नये अवतार में राहुल गाँधी

राहुल गाँधी की इस सक्रियता ने जहाँ विपक्षी ख़ेमे में उम्मीद पैदा की है, वहीं भाजपा में इससे शुरुआती बेचैनी है। भाजपा की हर सम्भव कोशिश रही है कि राहुल गाँधी किसी भी सूरत में विपक्ष के केंद्र में न आने पाएँ। भाजपा को पता है कि राहुल के किसी भी विपक्षी अभियान के केंद्र में आने से न सिर्फ़ मोदी के ख़िलाफ़ राहुल एक सर्वमान्य विपक्षी चेहरा बन जाएँगे, कांग्रेस और राहुल गाँधी को लेकर उसके (भाजपा के) छवि बिगाड़ो अभियान और दुष्प्रचार की भी हवा निकल जाएगी।

राहुल के नये अवतार का एजेंडा साफ़ है- ‘अगले साल उत्तर प्रदेश में और 2024 में देश भर में भाजपा को परास्त करना।’ ख़ुद को अपराजय मानने वाली भाजपा इस कल्पना भर से ही सिहर जाती है कि उसकी ताक़त को चुनौती मिल सकती है। राहुल भाजपा को इसलिए भी खटकते हैं कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा सक्रिय नेता हैं। ऐसे में राहुल विपक्ष की भी ज़रूरत हैं, यह विपक्ष के तमाम बड़े नेता समझते हैं। ऐसे में राहुल यदि सक्रिय होकर विपक्ष का मोदी, भाजपा के ख़िलाफ़ नेतृत्व करते हैं, तो जनता में ज़्यादा बेहतर संकेत जाएगा।

आम जनता में आज भी भाजपा के अलावा यदि किसी राजनीतिक दल की देश भर में पहचान है, तो वह कांग्रेस ही है। बेशक कांग्रेस पिछले दो लोकसभा चुनावों में हारी है, उसका समर्थक वर्ग देश में भाजपा से भी बड़ा है। ऐसे में यदि भाजपा को जनता से झटका मिलता है, तो कांग्रेस कोई भी बड़ा कमाल कर सकती है। भाजपा नेता यह बात समझते हैं।लिहाज़ा आनी वाले समय में राहुल के ख़िलाफ़ वे और सक्रिय होंगे। जैसे-जैसे राहुल की तरफ़ से सरकार विरोध मज़बूत होगा, वे जनता की चर्चा के केंद्र में भी आते जाएँगे। यही कारण है कि अपनी रणनीति में बदलाव लाकर अब राहुल गाँधी बहुत मज़बूती से विपक्षी दलों के बीच एकता पर ज़ोर देने लगे हैं।

हरकिशन सिंह सुरजीत की मृत्यु के बाद के इन वर्षों में सोनिया गाँधी ही विपक्ष की एकता या बैठकों की धुरी रही हैं। लेकिन अब राहुल गाँधी वह स्थान लेते दिख रहे हैं। बीच में ऐसा लगा था कि शायद शरद पवार यह जगह ले लेंगे, लेकिन उनकी आयु और सेहत शायद उन्हें बहुत सक्रिय रहने की इजाज़त नहीं देती। बीच में तो उनके राष्ट्रपति / उप राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन जुटाने की ख़बरें भी सोशल मीडिया में फैलीं। ख़ुद पवार ने हालाँकि ऐसी किसी कोशिश से इन्कार किया। ऐसे में राहुल का विपक्षी एकता का केंद्र बनना बहुत हैरानी पैदा नहीं करता।

कांग्रेस के भीतर भी राहुल गाँधी अपनी माँ सोनिया गाँधी की छाया से बाहर निकल चुके हैं; भले पार्टी के फ़ैसलों पर अध्यक्ष के नाते अन्तिम मुहर वही लगाती हैं। हाल के महीनों में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति राहुल गाँधी की पसन्द से ही हुई है। पार्टी के राज्य नेताओं में भी अब ख़ुद को राहुल गाँधी के नज़दीक दिखाने का चलन बढ़ा है, जो ज़ाहिर करता है कि ये आम कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता अब राहुल को ही नेता के रूप में देखने लगे हैं। हाल में राहुल के नाश्ते में शामिल एक विपक्षी नेता ने ‘तहलका’ बातचीत में राहुल के प्रति अपने अनुभव को लेकर कहा- ‘वह ज़ोर देकर यह कहते हैं कि आरएसएस (और भाजपा) के ख़िलाफ़ साथ काम करने की सख़्त ज़रूरत है। वह यह भी कहते हैं कि ऐसा किया जा सकता है। राहुल दूसरे नेताओं से उनके विचार जानने को उत्सुक रहते हैं। उनका व्यवहार दूसरे नेताओं के प्रति बहुत सम्मान भरा होता है और वह आकर्षित करते हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि यदि राहुल पूरी गम्भीरता से मैदान में जुट जाएँ, तो वह भाजपा के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बनने की क्षमता रखते हैं।’

विपक्षी नेताओं के मुताबिक, यह राहुल गाँधी ही थे, जिन्होंने पेगासस जैसे गम्भीर मामले पर विपक्ष को एकजुट किया। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े के संसद कक्ष में हुई बैठक की पूरी ज़िम्मेदारी राहुल गाँधी ने ही सँभाली थी। बाद में पत्रकार वार्ता (प्रेस कॉन्फ्रेंस) में भी मुख्य तौर पर राहुल गाँधी के सम्बोधन के बावजूद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि दूसरे नेता भी वहाँ बोलें, ताकि विपक्ष का वृहद् प्रतिनिधित्व उजागर हो। संसद के भीतर भी राहुल गाँधी अन्य दलों के नेताओं से सम्पर्क बढ़ाने की कोशिश करने लगे हैं। पेगासस मुद्दे पर उन्होंने (राहुल) अन्य दलों के नेताओं से सदन के भीतर भी जिस तरह चर्चा की वह एक बदले हुए राहुल गाँधी के दर्शन करवाता है। एक सांसद ने कहा- ‘राहुल गाँधी ने संसद सत्र के दौरान साइकिल यात्रा का प्रस्ताव ही नहीं दिया, बल्कि उसका नेतृत्व भी किया। यह पहले नहीं दिखता था। राहुल में यह बदलाव स्वागत योग्य है।’

राहुल के सामने चुनौती संसद के बाहर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की रहेगी। कुछ मुद्दों पर संसद भीतर सहमति बनाना ज़रूर सफल रहा है। एक वृहद् लक्ष्य के लिए सभी दलों को एक छतरी के नीचे लाने में अभी समय लगेगा। इसमें दो-राय नहीं कि राहुल ने एक बेहतर शुरुआत की है। आने वाले समय में उनकी कोशिश विपक्ष के ख़ेमे को और विस्तार देने की रहेगी। साथ ही अपने नेतृत्व को विपक्ष के बीच और मज़बूत करने के कोशिश भी राहुल को करनी होगी। यह थोपा नहीं जा सकता, बल्कि भरोसे और कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में जीत दिलवाकर ही हो सकता है। लिहाज़ा राहुल के लिए यह बहुत ज़रूरी रहेगा कि विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस को जितवाकर चुनावी रूप से सफल नेता की अपनी छवि भी मज़बूत करें। आख़िर विपक्ष राहुल को एक करिश्माई नेता होने के नाते ही तो उन्हें अपना नेता मानने की हिम्मत दिखाएगा।

 

ममता की तैयारी

राहुल की ही तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी ख़ुद को राष्ट्रीय भूमिका के लिए तैयार करती दिख रही हैं। लिहाज़ा यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में ख़ुद ममता का राष्ट्रीय भूमिका को लेकर क्या रूख़ रहता है? लेकिन अगस्त के दूसरे हफ़्ते ममता बनर्जी को टीएमसी के संसदीय दल का नेता चुन लिया जाना बहुत दिलचस्प फ़ैसला कहा जाएगा। राजनीति के लिहाज़ से यह एक बड़ा, हैरान करने वाला और अहम फ़ैसला है। क्योंकि ममता न लोकसभा की सदस्य हैं। न लोकसभा या राज्यसभा की ही सदस्य हैं। क्या माना जाए कि आने वाले समय में वह राज्यसभा या लोकसभा में आ सकती हैं? ममता बनर्जी की अपने इस चयन पर टिप्पणी भी बहुत दिलचप्स थी। उन्होंने कहा- ‘क्योंकि वो मुझसे प्यार करते हैं।’ बनर्जी ने भविष्य में केंद्रीय स्तर पर राजनीति करने को लेकर कहा- ‘मैं कोई राजनीतिक ज्योतिषी नहीं हूँ। ये सब कुछ सिचुएशन (परिस्थिति), सिस्टम (तंत्र) और स्ट्रक्चर (संरचना) पर निर्भर करता है।’

ज़ाहिर है आगामी पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष स्थिति को देखकर नेतृत्व को लेकर किसी एक बिन्दु पर फोकस करेगा और नेतृत्व के निर्णय पर पहुँचने का प्रयास करेगा।

विपक्ष की बैठक

राहुल गाँधी जब जम्मू-कश्मीर के दौरे पर थे, उसी शाम कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल विपक्षी पार्टी के नेताओं के साथ अपने घर पर रात्रि भोज (डिनर) का आयोजन कर रहे थे। इस रात्रि भोजन में 15 पार्टियों के क़रीब 45 नेता और सांसद शामिल हुए; जिसमें लम्बे समय तक जेल में रहने वाले लालू यादव, शरद पवार, अखिलेश यादव, डेरेक ओब्रायन, सीताराम येचुरी और संजय राउत जैसे नेता शामिल थे। इसके अलावा बीजेडी के पिनाकी मिश्रा, अकाली दल के नरेश गुजराल और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, सपा से राम गोपाल यादव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला, बीजू जनता दल के नेता अमर पटनायक, द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) के तिरुचि शिवा और टी.के. एलनगोवन, रालोद (राष्ट्रीय लोक दल) के जयंत चौधरी और टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति)के नेता भी शामिल हुए। वहीं कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद, पी. चिदंबरम, भूपिंदर सिंह हुड्डा, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, पृथ्वीराज चव्हाण, मनीष तिवारी और शशि थरूर शामिल थे। विदित हो कि राहुल गाँधी के नाश्ते पर आम आदमी पार्टी न्यौता पाकर भी नहीं गयी थी। सिब्बल की इस रात्रि भोज बैठक में आगामी 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2024 के आम चुनाव में विपक्षी एकता मज़बूत करने की बात हुई। भाजपा को निशाने पर रखा गया।