धान से धनवान

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इस जीत की कहानी इतनी आसान नहीं रही. लगभग एक दशक तक केंद्र सरकार की ओर से ठंडी प्रतिक्रिया पाने के बाद आखिर 30 अगस्त, 2011 को राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर एक बार फिर नए सिरे से पहल की. एपीडा के खिलाफ राज्य सरकार के कृषि विभाग सहित कई बासमती कृषि समितियों, बासमती चावल प्रसंस्करण इकाइयों और बासमती निर्यात संघों ने जीआईआर का दरवाजा खटखटाया. उनका तर्क था कि राज्य के 50 में से 14 जिलों में बासमती धान की कई किस्में उगाई जाती हैं. राज्य में सालाना आठ लाख मैट्रिक टन से भी ज्यादा बासमती पैदा होता है. बताया गया कि बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य के बीज एवं कृषि विकास कॉरपोरेशन द्वारा 1990 से बासमती धान की उन्नत किस्मों का वितरण किया जा रहा है. मध्य प्रदेश के चावल की देश और दुनिया के कई हिस्सों में मांग बढ़ रही है. प्रदेश की करीब 80 हजार क्विंटल बासमती चावल पंजाब, हरियाणा और दिल्ली की कंपनियों द्वारा खरीद बताती है कि यह देश का कितना बड़ा धान उत्पादक क्षेत्र है. इसी कड़ी में बीते साल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की वह पहल भी अहम साबित हुई जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करके बताया था कि पिछली एक सदी से प्रदेश बासमती धान उत्पादक राज्य है, फिर भी उसे बासमती धान के भौगोलिक क्षेत्र में शामिल न करने से किसानों का हक मारा जा रहा है. इस प्रकरण के प्रभारी अधिकारी और राज्य कृषि संचनालय के अपर संचालक संजय तिवारी बताते हैं, ‘राज्य ने एपीडा के निर्णय के विरोध में कुल 22 साक्ष्य रखे. प्रदेश के 1908 और 1931 के जिला गजेटियर पेश किए गए. इनमें बताया गया कि चंबल, बेतवा और नर्मदा किनारे के गांवों में 100 साल पहले से बासमती धान उगाया जा रहा है.’ तिवारी आगे कहते हैं, ‘यह प्रमाणित करने के लिए कि बासमती धान की खेती के मामले में प्रदेश की जलवायु बिल्कुल अनुकूल है, वर्षा के अधिकृत आंकड़े और बीजों की डीएनए रिपोर्ट दी गई.’

उधर, राज्य सरकार ने धान की कई प्रजातियों के अधिक उत्पादन के लिए तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में विशेष कार्यक्रम चलाया है. ऐसे कार्यक्रमों की वजह से प्रदेश में खेतीबाड़ी की तस्वीर बदल रही है. नतीजा यह कि यहां धान सहित सभी फसलों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. 2002-03 में फसलों का कुल उत्पादन 142.45 लाख मीट्रिक टन था जो 2011-12 में बढ़कर 301.74 लाख मीट्रिक टन हो गया. राज्य कृषि विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजौरा कहते हैं, ‘राज्य की आबादी का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा खेती से जुड़ा है. इसलिए यदि बासमती धान जैसी फसलों के क्षेत्र में तरक्की हुई तो न केवल बड़ी आबादी की जीवनशैली में सुधार होगा बल्कि कृषि पर निर्भर दूसरे क्षेत्रों की तरक्की से प्रदेश का अर्थतंत्र बदलेगा.’

लेकिन कृषि क्षेत्र में हासिल उपलब्ध्यिों का ताज अकेले कृषि विभाग के सिर पर नहीं रखा जा सकता. दरअसल कृषि विभाग से जुड़े अन्य विभागों के बीच बेहतर तालमेल के लिए पिछले साल प्रदेश में कृषि कैबिनेट का गठन किया गया था. इसके बाद ही कृषि विभाग का उद्यानिकी, खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, ऊर्जा, सिंचाई और सहकारिता विभागों से बेहतर तालमेल हो पाया है. विशेषज्ञों का मानना है कि 60 के दशक में चली हरित क्रांति में अगर मध्य प्रदेश पिछड़ गया था तो उसका लाभ उसे अब मिलेगा. वजह यह है कि तब पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में सिंचाई के साधन, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से वहां मिट्टी और बीज दोनों की गुणवत्ता गिरी है. करीब चार लाख हेक्टेयर में जैविक खेती होने से मध्य प्रदेश की एक खास पहचान बन रही है. अब जबकि दुनिया भर में बासमती चावल की मांग बढ़ रही है तो ऐसे में रासायनिक दुष्प्रभावों से मुक्त राज्य का बासमती चावल सोने पर सुहागे जैसा होगा.

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