‘दीवानी’ हुई सियासत

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बीती 25 मई को छत्तीसगढ़ के सुकमा पहाड़ी (बस्तर) इलाके में नक्सलियों के सबसे बड़े हमले में जब छत्तीसगढ़ के कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित पार्टी के कई बड़े नेता मारे गए तब उससे भड़की सियासी आग में मप्र के नेताओं ने करीब सवा महीने तक रोटियां सेंकीं. इस दर्दनाक हादसे के फौरन बाद मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया. इसी के साथ उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को आड़े हाथों लेते हुए यहां तक कह डाला कि इस नक्सली हमले की जानकारी रमन सिंह को पहले से ही थी और इस साजिश में वे भी शामिल हैं. वहीं भूरिया के इस बयान पर पलटवार करते हुए मप्र भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने इस हादसे को छत्तीसगढ़ कांग्रेस में चल रही गुटबाजी का नतीजा बताया. इतना ही नहीं तोमर ने दो कदम आगे जाकर यह सनसनीखेज बयान भी दे डाला कि इस घटना के बाद जोगी का रुदन देखकर लगता है इसके पीछे जोगी का ही हाथ है. नतीजा यह कि इस बयान से उठे बवाल के बाद गुस्साए जोगी ने 11 जून को रायपुर में तोमर पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा ठोक दिया. और इसके चंद रोज बाद ही छत्तीसगढ़ में भाजपा प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव ने रमन सिंह के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी को लेकर भूरिया को भी उनके भोपाल के पते पर मानहानि का नोटिस पहुंचा दिया.

चुनावी समर में मची इस उथल-पुथल के बीच 21 जून को मानहानि का ही एक और नोटिस हरदा के भाजपा विधायक और पूर्व राजस्व मंत्री कमल पटेल ने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को थमाया. दरअसल 15 मार्च को सिंह ने हरदा जिले के एक किसान सम्मेलन में पटेल पर बेहिसाब संपत्ति बटोरने और इंदौर में आलीशान होटल खरीदने का आरोप लगाया था. पटेल के वकील प्रवीण सोनी के मुताबिक, ‘अजय सिंह ने कहा था कि मप्र का बजट यदि छह गुना बढ़ा है तो पटेल की माली हैसियत सौ गुना सुधरी है. हरदा से लेकर भोपाल तक पटेल की हजार एकड़ से कम जमीन नहीं है. सिंह ने यहां तक कहा था कि पटेल ने चंडीगढ़ में जमीन ले ली है और रिटायरमेंट के बाद वे वहीं रहेंगे.’ वहीं सिंह के आरोपों को लेकर पटेल का मानना है कि इससे जनता के बीच उनकी बड़ी किरकिरी हुई है.

मप्र में चल रही मानहानि की इस सियासी बिसात पर गौर करें तो अब तक मुख्य रुप से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ही निशाने पर रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में ऐसा इसलिए है कि चुनाव नजदीक देख सिंह ने सत्ता विरोधी हवा बढ़ाने के लिए बीते साल से ही हमलावर रुख अख्तियार कर लिया था. लिहाजा सत्तारूढ़ भाजपा ने उन पर चौतरफा हमले करके लगाम कसने की कवायद शुरू कर दी और सिंह के ही बयानों के आधार पर उन्हें घेरने की यह रणनीति अपनाई है.

काबिले गौर है कि मप्र में भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष पदों पर बैठे नेता अब तक पत्रकार वार्ताओं, बयानों और पत्रों के जरिए एक-दूसरे को घेरते रहे हैं. लेकिन प्रदेश की सियासत में इन दिनों जारी मुकदमेबाजी का यह दौर नया है. शीर्ष नेताओं के स्तर पर इसकी शुरुआत आज से ठीक एक साल पहले तब हुई थी जब नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा पर मानहानि का मुकदमा ठोका था. दरअसल तब झा ने अजय सिंह पर उनके राजनीतिक क्षेत्र चुरहट में आदिवासियों की जमीन हथियाने का आरोप लगाया था. इसके बाद 5 जून, 2012 को सिंह ने झूठे कागजात पेश करने के मामले में झा सहित चार लोगों के खिलाफ प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी, भोपाल के सामने आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिया था. हालांकि अब यह मामला ठंडा पड़ गया है. लेकिन इसके साथ शुरू हुआ मुकदमेबाजी का सिलसिला हाल-फिलहाल मप्र की सियासत का तापमान बढ़ा रहा है.

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