देस हुआ बेगाना

पढ़ाई के लिए इन परिवारों के बच्चों को प्रशासन की ओर से अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र जारी किया जाता है. लेकिन यह भी आसानी से हासिल नहीं होता. दसवीं का छात्र राहुल बताता है कि पिछले साल उसे बोर्ड परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाना था जिसे हासिल करने के लिए उसने अपने गांव से लेकर तहसील मुख्यालय पूरनपुर, जो करीब 35 किलोमीटर दूर है, तक के चक्कर लगाए. वह बताता है, ‘चार चक्कर लगाए, लेकिन प्रमाण पत्र नहीं बन सका. बिना प्रमाण पत्र के बोर्ड का फार्म भरने के कारण निरस्त कर दिया गया’. इस तरह की स्थिति का सामना हर साल हजारों छात्र-छात्राओं को करना होता है.

लालफीताशाही ने यहां के निवासियों की पूरी जिंदगी को मखौल में तब्दील कर दिया है. पैसा खर्च करके युवक पहले तो स्थायी निवास प्रमाण पत्र बनवाते हैं उसके बाद पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि वे सभी जरूरी कागजात बनवा लेते हैं जिन्हें बनवाने के लिए भारतीय नागरिकता अनिवार्य है. एक-दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में युवकों ने नागरिकता न होने के बावजूद अपना ड्राइविंग लाइसेंस व पैनकार्ड बनवा लिया है. इन कागजात के सहारे युवक नौकरी में भी अपना भाग्य आजमाते हैं. लेकिन अस्थायी निवास प्रमाण पत्र होने के कारण उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है क्योंकि इन प्रमाण पत्रों में साफ-साफ लिखा होता है कि यह शैक्षिक संस्थान में प्रवेश के लिए है, न कि नागरिकता के लिए.

नागरिकता का मामला सिटिजनशिप एक्ट 1955 में वर्णित है तथा यह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है. साफ है कि नागरिकता का मामला भले ही भारत सरकार का हो लेकिन बिना नागरिकता के ही कई परिवार भारत सरकार की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं. भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना इंदिरा आवास का लाभ सरकारी कर्मचारियों को चंद रुपये देकर बंगाली समुदाय के लोग बड़ी आसानी से उठा लेते हैं. इसका प्रमाण बंगाली कालोनियों में जाकर आसानी से देखने को मिलता है, जहां एक-दो नहीं बल्कि कई कमरे इंदिरा आवास की सरकारी मदद से बने देखने को मिलते हैं.

बंगाली समुदाय के लाखों लोगों की इस बदहाली पर पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी कहते हैं, ‘बांग्लादेश में हालात खराब होने पर मेरी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिंदू परिवारों को यहां बुला कर बसाने का काम शुरू किया था जो बखूबी हुआ. जो लोग शुरू में आ गए, उन्हें तो नागरिकता मिल गई लेकिन 1964 के बाद आगे के 15 सालों तक बंगाली परिवारों का पलायन होता रहा. समस्या इसलिए है कि सभी परिवार एक साथ नहीं आ पाए. जो बाद में आए नागरिकता की समस्या उन्हीं के लिए है.’ वे आगे कहते हैं, संसद में हमने कई बार इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन केंद्र सरकार इस पर ध्यान ही नहीं दे रही, क्योंकि नागरिकता का मामला केंद्र सरकार का है. गृहमंत्री से भी मुलाकात की लेकिन समस्या का हल नहीं निकल सका.’

कैसे मिलती है नागरिकता

भारत की नागरिकता का जिक्र संविधान के अनुच्छेद पांच से 11 में है. इसमें नागरिकता के लिए जिन शर्तों का उल्लेख है उनमें एक प्रावधान नैचरलाइजेशन का भी है. इसके मुताबिक ऐसा कोई भी विदेशी व्यक्ति भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकता है जो 12 साल से देश में रह रहा हो. यह जरूरी है कि आवेदक 14 साल की अवधि में कुल 11 साल के लिए भारत में रहा हो और आवेदन से पहले उसने 12 महीने का समय भारत में बिताया हो.

व्यथा कथा 1: दीपक बाड़ोई

बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के फरीदपुर जिले के बनगांव से आए दीपक बाड़ोई जीप चलाकर अपनी विधवा मां, पत्नी तथा बच्चों का पेट पाल रहे हैं. दीपक बताते हैं, ‘जीप चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता थी, लिहाजा आरटीओ कार्यालय में कुछ रुपये देकर उसे भी हासिल कर लिया.’ इतना ही नहीं, दीपक के पास राशन कार्ड के साथ-साथ चुनाव के लिए फोटो पहचान पत्र भी है जो उनकी नागरिकता को साबित करता है. इसके बावजूद उनके पास स्थायी नागरिकता आज तक नहीं है.

दीपक बताते हैं, ‘2005 में हाईस्कूल का फार्म भरने के लिए अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाना था जो 400 रुपये खर्च करने के बाद बना.’ बांग्लादेश से आने के बाद सरकार की ओर से दीपक के परिवार को मध्य प्रदेश के माना कैंप में रखा गया. कैंप में रहने के लिए भारत सरकार के पुनर्वास मंत्रालय की ओर से कार्ड जारी किया गया. दीपक की बुजुर्ग मां सुचित्रा बताती हैं, ‘कैंप के पास पहाड़ पर कुछ जमीन भी आवंटित हुई लेकिन वह खेती के योग्य नहीं थी, इसलिए 1975 में परिवार को लेकर पीलीभीत आ गए. यहां आने के बाद सरकार की ओर से जारी कार्ड के आधार पर नागरिकता हासिल करने का प्रयास शुरू किया लेकिन सफलता नहीं मिली.’ नागरिकता न होने के कारण उन्हें पीलीभीत में सरकार की ओर से न तो खेत ही आवंटित हुआ और न ही दूसरी अन्य सुविधाएं मिलीं. 1964 में पुनर्वास मंत्रालय की ओर से उन्हें जारी कार्ड भी अब जर्जर अवस्था में पहुंच गया है जिसे अपने कलेजे से लगा कर सुचित्रा और दीपक नागरिकता की आस में अधिकारियों की चौखट पर भटकते रहते हैं.

व्यथा कथा 2: धीरेंद्र विश्वास

पीलीभीत जिले में रमनगरा के रहने वाले 24 साल के धीरेंद्र विश्वास के परिवार की एक पूरी पीढ़ी का जीवन बिना नागरिकता के ही गुजर गया है. ग्रैजुएट धीरेंद्र बताते हैं कि 2008 में एसएसबी में सिपाहियों की जगह निकली. इसमें बताया गया था कि बॉर्डर एरिया के युवकों को इसमें वरीयता दी जाएगी. धीरेंद्र का गांव रमनगरा भी नेपाल की सीमा से लगा हुआ है लिहाजा उन्होंने भी अपना फॉर्म भर दिया. फॉर्म के साथ उन्होंने पहचान पत्र के रूप में राशन कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पास बुक की फोटो कॉपी और अस्थायी निवास प्रमाण पत्र  लगाया. इतना सब होने के बावजूद धीरेंद्र का फॉर्म यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि उनके पास भारतीय नागरिकता ही नहीं है.

धीरेंद्र बताते हैं कि सिर्फ एसएसबी में ही नहीं बल्कि कई सरकारी नौकरियों में रुपये खर्च करके फॉर्म आदि भरने के बाद लेकिन हर बार उनका फॉर्म नागरिकता के अभाव में रद्द कर दिया गया. थक हार कर धीरेंद्र घर बैठ गए. परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी उन पर ही है, लिहाजा उन्होंने गांव में ही एक छोटी-सी परचून की दुकान खोल ली है.

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