तुम्हें याद हो कि न याद हो

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एक पुरानी हिंदी फिल्म बसंत बहार (1956) के गाने के बोल याद आ रहे हैं ‘सुर न सजे क्या गाऊं मैं, सुर के बिना जीवन सूना…’ कितना सही कहा है। सुर के बिना जीवन में कुछ नहीं सिवाए एक सूनेपन के, एक खला है। तभी तो भारतीय सिनेमा की आत्मा भी इन सुरों में ही समा कर रह रही है।

हमारे देश में फिल्मों और गानों का चोली दामन का साथ रहा है। शुरू शुरू में तो कुछ फिल्मों की कहानी ही गानों के माध्यम से कही गई। 1932 में बनी फिल्म ‘इन्द्रसभा’ में तो तकरीबन 70 गाने थे लेकिन धीरे-धीरे गाने कम होते गए और संवाद मुख्य भूमिका में आते गए। गाने फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने और मनोरंजन प्रदान करने की भूमिका निभाने लगे।

1970 व 80 के दशक भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णिम युग रहा है। जब साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आज़मी, शकील दायुनी, हसरत जयपुरी, शैलेंद्र, राजामेहदी अली खान और जानेसार अख्तर जैसे गीतकार, जैसे खून-ए-जिगर में कलम डुबोकर गीत लिखते थे। उसी समय ओपी नैय्यर, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, सरदार मलिक, हेमंत कुमार, एस डी बर्मन, नौशाद, सलिल चौधरी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याण जी आन्नद जी जैसे संगीतकार उन्हें संगीत में पिरोकर उनकी माला सजाते थे। तलत मेहमूद, मन्ना डे, मुहम्मद रफी, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले, मुकेश किशोर दा जैसे फनकारों की आवाज़ सोने पर सुहागे का काम करती थी।

उस समय के गाने मुख्यता रागों पर आधारित थे और अपनी लेखनी की वजह से फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने का काम करते थे।

पहले फिल्म की कहानी लिखी जाती थी उसके बाद ज़रूरत अनुसार गानों की ‘सिचुएशन’ निकालते थे। फिर हालात व माहौल के मुताबिक गाने लिखवाए जाते थे। ये गाने कहानी का एक हिस्सा बनकर फिल्म को चार चांद लगा देते थे।

यही वजह है कि वे गाने आज भी अक्सर हमारे होठों पर आ ही जाते हैं।

बारीकी से अध्यन करें तो पता चलता है कि ये गाने फिल्म में कई तरह की भूमिका निभाते थे। जैसे नायक और नायिका का चरित्र उभारने के लिए। ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा’, ‘ठाड़े रहिओ ओ बांके यार’ और ‘मौसम है आशिकाना’ जैसे गाने अगर न होते तो मीना कुमारी शायद कभी पाकीज़ा नहीं बन पातीं।

यही बात ‘उमराव जान’ व ‘मिजऱ्ा गालिब’ जैसी फिल्मों पर भी लागू होती है।

नायक नायिका की मनोदशा को कुछ ही शब्दों में प्रभावपूवर्क बयान करना, गाने के ही बस की बात है। फिल्म ‘हीर रांझा’ में ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं’ जैसे गाने से चार मिनट में नायक की मनोदशा का वर्णन शायद संवाद द्वारा संभव ही नहीं था। जब जब फूल खिले में ‘परदेसियों से न अखियां मिलाना’ हो या ताज महल का ‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’ जैसे गीत इस बात का जीता जागता सूबूत हैं। मन में अचानक उठी उमंग की परिणिति फिल्म गाइड के गाने ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’ में है। हकीकत के गाने ‘हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ में फौजी जवानों की मनोदशा का सजीव चित्रण करता है। जिसने दर्शकों को रु ला के रख दिया था।

कुछ गानों का इस्तेमाल फिल्म में लंबे कालांतर को थोड़े समय में दिखाने के लिए बखूबी किया गया। फिल्म गाईड में नायिका का एक गुमनाम और अनाम कलाकार से लेकर एक सुप्रसिद्ध नृत्यांगना बन जाने तक का सफर एक गाने ‘पिया तोसे नैना लागे रे, जाने क्या हो अब आगे रे…’ में सफलतापूर्वक दिखा दिया गया।

इसमें तो कोई शक नहीं कि फिल्मों में गानों का इस्तेमाल आमतौर पर नायक नायिका के प्रेम संबंधों को प्रदर्शित करने के लिए ही होता रहा है। कब तक बेचारा नायक नायिका को यह बताने के लिए उसके आगे पीछे घूमता रहेगा कि वह उससे प्यार करता है और कब और कैसे नायिका बताएगी कि वह भी उसे चाहने लगी है। दोनों ने मिलकर एक गाना गाया नहीं और सबको पता चला नहीं कि लो भाई, हो गया। फिल्म संगम में तो नायक ने नायिका से सीधा ही पूछ लिया था, ‘बोल राधा बोल, संगम होगा कि नहीं’।

एक गंभीर और संवेदनशील कहानी में कुछ अंतराल के बाद या मारा-मारी से भरे दृश्यों के बाद दर्शक के दिमाग को थोड़ा सकून देने के लिए तो गाना ज़रूरी होता ही है। कहने का अभिप्राय यही है कि जो गाना एक खास माहौल बनाने या कहानी को आगे बढ़ाने के लिए बनाया हो वह कभी भूलता नहीं और वर्षों तक दर्शकों के दिमाग में ताज़ा रहता है। 50 साल पुरानी फिल्म नील कमल का गाना ‘बाबुल की दुआंए लेती जा…’ आज बेटी की विदाई के समय का थीम सांग बनने के साथ हमारी संस्कृति में भी समा गया है।

इसके साथ ही फिल्म 1977 में आई फिल्म ‘आदमी सड़क का’ का गाना ‘आज मेरे यार की शादी है’ या ‘मेरा यार बना है दूल्हा और फूल खिले है दिल के, मेरी भी शादी हो जाए दुआ करो सब मिल के…’ (फिल्म चौदहवीं का चांद 1960) भी भारतीय शादियों की शोभा बनते हैं। शायद बहुत से लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि ये गाने फिल्मी हैं। उनके लिए ये शायद हमारे लोकगीत ही हों।

और आज का संगीत..? संगीत कभी बुरा नहीं होता। लेकिन आज की फिल्मों के अधिकतर गाने हमें याद क्यों नहीं रहते? सिनेमा हाल से घर तक के सफर में ये गाने गुम क्यों हो जाते हैं? कारण यह नहीं कि उनका संगीत अच्छा नहीं होता बल्कि यह है कि ये गाने फिल्म की कहानी में पिरोए हुए नहीं होते। कहानी को आगे नहीं बढ़ाते। कुछ कहते नहीं हैं। बस जबरी डाले हुए होते हैं, न भी होते तो चल सकता था। और हां… रैप भी एक तरह का संगीत ही है। लेकिन इसे किसी भी गाने में डाल देने से मुझे लगता है, गाने की गंभीरता खत्म हो जाती है क्योंकि हम लोग असली जि़न्दगी मेें ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कभी नहीं करते जो रैप में होता है। शायद इसीलिए हमें उसके बोल याद नहीं रहते।

आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कुछ निर्माता फिल्म की कहानी लिखवाने से पहले ही गाने रिकार्ड करवा लेते हैं। फिर उन गानों को कहानी में फिट करने के लिए कहानी लेखक से कहा जाता है कि इसके लिए ‘सिचुएशन’ बनाइए। ऐसे प्रयास अक्सर फिल्म के पटकथा को कमज़ोर और खराब कर देते हैं।

आप खुद सोचिए कि ऐसे गाने कितनी देर याद रहेंगे जिनका कहानी के साथ लेना देना ही न हो। इस चीज़ को जि़न्दगी के साथ जोड़ें। हम रेल या बस में सफर करते हैं। कितने नए लोगों से हमारा परिचय होता है, बातचीत होती है, लेकिन कुछ समय बाद हमें उनकी शक्लें भी याद नहीं रहतीं।

दूसरी तरफ एक ऐसा इन्सान, जो हमारी जि़न्दगी की कहानी को एक गीत की तरह एक पल के लिए भी छू कर चला गया हो, वह हमें ताउम्र नहीं भूलता। बस इतनी सी बात है चाहे जि़न्दगी से जोड़ लो चाहे फिल्म से क्योंकि फिल्में ही तो जि़न्दगी और समाज का आइना होती हैं।