नीतीश बाबू क्या रोक पाएंगे राज्य में उन्माद

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एक जमाना था बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुशासन बाबू कहलाते थे। अब तो प्रदेश में शराब बंदी संशोधित हो गई। पड़ोसी राज्यों की तरह उन्माद की घटनाएं भी बढऩे लगी। जैसे देश में भाजपा राहुल और कांग्रेस मुक्ति का जेहाद छेड़े है उसी तरक बिहार में भी विपक्ष मुक्त की हवा बनाई जा रही है। महिलाओं पर अत्याचार, उन्माद के चलते तीन जि़लों में मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं हो चुकी हैं।

मुख्यमंत्री बीमार थे। अचानक बाहर सितंबर को उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था पर बैठक की। जो पुलिस के आला अफसर नहीं पहुंच पाए उनके लिए वीडियों कांफ्रेंस हुआ। यह निर्देश दिया गया कि थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी अपने क्षेत्र की कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे और कार्रवाई करेंगे। मामला गंभीर होने पर जिलाधिकारी को रपट देंगे। अब मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और मॉब लिंचिग के मामलो पर कार्रवाई हो।

जब पुलिस महानिदेशक एस द्विवेदी ने पद भार संभाला था तब उन्होंने भी यही कहा था। लेकिन थानों ने नहीं सुना। बैठक में खुला कि रोहतास, सीतामढ़ी और बेगूसराय में ज़्यादा मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर रोक लगे और दूसरे जि़लों में ज़्यादा सावधानी बरती जाएगी। यह जानकारी भी आई कि ज़मीन के विवाद के चलते हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। साथ ही सांप्रदाियक हिंसा के लिए जिम्मेदार जनता के प्रतिनिधि, विधायक, और मंत्री से जुड़े लोगों को कतई बख्शा न जाए।

गौरतलब है कि नवादा में सांप्रदायिक हिंसा की घटना में गिरफ्तार कथित अभियुक्तों से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने मुलाकात की थी। ऐसी ही एक घटना में केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने कथित अभियुक्तों को माला पहना कर सम्मान किया था। ऐसी घटनाओं से समाज में संशय और विवाद बढ़ा है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अस्वस्थ हो जाने की वजह से अपराध समीक्षा बैठक टल गई। बैठक कब होगी, इसके बारे मेें अभी तक कुछ तय नहीं है। राज्य में लगातार हो रही अपराध की घटनाओं से आम लोगों की अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। अपराध की घटनाएंं, खासकर महिलाओं के साथ होने वाली अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं, वे यह भी मानने लगे हैं। लेकिन पुलिस अधिकारियों का दावा अपराध की कई घटनाएं घटने का है। इस राज्य मेें भीड़ द्वारा किसी की हत्या करने की घटनाएं नहीं होती थी। लेकिन अब इसकी भी शुरुआत हो गई है हालांकि पुलिस प्रशसान इसे अपराधियों द्वारा हत्या बताने में जुटी है। अपराध के मद्देनज़र लोगों का पुलिस प्रशासन और सरकार पर भरोसा खत्म होता जा रहा है। लोगों को इस पर भी अचरज है कि नीतीश कुमार अपराध और अपराधियों पर काबू पाने में क्यों विफल हो रहे हैं। बारह साल पहले सत्ता के आने के शुरू में उन्होंने अपराधियों पर बखूबी नकेल कसा था। अपराध एकाएक घटे थे। जो बड़े-बड़े अपराधी किसी तरह अदालती सजा से बच गए थे, उनके मामलों को फिर से खुलवाया गया था और उन्हें सजा मिली थी। लोगों को उन पर और पुलिस प्रशासन पर नाज होने लगा था। नीतीश कुमार ने यह दिखा दिया था कि अपराधियों पर कैसे नकेल कसी जा सकता है और कानून का राज कायम हो सकता है।

कुछ खबरों पर नज़र डालिए। बेगूसराय मेें सात सितंबर को भीड़ ने तीन युवकों को पीट कर मार डाला। बताया गया कि युवकों ने एक युवती का अपहरण करने की कोशिश की। इसलिए भीड़ ने उन्हें पीट-पीट कर मार डाला। 8 सितंबर को सासाराम में एक महिला को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। उसे जादू-टोना करने वाली महिला बताया गया। 10 सितंबर को सीतामढ़ी के रीगा में एक बाइक सवार युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इसके पीछे राहजनी की घटना बताई जा रही है। 11 सिंतबर को सासाराम में ही एक कर्मचारी को गोली से भून दिया गया जब वह बैंक जा रहा था। बिहिया में एक महिला को नंगा कर घुमाया गया था, इस घटना को लोग भूल नहीं पाए हैं। बैक डकैती की घटनाएं आम घटनाओं की तरह होने लगी है। रेल में चोरी, डकैती की घटनाएं इतनी होने लगी हैं कि बिहार से गुज़रते वक्त यात्री सहमे रहते हैं। डिब्बे से यात्रियों को फेंक देने की घटनाएं आम हो गई हैं। अव्वल तो ऐसी घटनाओं को दर्ज ही नहीं करती। दूसरे लोग भी डर से थाने नहीं जाते।

मुजफ्फरपुर बाला सुधार गृह के कांड की चर्चा अभी थमी नहीं है। पटना के भी सुधार गृह की घटना पर चर्चा चल ही रही है। मौजूदा साल के जून तक महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या सात हज़ार 683 है। इनमें बलात्कार की एक हज़ार 862, अपहरण की दो हज़ार 390, हत्या की 575, दहेज प्रताडऩा की एक हज़ार 535, छेडख़ानी की 890 प्रताडऩा की एक हज़ार 611 घटनाएं हैं। पिछले साल महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या 15 हजार 784 है। बलात्कार की एक हजार 199, अपहरण की छह हजार

817 दहेज हत्या की एक हजार 81, प्रताडऩा की चार हजार 873 और छेडख़ानी की एक हजार 814 घटनाएं हैं। इससे आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपराध के मामले में राज्य की क्या स्थिति है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद गृह विभाग को देखते हैं। वे शुरू में जब सत्ता में आए थे, तो अपराधी-राजनीतिक नेताओं-सरकारी अधिकारियो के गठजोड़ पर कसके प्रहार किया था। उसका अच्छा नतीजा भी निकला। तमाम छोटे-बड़े अपराधी पकड़े गए। कुछ अपराधी राज्य छोड़ कर किसी दूसरे राज्य मेें चले गए। पुलिस प्रशासन को राजद नेता शाहबुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई करने में कामयाबी मिली। भागलपुर सांप्रदायिक दंगों में जिन अभियुक्तों को सज़ा नहीं मिल पाई थी, उनके मामले पर फिर से विचार हुआ और उन्हें सज़ा मिली। नीतीश कुमार ने अपराधियों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण पर रोक लगवाई। यह भी उपाय किए गए कि अपराधी किसी पुलिस अधिकारी का भी आशीर्वाद प्राप्त न कर सके। अपराधियों और उनके मददगारों के खिलाफ ऐसा माहौल तैयार हुआ। लोगों में, खास कर महिलाओं में उनका खौफ खत्म हुआ था। पटना के डाक बंगाल चौराहे पर देर रात तक महिलाएं खरीदारी और तफरी करती दिखती थीं। नीतीश कुमार जब अपराध और अपराधियों पर काबू पाने की अपनी कामयाबी बावत इस बात का जि़क्रकरते थे, तो लोगों को उनकी बातों पर केवल विश्वास ही नहीं होता था बल्कि उनके प्रति आस्था भी जागती थी। लेकिन जब नीतीश कुमार का पहला शासनकाल समाप्त हुआ और दूसरा शासनकाल शुरू हुआ, उसमें स्थिति बदलने लगी। तीसरी बार सत्ता में आने के बाद राजद राज की स्थिति जैसी स्थिति वापस लौटती दिखती है।

नीतीश कुमार कानून के राज के बारे में पहले जैसा नहीं बोलते, यों कहें जिक्र तक नहीं करते। अब यह कहने लगे हैं कि अपराध तो होते रहता है। अपराध नहीं होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन अपराध कर अपराधी बच नहीं सकता। उसे पकड़ा जाएगा और सज़ा मिलेगी।

दूसरे मंत्री यह तर्क देते फिर रहे हैं कि दूसरे राज्यों की तुलना में इस राज्य में अपराध कम ही हो रहे हैं। इस मामले में इस राज्य का स्थान बहुत नीचे 17वां है। लेकिन उनके पास इसका कोई जबाव नहीं है कि नीतीश कुमार के शासनकाल के शुरू में जो अच्छी स्थिति थी, वैसी स्थिति अभी क्यों नहीं है।

विरोधी पार्टियों को राज्य की कानून व्यवस्था को लेकर नीतीश कुमार और सरकार पर भारी पडऩे का मौका मिल रहा है। राजद और विपक्षी दल के नेता तेजस्वी यादव ने तो अपराध को एक बड़ा मुद्दा बना कर अपनी गतिविधियां तेज भी की है। भाकपा (माले) ने अपने आंदोलन का इसे बड़ा मुद्दा बनाया है।

जानकार राज्य में अपराध के बढ़ते जाने के पीछे यह बताते हैं कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा है। अपराधी पुलिस अधिकारियों से भी संबंध बनाने लगे हैं। फिर अपराधी, राजनीतिक नेता और पुलिस का गठजोड़ बनने लगा है। अपराधी खुले आम घूमने लगे हैं और अपना-अपना इलाका तय करने लगे हैं। जेलों में रह रहे अपराधियों की गतिविधियां तेज हुई हैं। वे जेल में बैठे अपने गिरोह का संचालन करने लग गए हैं। ऐसी कोई भी जेल नहीं है जहां अपराधियों के पास मोबाइल फोन न हो। उनके गिरोह के अपराधी उनसे मिलते जुलते न हों। सूबे में शराबबंदी की वजह से अपराधियों को अवैध शराब बेचने का नया धंधा मिल गया है। अपराधियों को थाने में बढ़े भ्रष्टाचार से भी शह मिली है।