ने लगभग एक लाख रु से आधे बीघे का तालाब बनवाया है. तालाब को खोद कर निकाली गई मिट्टी बेचकर उन्हें 30 हजार रुपये तो तालाब बनने के दौरान ही वापस भी मिल गए हैं. महोबा के जिलाधिकारी कहते हैं, ‘अभी तो हम बहुत शुरुआती दौर में हैं. लेकिन देवास की सफलता देखते हुए हम निश्चिन्त हैं कि यह महज एक प्रयोग नहीं बल्कि पानी का सबसे सटीक उपाय है.’ बुंदेलखंड का जो महोबा जिला कभी किसान आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा था आज वहां उम्मीद और उत्साह की एक लहर दौड़ पड़ी है.

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