तेजपाल से आगे

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सच पूछिए तो तेजपाल प्रकरण इस मामले में भी एक टेस्ट केस है कि कितने अखबारों और चैनलों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और हिंसा के मामलों से तुरंत और सक्षम तरीके से निपटने और पीडि़तों को संरक्षण और न्याय दिलाने की सांस्थानिक व्यवस्था है. क्या न्यूज मीडिया ने इसकी कभी ऑडिट की?

सच यह है कि इस मामले में पहले सुप्रीम कोर्ट के विशाखा निर्देशों और बाद में कानून बनने के बावजूद ज्यादातर अखबारों और चैनलों में कोई स्वतंत्र, सक्रिय और प्रभावी यौन उत्पीड़न जांच और कार्रवाई समिति नहीं हैै. क्या तेजपाल प्रकरण से सबक लेते हुए न्यूज मीडिया अपने यहां यौन उत्पीड़न के मामलों से ज्यादा तत्परता, संवेदनशीलता और सख्ती से निपटना शुरू करेगा और अपने संस्थानों में प्रभावी और विश्वसनीय व्यवस्था बनाएगा? इस पर सबकी नजर रहनी चाहिए.

दूसरे, तेजपाल के बहाने खुद तहलका पर भी हमले शुरू हो गए हैं. उसकी फंडिंग से लेकर राजनीतिक संपर्कों पर सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या तेजपाल के अपराध की सजा तहलका और उसमें काम करने वाले कई जुझारू और निर्भीक पत्रकारों को दी जा सकती है. यह भी कि क्या वे सभी अखबारों और चैनलों की फंडिंग और राजनीतिक संपर्कों की ऐसी ही छानबीन करेंगे? निश्चय ही, ऐसी छानबीन का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन यह चुनिंदा नहीं होनी चाहिए.

एक मायने में यह मौका भी है जब कॉरपोरेट न्यूज मीडिया के अंदर बढ़ती हुई सड़न सामने आ रही है. उसका घाव फूट पड़ा है. जरूरत उसे और दबाकर उसके अंदर के मवाद को बाहर निकालने की है. इसके बिना उसके स्वस्थ होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

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