धर्म नहीं है खेल!

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एक उदाहरण सचिन तेंदुलकर का भी है. वे कभी देश की तरफ से 20-20 के वर्ल्ड कप तक के लिए नहीं खेले, पिछले कुछ सालों से वनडे मैच भी गिने-चुने ही खेल रहे थे और छह महीने हुए उससे भी संन्यास ले चुके हैं मगर आईपीएल में लगातार डेढ़ महीने तक खेलने के लिए जहां तक संभव हो वे तैयार दिखते रहे. राष्ट्रवाद की चमक फीकी पड़ने के बाद कुछ दूसरे पूर्वाग्रह सर उठाने लगे. दूसरे आईपीएल में कोलकाता की टीम के भीतर नस्लवाद से जुड़े आरोप लगे. तीसरे आईपीएल में पाकिस्तान के खिलाड़ियों को अपमानित होना पड़ा. धीरे-धीरे घरेलू टीमों को मिलने वाले फायदों का सवाल भी खड़ा हो गया और एक दौर में इस पर भी विचार हुआ कि मैच तटस्थ जगहों पर कराए जाएं.

लेकिन अंतत: सारा कुछ इस बात से तय होता रहा कि किस फैसले से कितना पैसा आना है. जब पैसा इतना अहम हो जाए तो खेल पीछे छूट जाता है या उसके भीतर और भी खेल चलने लगते हैं. ऐसा नहीं कि इस तरह के खेलों की भनक लोगों को बाहर नहीं थी. उल्टे, बिल्कुल पहले ही आईपीएल से टीमों का और उनके मुनाफ़े का सवाल खड़ा हो गया था और यह इल्ज़ाम लगने लगा था कि आईपीएल के कामकाज में बहुत कुछ ऐसा है जो पारदर्शी नहीं है. दूसरा आईपीएल देश से बाहर हुआ और इस पर फेमा के उल्लंघन और मनी लान्डरिंग के गंभीर आरोप लगे. यह साफ नज़र आता रहा कि आईपीएल पूंजी, ग्लैमर और सत्ता के गठजोड़ से तैयार हो रहा एक ऐसा आयोजन है जो कानूनों की ज्यादा परवाह नहीं करता. इस आयोजन में और इससे जुड़ी टीमों में किस-किस का पैसा किन-किन जरियों से लगा है, इसको लेकर कयास चलते रहते हैं. एक दौर में आयकर महकमे के सूत्र कहा करते थे कि तीन टीमों में आईपीएल के कमिश्नर रहे ललित मोदी का पैसा लगा है. 2010 में जब आईपीएल की दो नई टीमें तैयार हो रही थीं, तभी कोच्चि की टीम की नीलामी को लेकर ललित मोदी के एक ट्वीट से पैदा हुए बवंडर ने उन दिनों विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर को इस्तीफा देने पर मजबूर किया. इसकी क़ीमत ललित मोदी को भी चुकानी पड़ी- अचानक उनकी कारस्तानियां खुलने लगीं और उन पर तरह-तरह के इल्ज़ाम लगे. आखिरकार उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा.

जहां तक सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग का सवाल है, पहले ही आईपीएल से इस तरह के झूठे-सच्चे आरोप चलने लगे थे. ललित मोदी ने ही एक ट्वीट करके न्यूजीलैंड के खिलाड़ी क्रिस केंस पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगाया था. केंस ने इसके ख़िलाफ़ अदालत की शरण ली और फ़ैसला मोदी के ख़िलाफ़ आया. दूसरे और खिलाड़ियों पर भी आईपीएल के मैचों में फिक्सिग के आरोप लगे, वे आईपीएल से निलंबित हुए. यहां तक कि कुछ अंपायरों पर भी इस तरह की उंगलियां उठती रहीं.

दरअसल यह साफ़ दिखता है कि आईपीएल भारतीय खेल और मनोरंजन की दुनिया में जिस तरह की संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है, सट्टेबाज़ी या फिक्सिंग उसकी सहज परिणतियां हैं. यह अलग बात है कि यह अदालत में साबित हो पाएगा या नहीं. लेकिन सवाल अदालत का नहीं, उस जनता की अदालत का है जो क्रिकेट को अपना धर्म और क्रिकेटरों को अपना ख़ुदा मानती है. बेशक, धर्म भी हमारे यहां धंधे में बदल चुका है और देवताओं के नाम पर बड़े-बड़े फ़र्जी कारोबार होते हैं, लेकिन क्या क्रिकेट के भक्त क्रिकेट के नाम पर ख़ुद को छला जाना इतनी आसानी से गवारा कर लेंगे?

कल्पना या कामना की जा सकती है कि शायद ऐसा न हो. स्पॉट फिक्सिंग के इस आरोप के बाद शायद लोगों को आईपीएल का गोरखधंधा ज़्यादा समझ में आए. हालांकि अभी तो ऐसा नहीं लगता. स्पॉट फिक्सिंग के आरोपों के बावजूद कोलकाता में मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच खेले गए फाइनल के सारे टिकट बिक गए और स्टेडियम खचाखच भरा नज़र आया. इससे हम क्या नतीजा निकालें? क्या क्रिकेट नाम का धर्म अब वह अफीम हो चुका है जिसे चाटकर बेसुध लोग बाकी सब भूल मैच देखते रहते हैं? क्या जैसे नशे की लत बची रहती है, वैसे ही यह आईपीएल बचा रहेगा?

इन सवालों के जवाब खोजते हुए एक नई तरह की दुविधा से हमारा सामना होता है. अचानक हम पाते हैं कि लोग क्रिकेट को खेल की तरह नहीं, तमाशे की तरह देख रहे हैं, किसी सर्कस की तरह देख रहे हैं. उन्हें जैसे बस कुछ ओवरों की सनसनी से मतलब है, रोमांच के झाग से मतलब है, आइटम गर्ल्स की तरह आने-जाने वाली चीयरलीडर्स से मतलब है, क्रिकेट के खेल से नहीं, उसकी शास्त्रीयता से नहीं, उसकी नैतिकता से नहीं. हालांकि पूंजीवाद का एक पहलू यह भी है कि चूंकि यहां पैसा इकलौता तर्क हुआ करता है. इसलिए यहां जिस चीज से नुकसान हो सकता है वह नाजायज़ होती है. बाज़ार को मालूम है कि आईपीएल के नाम पर जो कीचड़ उछली है, वह आईपीएल की साख और खुद उसके लिए नुकसानदेह है. इसलिए वह कुछ ऐसा करने की कोशिश जरूर करेगा जिससे कि उसके हितों को नुकसान नहीं पहुंचे.

खैर आईपीएल का जो भी हो, इससे क्रिकेट का और वास्तविक क्रिकेट प्रेमियों का नुकसान होगा. उन खिलाड़ियों का भी, जो फिलहाल बड़े नायकों की तरह दिखाई पड़ रहे है. सच तो यह है कि अभी ही उनके नायकत्व में काफी दरार आ गई है. आइकॉन खिलाड़ियों की ऐसी-तैसी हो चुकी है. करीब दो साल पहले नीलामी के दौरान मोहम्मद कैफ़ को लेकर ठहाकों के बीच जिस तरह 10,000 की बोली बढ़ाई जा रही थी, उससे पता चल रहा था कि मालिकान अब खिलाड़ियों को अपना जरख़रीद गुलाम समझने लगे हैं. अगर लोगों के दिमाग में एक बार बैठ गया कि ये गेंद और बल्ले की कविता लिखने वाले, क्रिकेट का जादू रचने वाले देवता नहीं, महज पैसे के पीछे भागने वाले खिलाड़ी हैं तो शायद क्रिकेट का वह मिथ टूट जाएगा जो इसे जुनून और धर्म में बदलता है. भारतीय जनता अपने देवताओं से एक तरह के शील, एक तरह की संपूर्णता की अपेक्षा करती है, वह खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करती, यह बात याद रखनी होगी.


क्या करेगा कानून ?
आईपीएल का फाइनल खेले जाने से पहले एन श्रीनिवासन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो-टूक कह दिया कि उनके इस्तीफे का सवाल ही पैदा नहीं होता. सूत्रों के मुताबिक उन्हें नहीं लगता कि उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन के ख़िलाफ़ मामला अदालत में टिकेगा. यही नहीं, फ्रेंचाइज़ी सीएसके पर भी आईपीएल का कोई क़ायदा तोड़ने का आरोप साबित करना आसान नहीं होगा. उधर दिल्ली में श्रीसंत ने जेल से ही प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि उन्हें अपने बेगुनाह छूट आने का पूरा भरोसा है. उनके वकील ने याद दिलाया कि पुलिस के पास न तो श्रीसंत की आवाज़ का कोई टेप है, न ही श्रीसंत और सटोरियों के बीच सांठगांठ के सबूत और न ही पैसे के लेन-देन  का कोई दस्तावेज़ जिससे वह मामला अदालत में साबित कर सके. इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ आया है. वह खिलाड़ियों और सटोरियों की पूछताछ से ही सामने आया है. यह पूछताछ अदालत में सबूत की तरह नहीं टिकेगी. साथ ही फोन के ब्योरे भी सबूत के तौर पर पर्याप्त नहीं हैं.

कानून के जानकार बताते हैं कि सट्टेबाज़ी या स्पॉट फिक्सिंग को लेकर भारत में कोई विशेष कानून भी नहीं है जो इन खिलाडि़यों पर लगाया जाए. ऐसे में धारा 420 या 409 के सहारे पुलिस कहां तक जा पाएगी, कहना मुश्किल है. इन धाराओं की परिभाषाएं सीमित हैं और उनमें स्पॉट फिक्सिंग जैसे अपराध को साबित करना बहुत ही मुश्किल है. यहां याद किया जा सकता है कि करीब 13 साल पहले मैच फिक्सिंग की जो बड़ी कालिख भारतीय क्रिकेट पर लगी थी, उसका अब तक कानूनी निपटारा नहीं हुआ है.

उस मामले में अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर जैसे बड़े खिलाड़ी घिरे थे, हैंसी क्रोनिए जैसे कप्तान ने माना था कि वे फिक्सिंग में शामिल रहे. इन लोगों के ख़िलाफ़ क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने कार्रवाई की, लेकिन जिस दिल्ली पुलिस ने यह मामला उजागर किया था, वह इस मामले में अब तक चार्जशीट तक पेश नहीं कर पाई. अब सरकार बता रही है कि स्पॉट फिक्सिंग के ख़िलाफ ब्रिटेन के बेटिंग लॉ या न्यूजीलैंड के ऐसे ही मिलते-जुलते कानून की तर्ज पर यहां भी कानून बनाया जाएगा. लेकिन जब तक वह बनेगा, क्या इन खिलाडियों और सट्टेबाज़ों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हो पाएगी?

सट्टे का सवाल
इस पूरे मामले में सट्टेबाज़ी और मैच फिक्सिंग को जैसे बिल्कुल एक कर दिया गया है, जबकि दोनों दो अलग-अलग चीज़ें हैं. कई लोग मानते हैं कि सट्टेबाज़ी को भारत में जायज बना देना चाहिए. इस पक्ष में सबसे अहम दलील यह दी जाती है कि इससे कम से कम सट्टेबाज़ी पर नज़र रखी जा सकेगी. फिलहाल सट्टे का सारा खेल काले पैसे का खेल है जो परदे के पीछे छिप कर चलाया जाता है. इस वजह से इसमें अंडरवर्ल्ड की भूमिका बहुत बड़ी है. चूंकि ऐसे कुछ गिने-चुने लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपया दांव पर लगे होते हैं इसलिए खेल में मैच फिक्सिंग या स्पॉट फिक्सिंग जैसी चीजों की गुंजाइशें ज्यादा होती हैं.

अगर भारत में बेटिंग को वैध बना दिया जाए तो कम से कम यह ज़रूर होगा कि सट्टे का नेटवर्क सरकार की नज़र में रहेगा और इसमें काले पैसे और मनी लांडरिंग की भूमिका कम होगी. यही नहीं, सट्टेबाज़ी को वैध बनाते हुए मिलीभगत और फिक्सिंग के ख़िलाफ़ सज़ाएं भी तय की जा सकेंगी. लेकिन क्या इससे वाकई समस्या हल हो जाएगी? 15 बरस पहले संयुक्त मोर्चा सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने काले पैसे को सफेद बनाने की एक बड़ी योजना पेश की थी जिससे शायद 10,000 करोड़ रुपये आए भी थे. तब से अब तक काला पैसा ख़त्म नहीं हुआ, बढ़ ही गया है. जब खेलों पर इतनी बड़ी रकम दांव पर होगी तो कानूनी सट्टा भी गैरकानूनी राह पकड़ कर आगे बढ़ सकता है.

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