टोक्यो ओलंपिक भारत को कई पदकों की उम्मीद

मुक्केबाज़ी : इस स्पर्धा में देश को पदकों की पूरी उम्मीद है। विजेंद्र ने मुक्केबाज़ी में देश को पहला पदक दिलाया था। 24 जुलाई से शुरू हो रही मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक की सबसे बड़ी उम्मीद छ: बार की विश्व विजेता, एशियाई खेलों में दो गोल्ड मेडल जीतने वाली, राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन और पाँच एशियाई चैम्पियनशिप जीतने वाली 38 साल की मैरीकॉम पर रहेंगी। यह शायद उनका अन्तिम ओलंपिक हो। इसे वह हर तरह से यादगार बनाना चाहेंगी। उनके अलावा लवलीना बोरगोहेन (69 किलोग्राम भार वर्ग) दो बार विश्व चैंपियन रह चुकी हैं। वह भी पदक की दावेदार हैं। 75 किलोग्राम भार वर्ग में पूजा रानी ने इस साल एशियाई चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता है। वह भी पदक पर अपना दावा पुख़्ता कर रही हैं। इसके बाद 60 किलोग्राम भार वर्ग में सिमरनजीत कौर भी कमज़ोर नहीं हैं। इन सभी से पदक की उम्मीद है।
पुरुष वर्ग में अमित पंघाल का 52 किलोग्राम भार वर्ग में दावा बहुत पक्का है। वह एशियाई खेलों के चैंपियन हैं और विश्व चैंपियनशिप व राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीत चुके हैं। उनके साथ विकास कृष्ण (69 किलोग्राम भार वर्ग) भी विश्व चैंपियनशिप में पदक जीत चुके हैं। 75 किलोग्राम भार वर्ग में 24 साल के युवा मुक्केबाज़ आशीष कुमार एशियाई खेलों में दो पदक जीत चुके हैं। इनके साथ सतीश कुमार (91 किलोग्राम भार वर्ग), और मनीष कौशिक (63 किलोग्राम भार वर्ग) से भी पदकों की उम्मीद है।

भारोत्तोलन : इसी स्पर्धा में कर्णम मल्लेश्वरी ने देश को पदक दिलाया था। इस बार टोक्यो में एक मात्र खिलाड़ी मीराबाई चानू होंगी। 300 किलोग्राम से ऊपर का कुल भार (वज़न) उठाने वाली चानू से पदक की उम्मीद की जा सकती है।

बैडमिंटन : बैडमिंटन में इस बार भारत के चार खिलाड़ी भाग ले रहे हैं। इनमें विश्व चैंपियन और रियो ओलंपिक खेलों की रजत पदक विजेता पी.वी. सिंधु, बी. साई प्रणीत, सात्विकसैराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी शामिल हैं। इनमें से पदक की आस केवल सिंधु से की जा सकती है।

एथलेटिक्स (खेलकूद) : एथलेटिक्स को खेलों की रानी कहा जाता है। पर ओलंपिक खेलों के 125 साल के इतिहास में यदि सन् 1900 के पेरिस ओलंपिक को छोड़ दें, जहाँ एक अंग्रेज नॉर्मन प्रिचर्ड ने भारत की ओर से भाग लेकर 200 मीटर और 200 मीटर बाधा दौड़ में रजत पदक जीते; आज तक कोई भारतीय कभी भी पदक नहीं जीत पाया। भारत की ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बस चौथा स्थान रहा। रोम (1960) में मिल्खा सिंह 400 मीटर की दौड़ में और लॉस एंजिल्स (1984) में पी.टी. उषा 400 मीटर बाधा दौड़ में चौथे स्थान पर रहे। गुरबचन सिंह रंधावा टोक्यो (1964) की 110 मीटर बाधा दौड़ और अंजू बॉबी जॉर्ज एथेंस (2004) की लम्बी कूद में पाँचवें स्थान पर रहे। श्रीराम सिंह को मॉन्ट्रियल (1976) की 800 मीटर दौड़ में सातवाँ स्थान मिला। भारत को आज तक एथलेटिक्स में पहले पदक की तलाश है।
इस बार भाला (जैवलिन) में देश नीरज चोपड़ा और शिवपाल सिंह से पदक की आस है। यदि इन दोनों के प्रदर्शन पर नज़र डालें, तो नीरज का सर्वश्रेष्ठ प्रयास 88.07 मीटर का और शिवपाल 86.23 मीटर का है। इस स्पर्धा का विश्व रिकॉर्ड जान ज़ेलेंज़्नी के नाम है। उन्होंने 98.48 मीटर की दूरी नापी थी। रियो में इस स्पर्धा के विजेता ने जर्मनी के थॉमस रोहलर ने 90.30 मीटर जैवलिन फेंका था। वहाँ तीसरा स्थान पाने वाले त्रिनिदाद एवं टोबैगो के केशोर्न वाल्कॉट ने 85.38 मीटर तक जैवलिन फेंका था। इससे ऐसा लगता है कि यदि भारतीय खिलाड़ी अपना प्रदर्शन कुछ सुधार गये, तो पदक की उम्मीद की जा सकती है।
गोला फेंक (शॉटपुट) में तेजिंदर तूर को भी 22 मीटर तक का फ़ासला बनाना होगा। अब तक वह 21.49 मीटर तक ही फेंक सके हैं। रियो में अमेरिका के रयान क्राउसर ने 22.52 मीटर की दूरी मापकर स्वर्ण पदक जीता था।
कमोबेश यही स्थिति महिला मण्डल की भी है। यहाँ भी कमलप्रीत कौर यदि अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास 66.59 मीटर को कम-से-कम दो मीटर और बढ़ाती हैं, तो पदक की उम्मीद बनती है। सीमा पूनिया का बेहतरीन प्रदर्शन 63.72 मीटर है। उनके लिए शायद छ: मीटर बढ़ाना सम्भव नहीं होगा। इसके अलावा महिला जैवलिन थ्रो, स्टीपलचेज, 20 किलोमीटर रेस वॉक में पदक आना एक चमत्कार ही होगा। महिलाओं में यदि प्रियंका गोस्वामी ने अपने सर्वश्रेष्ठ समय 1:28.45 घंटे में एक मिनट का भी सुधार कर लिया, तो पदक मिल सकता है। भावना जाट का भी बेहतरीन समय 1:29.54 घंटे का है। इस समय को वह सुधार लें, तो ही उनसे पदक की उम्मीद की जा सकती है। रियो ओलंपिक में चीन की लियू हांग ने 1:28.35 घंटे का समय लेकर स्वर्ण पदक जीता था। मेक्सिको की मारिया ग्वादालूपे गोंज़ालेज़ 1:28.37 घंटे के समय के साथ दूसरे स्थान पर थीं और चीन की लू ज़िउझी (1:28.42) तीसरे स्थान पर रहीं। जहाँ सात सेकेंड के अन्तर से पदकों का फ़ैसला होता है, वहाँ एक मिनट बहुत बड़ा अन्तर है।
देखना रोचक होगा कि भारत के खिलाड़ी इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं?