नये राजनीतिक मोर्चे की तैयारी

एक और बात गौर करने लायक है। चार राज्यों  और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव की बात पर पवार ने दावा किया है कि भाजपा असम के अलावा बाकी चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव हारेगी। असम में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है और वहाँ मुकाबला एकतरफा नहीं है। लेकिन यूपीए का हिस्सा होते हुए भी पवार ने कांग्रेस के जीतने की बात नहीं कही। उन्होंने यह जरूर कहा कि इन राज्यों के चुनाव परिणाम देश की राजनीति की नयी दिशा तय करेंगे। पश्चिम बंगाल में सत्ता का दुरुपयोग करने का आरोप भी उन्होंने मोदी सरकार पर लगाया। पश्चिम बंगाल में पवार ही नहीं, शिव सेना भी ममता बनर्जी और टीएमसी का समर्थन कर रहे हैं। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार के असली शिल्पकार ही पवार हैं, लिहाज़ा बहुत कम सम्भावना है कि वे शिवसेना से नाता तोड़ेंगे। एपीआई सचिन वझे और पूर्व डीजीपी परमबीर सिंह की मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अनिल देशमुख के खिलाफ लिखी चिट्ठी के मामले में भी शरद पवार सरकार के खिलाफ नहीं गये हैं। उलटे उनका बयान परमबीर सिंह के खिलाफ आया है कि क्यों उन्होंने पद से हटाये जाने के बाद ही देशमुख पर फिरौती वाले आरोप लगाये। अब यदि देशमुख का इस्ती$फा भी हो जाता है, तब भी उद्धव सरकार पर आँच शायद ही आये। शरद पवार किसी भी सूरत में सरकार गिरने नहीं देंगे। इसके आधार पर ही तीसरे मोर्चे का गठन होगा, क्योंकि सत्ता के भीतर रहते हुए ज्यादा बेहतर विकल्प होगा।

गुलाम नबी आज़ाद के नेतृत्व वाले जी-23 नेताओं की पिछले साल के आखिर में लिखी चिट्ठी 15 मई, 1999 की याद दिलाती है जब कांग्रेस कार्यसमिति के तीन मज़बूत सदस्यों शरद पवार, तारिक अनवर और पीए संगमा ने एक चिट्ठी लिखकर सोनिया गाँधी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का विरोध कर दिया था। दिलचस्प यह है कि तब गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेता सोनिया गाँधी (गाँधी परिवार) के साथ थे। तब पवार खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार होना चाहते थे। आखिर इन तीनों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कांग्रेस का और कोई बड़ा नेता उनके साथ नहीं गया इसलिए इन नेताओं ने जब एनसीपी बनायी, तो यह पवार के प्रभाव वाले राज्य महाराष्ट्र तक ही सीमित रह गयी।

अब माना जा रहा है कि जिस तरह पवार, संगमा और अनवर को विद्रोह की सज़ा मिली थी और उन्हें कांग्रेस से बाहर कर दिया गया था वैसा ही जी-23 के कुछ नेताओं के साथ हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो उसके बाद इन नेताओं की खुली गतिविधियाँ शुरू हो जाएँगी। यह माना जाता है कि जी-23 के नेता गुलाम नबी आज़ाद को अपना नेता बना चुके हैं। पवार सभी राज्यों के नेताओं को अपने साथ जोडऩा चाहते हैं, ताकि का प्रस्तावित तीसरा मोर्चा देशव्यापी स्वरूप वाला हो। निश्चित ही उनका म$कसद कांग्रेस का विकल्प देना है, ताकि भाजपा से मुकाबला किया जा सके। समस्या सि$र्फ उनकी उम्र और सेहत की है। पवार 80 साल के हो चुके हैं, भले वे राजनीति में अभी खासे सक्रिय हैं। वो तीसरा मोर्चा बनाते हैं तो इसमें निश्चित ही गुलाम नबी आजाद की भी बड़ी भूमिका होगी। लिहाज़ा राज्यों के विधान सभा चुनाव नतीजे देश की राजनीति में बहुत कुछ नयी चीज़े सामने लाएँगे। कांग्रेस असम और केरल जीत लेती है तो कांग्रेस के भीतर बागि़यों के खिलाफ माहौल बनते देर नहीं लगेगी, हालाँकि इससे कांग्रेस के भीतर की राजनीति ही प्रभावित होगी। और यदि कांग्रेस दोनों में हारी तो पवार के तीसरे मोर्चे के गठन को पंख लग जाएँगे।

उधार की फौज

देश का शायद यह पहला विधानसभा चुनाव है, जिसमें केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी किसी राज्य में अपनी विरोधी पार्टी से लडऩे के लिए उसी से तोड़कर लाये या टूटकर आये 150 (आधे से भी ज्यादा) उम्मीदवारों के साथ मैदान में उतार रही हो। बात भाजपा और पश्चिम बंगाल के चुनाव की है, जहाँ भाजपा के भीतर पार्टी की इस नीति से घमासान मच गया है। वर्षों से भाजपा के लिए काम करते रहे नेता ब$गावत पर उतर आये हैं और कई जगह भाजपा के ही लोग अपने उम्मीदवारों की लुटिया डुबोने का काम करें, तो हैरानी की बात नहीं होगी। खुले तौर पर हिन्दू कार्ड खेल रही भाजपा को आठ मुस्लिम प्रत्याशी भी मैदान में उतारने पड़े हैं; लेकिन उन्हीं सीटों पर जहाँ भाजपा की सम्भावना बेहद कमज़ोर है। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि भाजपा ने टीएमसी से आये जिन नेताओं को अपना उमीदवार बनाया है, उनमें से कई पर वह खुद भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगा चुकी है। जानकारों के मुताबिक, पार्टी की सूची ज़ाहिर करती है कि भाजपा की रणनीति बनाने वालों को पश्चिम बंगाल की राजनीति की समझ नहीं और न इसके लिए होमवर्क किया गया है। भाजपा को तब और भी ज्यादा फजि़हत झेलनी पड़ी, जब उसके घोषित दो उम्मीदवारों ने यह कहकर भाजपा के टिकट पर काशीपुर-बेलगछिया से लडऩे से साफ मना कर दिया कि उन्होंने तो भाजपा ज्वॉइन ही नहीं की और न ही उनकी ऐसा करने की कोई इच्छा है। इनमें से एक तरुण साहा हैं, जिनकी पत्नी माला साहा टीएमसी की विधायक हैं। भाजपा ने उन्हें काशीपुर-बेलगछिया से उम्मीदवार बना दिया। उत्तर कोलकाता के चौरंगी से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिवंगत सोमेन मित्रा की पत्नी शिखा मित्रा को भाजपा ने बिना उनसे पूछे उम्मीदवार बना दिया। शिखा ने भी यह कहते हुए चुनाव लडऩे से इन्कार कर दिया कि न वे भाजपा में गयी हैं, न चुनाव लडऩा चाहती हैं। पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी ने इस पर ‘तहलका’ से बातचीत में कहा कि टीएमसी के लोगों को टिकट देने से भाजपा के समर्पित नेता ख़फा हैं और वे इन उम्मीदवारों को हराने की कोशिश कर सकते हैं; ताकि उनका खुद का राजनीतिक भविष्य दाँव पर न लगे। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि घायल ममता बनर्जी व्हीलचेयर पर प्रचार कर रही हैं, जिसकी कोई काट भाजपा नहीं निकाल सकी है, ताकि उन्हें सहानुभूति के वोट मिलने से रोका जा सके।