नातेदारी और मारामारी

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राजनीतिक दलों के भीतर प्रत्याशियों के चयन में जिस ढंग से रिश्तेदारियां निभाई गई हैं उससे इन दलों की न केवल बीते सालों की चुनावी तैयारियां धरी की धरी रह गई हैं बल्कि अनुशासन का तंत्र भी तार-तार हो गया है. सबसे पहले यदि हम सत्तारूढ़ भाजपा को देखें तो पार्टी ने लगभग साल भर पहले सर्वे कराके अपने मंत्रियों और विधायकों की मैदानी हकीकत का पता लगाया था. इस आधार पर पार्टी के सभी विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार हुआ. इसके मुताबिक लगभग एक दर्जन मंत्रियों सहित 70 से 75 विधायकों को हारने वाली स्थिति में बताया गया था. ऐसे में तैयारी थी कि योग्यता के आधार पर कई नए चेहरों को मौका दिया जाए. लेकिन हुआ इसके ठीक उलटा. और ज्यादातर उन्हीं विधायकों को टिकट दिया गया और जिनका टिकट कटा वहां नेताओं के रिश्तेदारों को मौका मिल गया.

कुछ दिनों पहले ही जबलपुर कैंट से भाजपा विधायक और विधानसभा अध्यक्ष रहे ईश्वरदास रोहाणी की मौत के बाद सहानुभूति की लहर का लाभ उठाने के लिए भाजपा ने इसी सीट पर उनके पुत्र अशोक रोहाणी को टिकट दिया है. इसी रणनीति के तहत पार्टी ने सुनील नायक की मौत के बाद उनकी बेटी अनीता नायक को भी पृथ्वीपुर (टीकमगढ़) से मैदान में उतारा है. वरिष्ठ पत्रकार एनडी शर्मा के मुताबिक, ‘राजनीतिक दलों का परिवारवाद को इस तरीके से समर्थन देना एक तरह से जागीरदारी प्रथा का ही नया रूप है. इससे जहां लोकतंत्र की नींव कमजोर हुई है वहीं राजनीति में योग्य लोगों के लिए दरवाजे भी बंद हुए हैं.’ जहां तक मप्र की राजनीति का सवाल है तो टिकटों को लेकर होने वाले असंतोष में परिवारवाद ने आग में घी डालने जैसा काम किया है. यही वजह है कि कई दावेदार अब ताल ठोककर पार्टी के खिलाफ ही खड़े हो गए हैं. इस बारे में भाजपा प्रदेश संगठन के मुखिया नरेंद्र तोमर का मानना है, ‘टिकट-वितरण के बाद विरोध होता ही है लेकिन बगावत की स्थिति में भी पार्टी का फैसला नहीं बदलेगा.’

दूसरी तरफ, सत्ता में वापसी की कवायद करने वाली कांग्रेस पर उन्हीं के बड़े नेताओं का भाई-भतीजावाद भारी पड़ गया. कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं की संख्या अच्छी-खासी है जिन्होंने मैदानी कार्यकर्ताओं की कीमत पर अपने नातेदारों को टिकट दिलाने में कामयाबी हासिल की है. हालांकि बगावत का डर कांग्रेस को पहले से सता रहा था और यही वजह है कि उसने टिकटों की घोषणा नामांकन की तारीख के एक दिन पहले ही की. दिलचस्प है कि काफी अरसे से कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तर्ज पर मप्र में भी राहुल गांधी फॉर्मूला चलाने की चर्चा जोरों पर थी. इसके तहत ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर जमीन से जुड़े योग्य नेताओं को वरीयता देने का दावा किया गया था. किंतु कांग्रेस के नेता मप्र में भाजपा की कड़ी चुनौती के बावजूद नातेदारी निभाने का मोह नहीं छोड़ सके.

इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अर्जुन सिंह के पुत्र और कांग्रेस से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने चुरहट (सीधी) सीट पर पिता की विरासत को संभालते हुए खुद को स्थापित किया है. लेकिन चुरहट के आस-पास के इलाके पर नजर दौड़ाएं तो जाहिर होता है कि टिकट पाने वालों में हर तरफ अजय सिंह के नाते-रिश्तेदारों की पूछ-परख रही है. जैसे कि अर्जुन सिंह के साले सुरेंद्र सिंह मोहन के बेटे राजेंद्र सिंह को कांग्रेस ने अमरपाटन (सतना) और अर्जुन सिंह के दामाद भुवनेश्वर प्रसाद सिंह को सिंगरौली से टिकट दिया है. ऐसे में सालों से वंशवाद का आरोप झेल रही कांग्रेस ‘शहजादों की नई फसल’ से जुड़े सवालों पर मौन है. लेकिन पार्टी के एक पदाधिकारी का मानना है, ‘अब यह साफ हो चुका है कि क्षत्रप नेताओं के सामने दिल्ली का हाईकमान बहुत बौना है. पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज नहीं है. और ऐसा लगता है कि बड़े नेता दिल्ली से टिकट छीनकर अपनों को चुनाव लड़वा रहे हैं.’

जाहिर है यह चुनाव मप्र में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही वंशवाद की राजनीति के लिए अभूतपूर्व साबित होने जा रहा है और साथ में खतरनाक संकेत भी दे रहा है कि यदि यह प्रवृत्ति आगे बढ़ी तो राज्य में शासन की कमान कुछ परिवारों के हाथ में ही सिमट जाएगी.

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