पत्रकारिता का जंतर-मंतर

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यह संयोग है कि जिस वर्ष भोपाल गैस कांड हुआ था उसी साल यानी 1984 में माधवराव सप्रे संग्रहालय भी वजूद में आया. यहां इस त्रासदी की खबरों से जुड़े कई पृष्ठ भी आप देख सकते हैं. उस समय के कई अखबारों के कार्यालयों में भी इस कांड पर प्रकाशित खबरों के पृष्ठ नहीं हैं लिहाजा कई पत्रकार इस हादसे से जुड़ी खबरों को देखने के लिए यहां आते रहते हैं. दरअसल संग्रहालय में हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं की कई पत्र-पत्रिकाओं की फाइलें अपने पहले अंक के साथ सहेजी जाती हैं. कुछेक अखबारों के तो ऐसे अंक भी हैं जो अब उनके प्रकाशकों के पास भी नहीं हैं. जैसे, मराठी भाषा के अखबार विदूषक और सकाल के कई दुर्लभ अंक महाराष्ट्र में भी नहीं मिलेंगे. 19 जून, 1984 को हिंदी के पत्रकार माधवराव सप्रे के नाम पर स्थापित इस अभिलेखागार की स्थापना के समय से इससे जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संपादक विजयदत्त श्रीधर बताते हैं कि 1982-83 में मप्र पत्रकारिता के इतिहास पर किताब लिखने के लिए जब जगह-जगह जाना हुआ तो यह चिंता हुई कि जर्जर पृष्ठों में पड़ी बुजुर्गों की यह जायदाद कहीं नष्ट न हो जाए. इसके बाद श्रीधर ने पुराने अखबारों को घर-घर जाकर तलाशना शुरू किया. श्रीधर ने समाचार पत्रों के इतिहास को न केवल समेटा बल्कि लिखा भी है. और उन्होंने इतिहास के महत्वपूर्ण लेखों को एक किताब के तौर पर तीन खंडों (1780-1947) में शामिल किया है. श्रीधर के मुताबिक, ‘यदि इस छत के नीचे पांच सौ साल का इतिहास आ गया है तो इसलिए कि कई परिवारों ने इसे बचाने के लिए हम पर भरोसा किया.’ माखनलाल चतुर्वेदी और धर्मवीर भारती के परिवार के सदस्यों ने निजी पुस्तकालय ससम्मान सप्रे संग्रहालय को सौंप दिए. संग्रहालय ने भी दानदाताओं की सामग्री को उनके नाम के साथ प्रदर्शित करने में जरा भी संकोच नहीं किया. शायद यही वे खूबियां हैं जिनकी वजह से सप्रे संग्रहालय की रजत जयंती (2008) पर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी तारीफ की थी.

इतिहास के सूत्र
सुर्खियों में केवल समाचार भर नहीं होते. ये उस कालखंड की समाज-संस्कृति का जीवंत दृश्य भी होती हैं. इसी कड़ी में यहां महत्वपूर्ण साक्ष्यों के तौर पर माने जाने वाले अंग्रेजी और हिंदी के कई गजेटियर हैं. 1905 में अंग्रेजी का पहला गजेटियर बना था और उसके एक दशक बाद राय बहादुर हीरालाल ने हिंदी वालों के लिए छोटे-छोटे और जिलावार गजेटियर शुरू किए. उन्हें अनुप्रास अलंकार में नाम दिए गए. जैसे, नरसिंहपुर जिले के गजेटियर का नाम रखा- नरसिंह नयन. इसी तरह, जबलपुर ज्योति, होशंगाबाद हुंकार, सागर सरोज और रायपुर रश्मि आदि चलन में आए. इनमें आप अपने समय के सूखे और अकाल के ब्यौरे सहित कई प्रसंग खंगाल सकते हैं.

संग्रहालय का दूसरा बड़ा काम 1509 से 1925 तक की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज है. यहां मनुस्मृति से लेकर झांसी की रासो तक की हजारों पांडुलिपियां हैं. हाल ही में संग्रहालय को गोस्वामी तुलसीदास की श्री रामविवाह की हस्तलिखित पांडुलिपि मिली है. इसके अलावा हिंदी के ख्यातिनाम साहित्यकार सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, हजारी प्रसाद द्विवेदी और भवानी प्रसाद मिश्र के पत्राचार संकलन संग्रहालय की नई उपलब्धि हैं. इन पत्रों में अपने समय के अहम मुद्दों पर चला विमर्श है. यही वजह है कि पटना से प्रकाशित होने वाले अखबार के प्रभात खबर के संपादक हरिवंश सप्रे संग्रहालय को शब्दों और विचारों की विपुल संपदा का रक्षक बताते हैं. वे कहते हैं, ‘हिंदी में ऐसी दूसरी संस्था नहीं. हिंदी इलाकों में संस्थाओं के क्षय का रोना चलता रहता है पर विपरीत परिस्थितियों में ऐतिहासिक महत्व की संस्था बनाना कोई यहां से सीखे.’ 25-30 साल का अरसा कुछ नहीं होता. मगर इतने कम समय में ही यह शोधार्थियों का नया ठिकाना बन गया है. सप्रे संग्रहालय में देश के कई विश्वविद्यालयों के हजारों शोधार्थियों ने शोध पूरे किए हैं. वहीं कई साहित्यकारों को जब कोई जरूरी दस्तावेज कहीं नहीं मिला तो उन्हें यहां आकर कामयाबी मिली. इन्हीं में अपनी मौत से ठीक पहले यहां आए कमलेश्वर भी हैं. वे हिंदी-उर्दू पर काम करने वाले थे और यहां आकर उन्हें उनके काम की किताब मिल गई. संग्रहालय में हिंदी के बाद सबसे बड़ा जखीरा उर्दू का दिखता है. यहां भोपाल सहित, लाहौर, हैदराबाद, लखनऊ, बरेली और दिल्ली के कई पुराने अखबार हैं.

[box]यहां मनुस्मृति सहित हजारों पांडुलिपियां हैं. हाल ही में संग्रहालय को गोस्वामी तुलसीदास की श्री रामविवाह की हस्तलिखित पांडुलिपि मिली है[/box]

देश के विभाजन से पहले भोपाल उर्दू का बड़ा गढ़ था और इसलिए पाकिस्तान के कौकब जमील जैसे मशहूर पत्रकार-लेखक अपने शोध के लिए भोपाल आते हैं. संग्रहालय की निदेशक मंगला अनुजा बताती हैं, ‘जब दुनिया भर की खाक छानकर कोई यहां आए और उन्हें उनके काम की सामग्री मिल जाए तो आत्मसंतुष्टि मिलती है.’ अनुजा विदेश के अनेक शोधार्थियों के लिए कई बार दुर्लभ सामग्री जुटा चुकी हैं. जापान की शोधार्थी हिसाए कोमात्सु का ही किस्सा लें. वे चार साल पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘हिंदी क्षेत्र में स्त्री का स्त्री विमर्श’ विषय पर शोध कर रही थीं. और उन्हें 1857 से 1947 के अखबारों की तलाश थी. कोमात्सु ने एक दिन कहीं सप्रे संग्रहालय से जुड़ी खबर पढ़ी और भोपाल आ गईं. तीन साल दिल्ली में भटकने के बाद आखिर उन्हें यहां अपने शोध के लिए जरूरी जानकारी का भंडार मिल गया.

इन दिनों यहां पहले दिन से आज तक उपयोग में लाए गए कैमरों और रेडियो को खोजने का काम चल रहा है. फिलहाल यदि आपको देखना है तो द्वितीय विश्वयुद्ध के जमाने में सेना के उपयोग के लिए लाया गया ट्रांसमीटर देख सकते हैं. आप चाहें तो यहां 1948 में बापू की हत्या का समाचार सुनाने वाले रेडियो की तस्वीर भी खींच सकते हैं. भारतीय पत्रकारिता की तकरीबन डेढ़ सौ साल की झलकियां देखकर जब आप फिर से संग्रहालय के प्रवेशद्वार पर आते हैं तो यहां रखी तोप आपको चौंकाती नहीं है.  इस तोप के नीचे अकबर इलाहाबादी का सबसे ज्यादा दोहराया जाने वाला वह शेर लिखा है, ‘…जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो.’  इसे देखकर सहसा आप महसूस करते हैं कि प्रतीक के तौर पर ही सही भेलसा (विदिशा) से आई 17वीं सदी की तोप शायद पत्रकारिता के इतिहास की रक्षा के लिए ही यहां तैनात है.

पत्रकार और सूत्रधार
‘जाके पांव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई.’ मध्य प्रदेश में यह कहावत खूब कही-सुनी जाती है. और नरसिंहपुर जिले के बोहानी गांव से मीडिया की दुनिया के संवेदनशील रिपोर्टर, संपादक, पत्रकारिता के उम्दा लेखक तथा सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय की नींव डालने वाले विजयदत्त श्रीधर पर तो यह सटीक बैठती है. दरअसल अस्सी के दशक में मप्र की पत्रकारिता के इतिहास पर किताब लिखने के लिए जब श्रीधर को इधर से उधर भटकना पड़ा तो उन्हें लगा कि लेखकों के लिए संदर्भ सामग्री को एक छत पर लाना कितना जरूरी है. उन्हें यह एहसास भी हुआ कि समाचार पत्र-पत्रिकाएं केवल पत्रकारों और प्रकाशकों का ब्योरा ही नहीं देतीं बल्कि उनमें समसामयिक घटनाक्रम के साक्ष्य भी होते हैं और इसीलिए राष्ट्र की इस बौद्धिक धरोहर को बचाना चाहिए. मगर सामग्री संकलन का काम कोई आसान नहीं होता.

श्रीधर बताते हैं कि जब तक सामग्रीदाता को यह भरोसा न हो जाए कि आप उनकी अमानत को बचाकर रख पाएंगे तब तक कोई आपके हाथों कुछ सौंपता भी नहीं है. ऐसा कई बार हुआ कि किन्हीं ने पहले सामग्री देने के लिए हां कह दी और बाद में वहां से खाली हाथ ही लौटना पड़ा. लेकिन बुजुर्गों ने हमेशा समझाया कि जब झोली फैलाई है तो अहं को सिर नहीं उठाने देना. बकौल श्रीधर, ‘जबलपुर में सामग्री संकलन अभियान के अहम सहयोगी शंकर भाई ने हमारे लिए एक संबोधन गढ़ा- ‘कबाड़ी.’ जब कभी जबलपुर जाना होता, वे संदर्भ सामग्री देने वालों से कहते भोपाल से कबाड़ी आएं हैं, अपना कबाड़ खाली कर दो. जिस अदांज में शंकर भाई कबाड़ी कहते वह किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था.’ दरअसल ऐसी सामग्री श्रीधर को हमेशा अपने कंधों पर ढोनी पड़ी है. ऐसी ही मशक्कत के चलते सबका उन पर भरोसा बढ़ता गया. वहीं सप्रे संग्रहालय ने अपने पहले पड़ाव से ‘मैं’ की जगह ‘हम’ को अपनाया और इसीलिए पहले प्रदेश और फिर देश भर में संग्रहालय का एक कुटुंब बन गया.

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