नमक में कुछ काला है !

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निविदा की तीसरी बड़ी शर्त है कि नमक आपूर्ति का ठेका उसी कंपनी को मिल सकता है जिसका आईएसआई चिह्न वाले आयोडीनयुक्त नमक का सालाना टर्नओवर कम से कम 20 करोड़ रुपये है. नमक कारोबार से जुड़े गुजरात के कई व्यापारियों का कहना है कि निगम की यह शर्त व्यावहारिक नहीं है. नमक कारोबार करने वाली एक कंपनी कच्छ ब्राइन (अहमदाबाद) के मुख्य प्रबंधक राजीव गुप्ता के मुताबिक, ‘सरकार के पास इस बात की जांच का कोई तरीका या व्यवस्था नहीं है कि किसी कंपनी ने यदि 20 करोड़ रुपये का नमक बेचा है तो पूरे का पूरा नमक आईएसआई चिह्न वाला आयोडीनयुक्त नमक ही होगा.’ गुप्ता का आरोप है कि निगम ने सारा खेल इस ढंग से खेला है कि बीते सालों की तरह इस साल भी चुनी हुई दो-तीन कंपनियों को क्वालीफाई करवाकर उनमें से किसी एक को नमक आपूर्ति का ठेका दिया जा सके.

गुजरात के नमक कारोबारी बताते हैं कि हिमाचल या आंध्र प्रदेश जैसे दूसरे राज्यों की नमक खरीद निविदाओं में ऐसी शर्तें नहीं हैं. इसके चलते कहीं ज्यादा संख्या में कंपनियां वहां निविदा भर पाती हैं. जाहिर है जब मध्य प्रदेश में गिनी-चुनी कंपनियां ही स्पर्धा में रहेंगी तो सरकार को नमक के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे और इस बात की संभावना भी ज्यादा होगी कि अधिकारी कंपनियों से सांठ-गांठ करके आसानी से हेराफेरी कर पाएं.
नमक आपूर्ति के टेंडर को लेकर नमक कंपनियों ने मप्र सरकार को अब अदालत में घसीटा है. बीती 5 मई को कच्छ ब्राइन सहित कई कंपनियों ने निगम की शर्तों के खिलाफ जबलपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की. और इसके एक दिन बाद यानी 7 मई को कोर्ट ने स्थगत आदेश देते हुए निगम के नमक आपूर्ति के वर्क ऑर्डर (कार्य आदेश) पर रोक लगा दी है.

दूसरी तरफ मप्र नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर (चूंकि मामला न्यायालय में है) बात करते हुए कहते हैं, ‘निगम तो बीते कई सालों से महंगी कीमत पर नमक खरीदता रहा है लेकिन किसी कंपनी ने पहले आपत्ति नहीं की. इस साल पहले के मुकाबले तीन गुना अधिक नमक खरीदा जाना है इस वजह से हर कंपनी आपूर्ति का ठेका लेना चाहती है.’

इस चुनावी साल में राज्य की शिवराज सरकार ने लाखों गरीब परिवारों को एक रुपये में एक किलो नमक देने का वादा किया है. सरकारी अनुमान के मुताबिक सरकार इसके लिए तकरीबन 65 करोड़ रुपये खर्च करेगी. लिहाजा गुजरात की कई नमक कंपनियों के बीच प्रदेश में नमक आपूर्ति का ठेका लेने की होड़ लग गई है. और इसी के चलते निगम की कई अनियमितताएं भी अब बाहर आ रही हैं. वहीं सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा के पूर्व विधायक और निगम के चेयरमैन रमेश शर्मा को अंधेरे में रखा गया है. तहलका से बातचीत में शर्मा कहते हैं, ‘मुझसे न तो टेंडर की स्वीकृति ली गई है और न ही किसी अधिकारी ने मुझे कुछ बताया है.’

गेहूं, बारदाने जैसी चीजों की खरीद से जुड़े घोटाले नए नहीं हैं. मगर नमक जैसी सस्ती चीज की खरीद में हेराफेरी का यह मामला दुर्लभ हो सकता है. कहानी सीधी है कि महंगाई के इस जमाने में भले ही गरीब लोग नमक-रोटी खाने के लिए तरस रहे हैं लेकिन नौकरशाही उनके लिए आए नमक के पैसे पर भी गिद्ध झपट्टा मारने से नहीं चूक रही.

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