दर दर भटकते रोहिंग्या शरणार्थी

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अभी पिछले ही दिनों अराका न रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) ने पुलिस स्टेशन पर हमले किए और सेना के एक शिविर को अगस्त के आखिरी दिनों में उड़ा दिया । इसके बाद जो दमन चक्र म्यांमार की सैनिक टुकडिय़ों ने रोहिंग्या लोगों पर चलाया उसमें न जाने कितने मारे गए और तकरीबन तीन लाख लोगों ने देश छोड़ दिया। इस घटना पर तुर्की और ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और चेतावनी दी कि यदि यह मार-काट नहीं थमी तो सैनिक कार्रवाई भी हो सकती है।

भारत में तकरीबन 40,000 रोहिंग्या शरणार्थी आ गए हंै। भारत सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि इन शरणार्थियों को वापस जाना होगा क्योंकि इस से भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से खतरा हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के बाद यांगून (रंगून) गए भी लेकिन इस मसले पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और बांग्लादेश को भी इस मामले में भारत से सहयोग की उम्मीद थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर म्यांमार सरकार से कोई बातचीत नहीं की। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी संयुक्त विज्ञप्ति में भी इस मुद्दे पर खामोशी है।

स्ंायुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार के हाई कमिश्नर जेड रॉड अल हुसैन ने म्यांमार में हो रही हिंसा को ‘सामुदायिक सफाई मुहिम बताया और भारतीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिूज के बयान की निंदा की । उन्होंने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के 36वें सत्र में बोलते हुए कहा कि भारत शरणार्थियों को ‘जबरन वापसÓ नहीं भेज सकता। जहां उन पर फिर यातनाओं का दौर शुरू होगा। म्यांमार सरकार को यह झूठ बोलने से बाज आना चाहिए कि रोहिंग्या ही अपने घरों में आग लगा रहे हैं और अपने गांव तबाह कर रहे हैं।

भारतीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने अपने बयान में कहा था भारत ने शरणार्थी सम्मेलन (रिफ्यूजी कन्वैशन) के कागजों पर दस्तखत नहीं किए हैं, इसलिए वह इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में ही नहीं आता। रिजिजू यह भूल गए कि भारत ने हमेशा शरणार्थियों को देश में शरण दी है चाहे वे तिब्बत के बौद्ध हो, खुद दलाई लामा हों, या फिर बांग्लादेश (पूर्व पाकिस्तान) से आए हजारों शरणार्थी रहे हों।

सबसे ज़्यादा दुखद है कि आंग सान सू की जिन्होंने खुद एक लंबा समय म्यांमार के सैनिक शासकों के खिलाफ आंदोलन चलाया और 15 साल तक का लंबा समंय नजऱबंदी में बिताया,को भी इन रोहिंग्या शरणार्थियों से कोई हमदर्दी नहीं है। उसी आंदोलन के चलते उन्हें शांति नोबल पुरस्कार भी मिला और सारी दुनिया में उनकी अपनी एक पहचान बनी। आज म्यांमार के शासन पर उनका प्रभाव है और उनके ही देश के नागरिक रोंिहंग्या शरणार्थी के तौर पर बांग्लादेश की सीमा पर ‘नो मेंस लैंडÓ में तकलीफ भरी जिंदगी जी रहे हैं और भारत की सीमा पर शरण की तख्ती लिए खड़े हैं।

पूरी दुनिया में रोहिंग्या शरणार्थियों की विपदा पर व्यापक चिंता है। कुछ संस्थाएं और देश तो इसे एक जाति विशेष के खिलाफ दमन भी कहते हैं। जर्मनी जहां सीरिया, मिस्र वगैरह देशों से आए शरणार्थियों को शरण मिली उसने म्यांमार को दी जा रही अपनी कई सहायक परियोजनाएं बंद कर दी हैं। तुर्की, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात , मलेशिया आदि ने इन रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ बौद्ध सेना और बौद्धों के सशस्त्र संगठनों द्वारा की जा रही हिंसक कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की हैं। भारत के विभिन्न नगरों में मुसलिम समुदाय ने भी रोहिंग्या शरणार्थियों के साथ अपनी एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किए हैं। उधर इस पूरे मसले पर भारत सरकार के अस्पष्ट रुख से बांग्लादेश में भी खासी असहजता है। क्योंकि एक तरफ भारत ने बांग्ला देश के अनुरोध पर राहत सामग्री से लैंस विमान तो ढाका भेजा लेकिन यह भी कहा कि भारत शरणार्थियों को वापस भेजेगा।

पूरी दुनिया में म्यांमार शासन की हो रही निंदा के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय नेे जो बंयान जारी किया है उसमें कहा गया है कि म्यांमार राखिने (म्यामार का प्रांत) में हो रही घटनाओं पर भारत गंभीर रूप से चिंतित हैं । इन हालात को गंभीरता से सामान्य बनाने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नागारिकों की स्थिति सहज हो सके और सुरक्षा सेनाएं उनकी रक्षा कर सकें।

इसी बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने अभी हाल में यांगून की यात्रा की। उन्होंने सुरक्षा सेनाओं और निर्दोष लोगों के हताहत होने पर चिंता भी जताई । हमें उम्मीद है कि हिंसा जल्दी ही थमेगी और राज्य में शांति तेजी से वापस आएगी।

इस बयान से यह पता लगता है कि प्रधानमंत्री ने शांति, संप्रदायिक सौहार्द्रता ,न्याय, सम्मान और लोकतंात्रिक मूल्यों के तहत वहां की समस्याओं का समाधान चाहा है। इस बात पर दोनों देशों में सहमति बनी कि भारत राखिन राज्य विकास कार्यक्रम में म्यांमार सरकार के साथ सहयोग करना चाहेगा।

दरअसल बांग्लादेश में दिनों-दिन शरणार्थियों की तादाद बहुत बड़ी हो रही है। जिसे संभाल पाने में वहां की शासन-व्यवस्था के सामने तमाम तरह की परेशानियां हैं राहत सामग्री के वितरण में भी घनघोर अनियमितता है। पेयजल और इलाज की भी सुविधा लगभग नहीं है । बांग्लादेश किसी तरह शरणार्थियों को पनाह ज़रूर दे रहा है लेकिन आखिर में वहां अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ही चीजों को संभालना होगा।