दबंगों के दबाव में रोती ‘रुदालियां

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आंसू बहाते हैं, पोंछते नहीं!

‘रूदालीÓ के नाम से अभिशप्त आदिवासी महिलाओं को गांवों के बीच रहने का हक नहीं होता। इनके घर गांव की सरहदों के बाहर बने होते हैं। ये पेशेवर औरतें होती है जो विलाप के दौरान मृतक के कार्यो का बखान करते हुए संवेदना का ऐसा माहौल रच देती है कि देखने सुनने वालों की आंखे बरसे ही बरसे। इनका क्रन्दन इतना आवेग भरा होता है कि लगता है मरने वाला इनका अपना ही कोई सगा-संबंधी था। यह एक प्रचलित परम्परा है कि गांवों के ठाकुरों और जमीदारों के परिवार में जब भी किसी की मृत्यु की खबर फैलती है हर कोई मृतक की हवेली परिसर में एकत्रित हो जाते हैं। परम्पराओं के मुताबिक मृतक के परिवार की महिलाएं बाहर नहीं निकलती, गांव के लोग ही ठाकुर की निगाह में चढऩे के लिए दाह संस्कार की व्यवस्था में जुट जाते हैं। किराए पर मातम करने वाली रुदालियां काले वस्त्र पहन लेती है और करुण विलाप के साथ छाती कूटती हुई जमीन पर लोट-पोट हो जाती है। रुदालियां ज्यादा से ज्यादा आंसू बहाने का प्रयास करती है लेकिन बहते हुए आंसूओं को पोंछने की कोशिश नहीं करती। रुदालियों द्वारा काले वस्त्र धारण करने के पीछे अवधारणा है कि काला रंग मृत्यु के देवता यमराज का पसंदीदा रंग है। इन महिलाओं को पारिवारिक जीवन जीने की इजाजत नहीं होती। क्योंकि खुशहाल पारिवारिक जीवन व्यतीत करने वाली महिलाएं भला कैसे किसी की मौत का मातम मना सकती है। उच्चकुल के ठाकुर और जमीदार परिवार की औरतों को अपने मर्तबे के मद्देनजर अपने परिजनों की मौत पर दूसरों के सामने आंसू बहाने की इजाजत नहीं होती। इस मातमपुर्सी के दौरान उन्हें हवेली के भीतर ही बना रहना होता है।

रुदालियों पर निधि दुगर कुंडालिया द्वारा लिखी गई पुस्तक में ठाकुर परिवार के एक मुखिया के हवाले से कहा गया है कि,’उच्चकुल की महिलाओं का आम लोगों के सामने आंसू बहाना मर्यादा के खिलाफ माना जाता है। यदि उनके पति की मृत्यु भी हो जाए तो भी उन्हें अपने दुख को दबाए रखना पड़ता है। उनकी वेदना दर्शाने का काम रुदालियां करती है।