पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 चुनावी बिसात और मोहरे

कांग्रेस की आंतरिक कलह का सबसे ज़्यादा लाभ आम आदमी पार्टी को मिल सकता है। सन् 2017 विस चुनाव में पार्टी ने लगभग 23 फ़ीसदी वोट हासिल किये और उनके 20 विधायक जीते। पार्टी का पूरा ज़ोर इसी मत-फ़ीसद को बढ़ाने का है इसके लिए मुफ़्त की घोषणाएँ उन्हें ज़्यादा कारगर लगी। फ़िलहाल संगरूर से पार्टी के सांसद भगवंत मान प्रमुख चेहरे के तौर पर हैं; लेकिन वे बहुत प्रभावशाली साबित नहीं हो पा रहे हैं। सांसद होने के नाते वह केंद्र की भाजपा सरकार और राज्य में कांग्रेस में सरकार की आलोचना में सबसे मुखर रहते हैं।

पार्टी शुरू से ही किसान आन्दोलन की समर्थक रही है, नेताओं को लगता है कि चुनाव से पहले अगर स्थिति ऐसी ही बनी रहती है, तो आप ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ज़्यादा बढ़त हासिल करेगी। शहरी क्षेत्रों में पार्टी पहले से ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद पाले हुए है। राज्य में विपक्षी पार्टी के तौर पर आप की भूमिका ज़्यादा प्रभावशाली नहीं रही है। पार्टी का पूरा ज़ोर ग्रामीण स्तर पर संगठन को मज़बूत करने पर है। पार्टी नेताओं को लगता है कि चुनाव से पहले पार्टी का घोषणा-पत्र ही उनके लिए वरदान साबित होगा। जिस तरह से दिल्ली में मुफ़्त की घोषणाओं ने वहाँ सत्ता का दरवाज़ा खोल दिया था, पंजाब में भी ऐसा होना सम्भव है।

राज्य में आधे दर्ज़न से ज़्यादा अकाली दल हैं। चुनाव में इनका अलग से कोई वजूद नहीं होगा लिहाज़ा उन्हें किसी-न-किसी पार्टी से तालमेल करना पड़ेगा। शिरोमणि अकाली दल से टूटकर बने इन दलों की ज़्यादा हैसियत नहीं है; लेकिन सीधे मुक़ाबले में ये मुख्य दल शिअद को ही नुक़सान पहुँचाएँगे। पिछले चुनाव में शिअद और भाजपा का गठजोड़ था; लेकिन उसका हिस्सा क़रीब 9.4 फ़ीसदी रहा; जबकि भाजपा का वोट 1.8 फ़ीसदी ही था। तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में शिअद ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और भाजपा से रिश्ते तोड़ लिये। इस बार शिअद ने बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ किया है।

पिछले चुनाव में बसपा ने सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ा था; लेकिन एक भी सीट नहीं मिली, और 1.5 फ़ीसदी वोट मिले। बावजूद इसके शिअद ने गठजोड़ किया है। दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग में बसपा का आधार ठीक है। इसी का फ़यदा उठाने के लिए शिअद ने सबसे पहले गठजोड़ की शुरुआत कर दी है। हालाँकि सीटों को लेकर दोनों में कुछ तकरार है; लेकिन इसे दूर किया जा सकता है।

शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल ने पार्टी की सरकार बनने पर शुरुआती 400 यूनिट बिजली मुफ़्त देने की घोषणा की है। इसके अलावा सरकार बनने पर उप मुख्यमंत्री किसी हिन्दू या दलित को बनाने का ऐलान भी किया है। राज्य में सवर्ण वोट 33 फ़ीसदी के क़रीब हैं। सुखबीर की नज़र उप मुख्यमंत्री की बात कह हिन्दुओं के साथ दलित वोट बैंक पर भी है। आने वाले दिनों में आप और शिअद की होड़ ऐसी ही घोषणाओं से होने वाली है। किसान आन्दोलन की वजह से कभी सत्ता में भागीदार रही भाजपा बहुत मुश्किल में है। अकेले तौर पर पार्टी ऐसी स्थिति में नहीं कि ठीकठाक प्रदर्शन कर जाए। फ़िलहाल तो उनके नेताओं और पदाधिकारियों का बाहर निकलना तक मुश्किल हो रहा है। चुनाव से आन्दोलन की दिशा पर पार्टी  का भविष्य तय होगा। शिअद तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने के पक्ष में है। इसी मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री रही हरसिमरत कौर बादल ने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। कांग्रेस और आप शिअद पर आरोप लगाते हैं कि जिस पार्टी ने तीन कृषि क़ानूनों का पास होने के दौरान समर्थन किया वही अब विरोध कर रहे हैं। शिअद अगर तीन कृषि क़ानूनों का संसद में विरोध करती और पास होने से पहले सरकार से हट जाती, तो आज स्थिति कुछ और होती। कांग्रेस और आप नेता शिअद का तीन कृषि क़ानूनों पर किसानों का समर्थन घडिय़ाली आसू बता रहे हैं। इसमें काफ़ी हद तक सच्चाई भी है; क्योंकि समय रहते शिअद ने निर्णायक फ़ैसला नहीं लिया। ऐसे में आन्दोलन का फ़ायदा उसे कितना मिलेगा? यह तो इसकी दिशा तय होने पर ही पता चलेगा।