नीतीश की नीति पर शाह की मुहर?

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नीतीश कुमार दिल्ली जाकर अमित शाह से मुलाकात कर आए। बातचीत क्या हुई, इसका पूरा खुलासा नहीं होने के बाजवूद उनके करीबी नेता यह मान कर चल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव का ऐलान होने के पहले ही जद (एकी), भाजपा, लोजपा और रालोसपा के बीच सीटों का बंटवारा हो जाएगा। चारों पार्टियों के नेताओं को अपने-अपने आला नेताओं पर भरोसा है। लेकिन भाजपा एक तरफ है तो दूसरी तरफ बाकी तीनों पार्टियां हैं। यों कहें एक तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैं और दो दूसरी तरफ जद (एकी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा हैं। नीतीश कुमार की ओर से अख्तियार नई रणनीति के मुताबिक सामाजिक न्याय के नाम पर पासवान और कुशवाहा नीतीश कुमार के करीब हुए हैं। अमित शाह दबाव की राजनीति के मद्देनजर इसे नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं।

अमित शाह नीतीश कुमार से बातचीत करने के लिए पहले पटना आए और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को आश्वस्त किया था कि उनके बीच कोई अड़चन पैदा नहीं होगी और वे एक दूसरे के हित और मान-सम्मान का खयाल करेंगे। नीतीश कुमार के भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाने के बाद पहली बार अमित शाह पटना आए थे और वह भी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर नीतीश कुमार से मुलाकात करने के लिए आए थे। दूसरी बार खुद नीतीश कुमार ने दिल्ली जाकर अमित शाह से मुलाकात की। गौरतलब है कि जद (एकी) के सांसद हरिवंश को उप राष्ट्रपति बनने के बाद  नीतीश कुमार अमित शाह से मुलाकात करने दिल्ली पहुंचे थे। भाजपा ने केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में जद (एकी) को कोई जगह नहीं दी थी और नीतीश कुमार को यह अखरा था। लेकिन जद (एकी) की झोली से उप राष्ट्रपति का पद भी छिन जाने से कोई मलाल नहीं अब। दोनों ओर से कोशिश यह है कि लोकसभा की सीटों के बंटवारे में भी किसी को कोई मलाल नहीं रह जाए। लेकिन यह आसान नहीं है।

जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार ने अपनी स्थिति मजबूत के लिए सामाजिक न्याय के आधार की रणनीति अख्तियार की। नीतीश कुमार की तरह ही रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा आखिर सामाजिक न्याय की धारा के ही नेता हैं। नीतीश कुमार और भाजपा के बीच करीबी और सूबे में सरकार बनने के बाद रामविलास पासवान नीतीश कुमार के करीब आए। खुद नीतीश कुमार भी यही चाहते थे। इसलिए उन्होंने रामविलास पासवान  के छोटे भाई पशुपति नाथ पारस को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया और विधान परिषद का सदस्य बनाया। उसी समय यह निश्चित हो गया कि लोकसभा चुनाव के वक्त भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे में नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ऐसी रणनीति अख्तियार करेंगे जिससे एक दूसरे की मदद हो। बाद में उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश कुमार के करीब हो गए। नीतीश कुमार और कुशवाहा, दोनों एक दूसरे का खयाल करेंगे।

जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार चाहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में जिन सीटों पर लोजपा और रालोसपा की जीत हुई थी, वे सीटें उन्हीं के पास रहे। पिछले लोकसभा चुनाव में लोजपा की छह सीटों पर जीत हुई थी और रालोसपा की तीन सीटों पर जीत हुई थी। लोजपा ने सात सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन एक सीट पर वह हार गई थी। लेकिन रालोसपा ने तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और तीनों सीटों पर उसकी जीत हुई। नीतीश कुमार का कहा लोजपा नहीं टाल सकती। रालोसपा भी नीतीश कुमार का कहा मानेगी। इसके पीछे बात यह भी है कि लोकसभा चुनाव के एक साल बाद यानी 2020 मेें सूबे में भी विधानसभा चुनाव है। विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में नुकसान न हो, दोनों पार्टियों को इसकी चिंता है। नीतीश कुमार चाहते हैं कि बाकी सीटें जद (एकी) और भाजपा के बीच आधी-आधी बांट ली जाए। ऐसा होने पर भाजपा को जीती हुई पांच-छह सीटों को छोडऩा पड़ेगा। भाजपा ऐसा कर पाएगी, यह अभी साफ नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में जद (एकी) को केवल दो ही सीट मिल पाई थी हालांकि सूबे की कुछ 40 सीटों पर उसने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा या राजग को ज्यादा कामयाबी इसलिए भी मिल पाई थी कि सभी पार्टियों ने अल-अलग ज़ोरअजमाइश की थी। उसी से सबक लेकर एक साल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा विरोधी पार्टियों ने महागठबंधन बनाया और भाजपा के सामने संकट खड़ा हुआ।

जानकारों के अनुसार इस बार होने वाला लोकसभा चुनाव बिल्कुल भिन्न स्थिति मेें होने वाला है। पिछले लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसके बारे में कोई राय बनाना बेमतलब हो सकता है। राजग में जद (एकी) ज़रूर है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वह छवि नहीं है, जो पहले थी। सूबे में महागठबंधन की भी वैसी स्थिति नहीं है, जो पहले थी। महागठबंधन के अगुआ नेता लालू प्रसाद की गैर मौजूदगी में महागठबंधन के मौजूदा नेताओं में वह माद्दा नहीं है कि अपने वोटरों को बांध सकें। महागठबंधन की अगुआ पार्टी राजद की स्थिति पर दूसरे सहयोगी दलों की स्थिति निर्भर है। लालू प्रसाद की गैर मौजूदगी से राजद की भूमिका पर सवालिया निशान है। राजग इसका फायदा उठाने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहेगी। जद (एकी) आला नेता नीतीश कुमार को इसका खासा अंदाजा है। इसी आधार पर वे अमित शाह के सामने यह मांग रख सकते हैे कि भाजपा अपने बराबर ही जद (एकी) को सीटें दे।

भाजपा को इसका अंदाज़ है कि नीतीश कुमार को साथ रख कर विरोधियों से निबटा जा सकता है। वह नीतीश को किसी भी सूरत में नाराज़ नहीं होने देना चाहेगी। सूबे मेें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही आगे रख कर चुनाव लड़ा जाएगा। वैसे भी थोड़े त्याग से बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने के दांवपेंच में भाजपा पीछे नहीं हैं।

नीतीश को अपनी पार्टी की ओर से अधिकृत किया जा चुका है कि सीटों के बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तय करने तक वे जो तय करेंगे, पार्टी उस पर अमल करेगी।