नतीजों के संकेत

यह ''विनम्र'' लेकिन ''आक्रमक'' राहुल की जीत है

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हिन्दुतवा की भाजपा-मोदी-शाह की ही मजबूत पिच पर खड़े होकर राहुल गांधी ने जिस तरह उन्हें ही चुनौती देने का रिस्क लिया और अब ”हिंदी-हिन्दू हार्टलैंड” में उसी के तीर से भाजपा को ढेर कर दिया, वह देश की राजनीति में विलक्षण प्रयोग है। राहुल इस प्रयोग में विजयी होकर उभरे हैं। दूसरे, राहुल ने  अपने रूप में ”विनम्र राजनीति” का जो चेहरा सामने लाया, वह देश की जनता  को ”और” नेताओं के मुकाबले बेहतर लगा है। यह राहुल की दूसरी बड़ी जीत है। उनकी तीसरी लेकिन शायद सबसे अहम् जीत है, खुद को २०१९ के लोक सभा चुनाव में ”ब्रांड मोदी” के सामने बड़ी ताकत के साथ खड़ा हो सकने वाला नेता बना देना। तय मानिये भाजपा अब २०१९ के लोक सभा चुनाव के सन्दर्भ में ”मोदी बनाम राहुल” कहने से हिचकेगी।
पिछले छह महीनों में परिपक्वता पाने और अब तीन ऐसे चुनावों, जहाँ कांग्रेस ज़मीनी संगठन के तौर पर भाजपा के मुकाबले कमजोर थी, में पार्टी को जीत की दहलीज तक ले जाकर राहुल ने देश की राजनीति का ”नैरेटिव” अचानक बदल दिया है। छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनाव में  राहुल ने ब्रांड मोदी का हर चुनाव जिता सकने वाला ”भ्रम” तोड़ दिया। यह भाजपा के काडर का ”दिल तोड़ देने वाली” चुनावी घटना है।
शायद अब भाजपा के नेता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ”पप्पू” कहने से बचें। पीएम मोदी भी शायद राहुल को ”नामदार” जैसे हलके सम्बोधन से बचें। यह भी शायद हो कि भाजपा के संविद पात्रा जैसे बड़बोले प्रवक्ता राहुल के हिन्दू होने को लेकर ”जनेऊधारी” जैसे सम्बोधनों से बचें। उनके राहुल के प्रति इन हलके विशेषणों ने जनता को नाराज किया है।
तीन बड़े और हिन्दु बहुलता वाली छवि के राज्यों में कांग्रेस को जीत जाने वाली पार्टी बना कर राहुल ने भाजपा को उस समय धवस्त किया है जब  तमाम हिंदूवादी संगठन विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान आयोध्या में राम मंदिर के नाम पर ”हिन्दू उभार” की पूरी कोशिश में थे।
इन नतीजों और राहुल ने भाजपा को उसकी ”हिन्दू पिच” पर ही ललकार कर क्या भाजपा से उसका २०१९ के लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व का सबसे मारक हथियार छीन लिया है? वह भी मुसलमानों को बिना नाराज किये? तीन सूबों में कांग्रेस को मिले मतों को देखकर तो ऐसा ही लगता है !
राहुल चुनाव प्रचार में १० मंदिरों में गए जिनके आसपास की ६८ सीटों में से कांग्रेस ४४ पर जीती। और भाजपा अध्यक्ष ५६ सीटों में से पार्टी को २४ में ही जिता पाए। तो क्या राहुल जनता में एक हिन्दू नेता के रूप में शाह-भाजपा-मोदी से ज्यादा स्वीकार्यता वाले नेता हो गए हैं ? नतीजे तो यही इशारा करते हैं !
चुनाव प्रचार को पार्टी की जीत में तब्दील कर देने की क्षमता के मामले में भी राहुल मोदी पर बहुत भारी पड़े हैं। राजस्थान में मोदी के कमजोर २३ फ़ीसदी के मुकाबले राहुल का प्रतिशत ५३ रहा, मध्य प्रदेश में मोदी के ४९ प्रतिशत के मुकाबले राहुल का प्रतिशत ६१ जबकि छत्तीसगढ़ में मोदी के कमजोर १६ प्रतिशत के मुकाबले राहुल का प्रतिशत ६९ रहा है।
अभी तक यह आम धारणा पिछले साढ़े चार साल में रही है कि पीएम मोदी महिलाओं में एक राजनेता के तौर पर किसी भी भारतीय राजनेता के मुकाबले बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं। लेकिन इन चुनाव नतीजों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। जिन इलाकों में महिला मतदाताओं का वोट प्रतिशत ज्यादा रहा, वहां मोदी की भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो गया।
भाजपा का ”कांग्रेस मुक्त भारत” का अहंकार भरा नारा भी इन चुनाव नतीजों से ध्वस्त हो गया है। पीएम मोदी का पिछले ७० साल के नाम पर कांग्रेस के नेताओं जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को कोसना भी जनता को रास नहीं आया।
मोदी ने जिस तरह राहुल का अपने भाषणों में हलके अंदाज में उपहास उड़ाया, सम्भवता उसे लोगों ने नकारात्मक रूप से लिया। उन्हें लगा इतने बड़े देश के प्रधानमंत्री को ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ”कांग्रेस की विधवा” वाला मोदी का विशेषण भी देश में खराब नजर से देखा गया।
दिल्ली में  भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इस संवाददाता से कहा कि राहुल का इतना प्रचार खुद उनकी अपनी जनसभाओं से नहीं हुआ जितना मोदी साहब ने अपनी सभाओं में कर दिया। उन्होंने कहा – ”कई बार तो मोदी साहब १०-१० मिनट तक राहुल और गांधी परिवार ही बोले जिसकी कोइ ज़रुरत नहीं थी। इससे राहुल के प्रति लोगों में सहानुभूति बनी।”
हालांकि राहुल के ब्रांड मोदी के सामने खड़ा हो सकने वाला नेता बनने की एक और बड़ी बजह भी है। उन्हें ऐसा नेता बनने में कुछ महीने लगे। खासकर पिछले सात-आठ महीने में राहुल ने जिस तरह पीएम मोदी को टारगेट किया उसने उन्हें एक आक्रमक नेता की छवि दी। राहुल ने सम्भवता पीएम मोदी के खिलाफ लगभग इकलौते मैदान में डटकर निशाना साधा। ऐसे समय में जबकि देश में मीडिया से लेकर बड़े नेता तक (पक्ष/विपक्ष दोनों) मोदी पर टिप्पणी करने में खौफ जैसा महसूस करते हैं, राहुल की मोदी के खिलाफ यह आक्रमता देश में उन लोगों को रास आई है जो मोदी को विभिन्न कारणों से पसंद नहीं करते और इनमें बड़ी संख्या में युवा भी हैं।
राहुल ने ”चौकीदार चोर है” जैसा मुहावरा राफेल मुद्दे को लेकर गढ़ा। विचलित  और बैचेन भाजपा ने इसे लेकर राहुल पर लाख तंज कसे और कहा कि मोदी को ऐसा विशेषण देकर वे ”चाँद पर थूकने जैसा” काम कर रहे हैं। लेकिन राहुल नहीं डिगे और मोदी पर उनका हमला पूरी आक्रमता से जारी रहा।
उन्होंने अपने प्रिय मुद्दों – किसान, युवा, रोजगार, महिला – के साथ-साथ  सीधे पीएम मोदी को निशाने पर लेकर धीरे-धीरे देश की राजनीति में यह नैरेटिव स्थापित कर दिया कि वे मोदी से सीधे मुकाबले के लिए तैयार हैं। आज तीन राज्यों के चुनाव नतीजों में ब्रांड मोदी को डिफीट देकर राहुल ने विपक्ष का नेता होने की अपनी ज़मीन और मजबूत कर ली है।
पीएम मोदी ने पिछले साढ़े चार साल के अपने शासनकाल और इस बार के   चुनाव प्रचार में पिछले ७० साल के कांग्रेस राज के दौरान ”देश में कुछ भी विकास न होने” का बार-बार जिक्र किया है। लेकिन मंगलवार को चुनाव नतीजों में भाजपा की हार हो जाने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने भाजपा के आउटगोइंग मुख्यमंत्रियों के उनके प्रदेशों में किये योगदान की बात कहकर एक विनम्र नेता की छवि बना ली।
इस चुनाव में भाजपा की हार ने मोदी-शाह के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ”ग्राफ” भी ज़मीन पर ला पटका है। पूरे प्रचार में उन्होंने खुले रूप से हिंदुत्व का कार्ड खेला। नतीजे बताते हैं कि भाजपा को इसका फायदा नहीं नुक्सान हुआ।
इस तरह तीन राज्यों (वैसे पांच) के चुनावों ने भाजपा से सिर्फ सत्ता ही नहीं छीनी है, २०१९ के लोकसभा चुनाव के उसके बड़े मुद्दे भी छीन लिए हैं। उसके तीन बड़े स्टार प्रचारकों (मोदी-योगी-शाह) का ”चुनाव जिता सकने वाले नेता” का भ्रम भी तोड़ दिया है।
इन तीन राज्यों में जीतकर राहुल गांधी की चुनौती ख़त्म नहीं, शुरू हुई है। तीन राज्यों में जीत भले राहुल को उनके कांग्रेस अध्यक्ष होने के एक साल पूरा होने पर बड़ा तोहफा है, उनकी पार्टी दो बड़े राज्यों राजस्थान और मध्य प्रदेश में बहुत कम अंतर से ही सरकार बनाने की स्थिति में पहुँची है। देश भर में कांग्रेस का संगठन  लचर है भले उसे पिछले (२०१४) के लोक सभा चुनाव में भाजपा को मिले करीब १७ करोड़ वोटों के मुकाबले करीब १० करोड़ वोट मिले थे। राहुल कितनी कूबत के नेता हैं, यह अब साबित होना है।
उन्हें चाटुकारों से बचना होगा। मोदी की तरह की ”केंद्रीकृत राजनीति” से राहुल को बचना होगा। जितनी ताकत वे क्षेत्रीय क्षत्रपों को देंगे, कांग्रेस उतनी ही मजबूत होगी। युवा आगे लाएंगे तो खुद मजबूत होंगे। राहुल ने जनता से प्रस्ताव आमंत्रित करके चुनाव घोषणा पत्र बनाकर नई और अच्छी परंपरा शुरू की है। कार्यकर्ताओं को उनका महत्व देना भी उस कांग्रेस के लिए अच्छी शुरुआत है, जो हाल के दशकों में ”आलाकमान” के एक केंद्रीकृत खोल तक सीमित होकर रही है।
विधानसभा चुनाव में अलग लड़ने वाले बसपा जैसे अहम् दल भले इन नतीजों के बाद कांग्रेस के पाले में दिखे हैं, राहुल को २०१९ के चुनाव से पहले एक मजबूत गठबंधन बनाने के लिए बहुत पसीना बहाना होगा। सूत्रों के मुताबिक राहुल कुछ राज्यों में प्रभावशाली नेताओं को कमान दे सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस में राहुल समर्थक एक मजबूत धड़ा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अपने बूते चुनाव में उतरने पर जोर दे रहा है। कुछ कांग्रेस हलकों में उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान लोकसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा को देने की भी चर्चा है। वैसे चर्चा यह भी है कि भाजपा के भीतर लोकसभा चुनाव कुछ जल्दी करवाने की बात जोर पकड़ रही है।