नर्तक शिक्षक

जस्टिन को पहली बार स्टेज पर देखने वाले शायद हैरान हो सकते हैं कि विदेशी होने के बाद भी कोई इतना अच्छा भरतनाट्यम नृत्य कैसे कर सकता है लेकिन जस्टिन को एक बार करीब से जानने के बाद आप खुद जान जाऐंगे कि वे कितने भारतीय हैं और भरतनाट्यम के लिए कितने जरूरी भी. भरतनाट्यम के अलावा जस्टिन को छऊ, मणिपुर की रासलीला, केरल का कुड्डियाटम जैसे दूसरे भारतीय नृत्य भी बेहद पसंद हंै, ‘कुड्डियाटम बड़ा ही अद्भुत नृत्य है. इसके बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि कालिदास के समय में कुछ इसी तरह का नृत्य होता था. साथ ही मुझे ओडिसी भी बेहद पसंद है. ओडिसी शुरू में तीन साल सीखा भी. लेकिन जब मुझे लगा कि मैं दो शैलियां एक साथ ठीक से नहीं कर पा रहा हूं तो मैंने फिर भरतनाट्यम को ही अपना पूरा समय दिया.’ भरटनाट्यम नृत्य के वक्त धोती की तरह बांधी जाने वाली कांचीवरम साड़ियों का जस्टिन के पास काफी बड़ा कलेक्शन है. धोती से अपने विशेष लगाव को उत्साह के साथ बयान भी करते है, ‘मुझे धोती बहुत पंसद है, मेरा बस चले तो मैं हर रोज धोती बांधू. लेकिन अगर धोती पहनकर घूमने जाऊंगा तो लोगों को अजीब लगेगा इसलिए सिर्फ नृत्य के समय ही पहनता हूं.’

जस्टिन को हिंदुस्तानी खाना भी हिंदुस्तान की ही तरह पसंद है. अमेरिकी लाइफस्टाइल की कमी महसूस नहीं करने वाले शाकाहारी जस्टिन के अनुसार, ‘मुझे बंगाली, मराठी, गुजराती, उत्तर भारतीय खाना बहुत ही पसंद है. मीठे में मुझे गुलाबजामुन पसंद है और खासतौर पर सर्दियों में गरम चावल घी और शक्कर के साथ मेरा पसंदीदा है.’ वे हिंदी फिल्मों की बात भी इसी उत्साह से करते हैं, ‘पुरानी फिल्मों में मुझे पड़ोसन, साहब बीवी और गुलाम बेहद पसंद है. एक जमाने में हिंदी सीखने के लिए अमिताभ बच्चन, रेखा, हेमा मालिनी और जितेंद्र की ढेर सारी हिंदी फिल्में देखा करता था.’

श्रीराम कला केंद्र के साथ जस्टिन का जुड़ाव भी कम रोचक नहीं है. उन्हीं के शब्दों में, ’यहां पर 10 साल तक भरतनाट्यम सीखने के बाद मैं पिछले 21 साल से यहां भरतनाट्यम सिखा रहा हूं. पहले मैं असिस्टेंट टीचर बना और फिर पूर्णकालिक. अर्थात पिछले 31 साल से मैं इस केंद्र से जुड़ा हुआ हूं और एक चपरासी के बाद सबसे पुराना आदमी भी हूं यहां पर.’ जस्टिन ने दिल्ली के मशहूर मंडी हाउस को भी काफी बदलते देखा है, ‘पहले मंडी हाउस कला, संस्कृति और नृत्य की फलती-फूलती, जानदार और धूम-धड़ाके वाली जगह हुआ करती था. यह वो जमाना था जब नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता जैसे कलाकार एनएसडी में थे और जींस, खादी कुर्ता और झोला टांगे लड़के-लड़कियां मंडी हाउस के बंगाली मार्केट में पाए जाते थे. अलग ही तरह का माहौल हुआ करता था तब. आज के मंडी हाउस में वह बात नहीं रही. काफी बदल गया है.’

जस्टिन मैकार्थी  ने कभी सोचा नहीं था कि वह भरतनाट्यम में इस मुकाम पर पहुंचेंगे. आखिर तक हिंदुस्तान में रहने की चाहत रखने वाला यह भरतनाट्यम गुरू आज की पीढ़ी के लिए आदर्श है. भले ही भरतनाट्यम के प्रति युवाओं, खासकर लड़कों, के घटते रुझान पर जस्टिन मैकार्थी चिंतित हंै लेकिन उनकी यह उम्मीद खत्म नहीं हुई है कि युवा इस शास्त्रीय नृत्य शैली की तरफ जरूर मुड़ेंगे और भरतनाट्यम कुछ-एक शास्त्रीय समारोहों से निकल कर पूरे देश में वह सम्मान जरूर पाएगा जिसका वह हकदार है.

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