जीएसटी की मार: त्योहार में कमज़ोर रहा व्यापार

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उनका कहना है कि सरकार ने बिना सोचे समझें जीएसटी को थोप दिया कि देश में कालाबाजारी और टैक्स की चोरी नहीं होगी बल्कि अब व्यापारी अब ज्यादा चतुर हुआ है। सरकार को ये मालूम नहीं कि व्यापार में प्रतिस्पर्धा का दौर रहा है ऐसे में अब व्यापारी ग्राहकों को कम लागत में अच्छी गुणवत्ता की वस्तु कैसे दे सकता है। यहां के व्यापारियों ने नाम न छापने पर सरकार को कोसते हुए व्यापारी विरोधी बताते हुये बताया कि जिस तरीके से जीएसटी थोपा तो गया पर उसके प्रैक्टिकल को नहीं समझा गया कि किस तरह छोटी -छोटी अड़चने तमाम दिक्कतें करती हैं।जैसे माल पैक करने से लेकर ढुलाई तक। देश के अन्य दूर-दराज राज्यों से यहां पर छोटे और बड़े व्यापारी खरीददारी को आते है लेकिन वे जीएसटी कानून के बारीकी से अनजान है ऐसे में वे बड़े हुए बिल के साथ सामान खरीदने से कतरा रहे है। जिसके कारण चांदनी चौक का ऐतिहासिक व्यापार अब सन्नाटा और सूनेपन की भेंट चढ़ रहा है। इलैक्ट्रानिक बाजार में आज भी ज़्यादातर दुकानदार वहीं पुराने रेट पर जीएसटी की परवाह किये बिना अपना सामान बेच रहे हैं और सरकार पर दोष मढ़ रहे हैं कि जब सरकार ही व्यापार और दुकानदारों की समस्याओं से अनजान है तो ऐेसे में वहीं पुराने रेट पर सामान बेंच कर अपनी दुकान को बंद कर किसी नए काम की तलाश में है। ऐसी परिस्थिति में दुकानों में लगे कर्मचारियों के सामने रोजगार का संकट मंडरा रहा है। लक्ष्मी नगर के टीवी,फ्रिज और एसी बेचने वाले लक्ष्मी प्रसाद और प्रदीप कुमार ने बताया कि उपभोक्ताओं की कमी के कारण बिक्री न होने से लगाई गई पूंजी नहीं निकल पा रही है। मजबूरन उनको सस्तें दरों पर सामान बेचना पड़ रहा है।

भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के राष्ट्रीय महामंत्री विजय प्रकाश जैन का कहना है कि जीएसटी से 30 से 70 प्रतिशत व्यापार प्रभावित हुआ है। जिससे महंगाई बढ़ी है और बढ़ती ही जा रही है। अब 28 प्रतिशत टैक्स का उपभोक्ता विरोध कर रहा है। पहले पांच फिर 12 अब 28प्रतिशत टैक्स तो ऐसे में दुकानदार और ग्राहक दोनों परेशान क्योंकि जब शुरूआत में फाइनेंस कमीशन ने 12 से 13 प्रतिशत टैक्स की बात की थी तो अब 28 प्रतिशत टैक्स बहुत ना इंसाफी। उन्होंने बताया कि 1 हजार 56 आइटमों पर टैक्स लगाया गया है जबकि पहले साढ़े तीन सौ आइटमों पर वैट नहीं लगता था जो अब साढे तीन सौ से घट कर लगभग 90 के करीब आइटम रह गये है जो जीएसटी से दूर है। ऐसे हालात में व्यापार का बेड़ा गर्क होना कोई अंचंभा नहीं है।

अब बात करते हैं शिक्षा और खेल की। एक ओर तो सरकार शिक्षा और खेलो को बढ़ावा देने की बात करती है वहीं जीएसटी कानून से खेल और शिक्षा अछूते नहीं रहे हैं। दिल्ली में जितने भी डीडीए के स्र्पोट्स कॉम्पलैक्स है वहां पर जिन -जिन खेलों की कोचिंग चल रही है उन्होंने अपने छात्रों से फीस में जीएसटी जोड़ कर बिल देना शुरू कर दिया है इसके कारण मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों को अब कोंचिग लेना मुश्किल हो रहा है। सिरी फोर्ट में बैडमिडंन की कोंचिग लेनी वाली नौ साल की छात्रा के पिता अजय पाल सिंह ने बताया कि यहां पर तीन से पांच हजार रूपये महीने की फीस पर तमाम खेलों की कोंेिचग के लिये लगते हैं। लेकिन जीएसटी के नाम पर कम से कम 540 रुपये से बढाकर वसूले जा रहे हैं जो खेल प्रतिभाओं के साथ सरासर अन्याय है। उन्होंने बताया कि शीघ्र ही एक अभिभावकों का प्रतिनिधिमंडल खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौर से मिलेगा और खेल को जीएसटी से दूर रखने की बात करेगा। अन्यथा कई अभिभावक ऐसे हंै जो अपने बच्चों को इन खेल कोंचिंग में भेजने से परहेज करेगे क्योंकि ज़्यादात्तर अभिभावकों की माली हालत ठीक नहीं है। उन्होंने बताया कि स्र्पोट्स के सामान पर भी जीएसटी की मार है।

यहीं हाल नामी -गिरामी शिक्षण संस्थानों का है जो छात्रों से एडमिशन और कोचिंग के नाम पर घोषित और अघोषित तौर पर मोटी फीस वसूलने में लगे हैं। सबसे दिलचस्प और गंभीर बात दरअसल यह है कि जीएसटी कानून तो बना पर कानून को अपने -अपने तरीके से तोड़ा भी जा रहा है। दिल्ली -एनसीआर में सीए और और अन्य कोर्सो में एडमिशन लेने वाले छात्रों से कई संस्थान तो खुले तौर पर जीएसटी सहित बिल दे रही है पर कुछ संस्थान लक्ष्मी नगर में से है जो छात्रों से फीस बढ़ा कर बिना जीएसटी के फीस वसूल रही है फिर अपने तरीके से बिल बनाकर रिकार्ड में एकत्रित कर रही है। अगर छात्रों को कोचिंग के तौर पर दिये जाने वाले बिल और रिकार्ड का मिलान किया जाये तो बहुत बड़ा घोटाला सामने आएगा।

सबसे दिलचस्प व गंभीर बात यह है कि देश का नागरिक कई बार पैसा के अभाव में किस तरह अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर जाता है इस बात का अंदाजा नोट बंदी और जीएसटी कानून के आने के बाद से लगाया जा सकता है। जब देश में 2016 नवम्बर माह मे नोट बंदी हुई थी तब उस समय दिल्ली -एनसीआर में डेंगू और चिकुनगुनिया का कहर और प्रकोप तेजी से फैला था लेकिन पांच सौ और एक हजार का नोट चलन में बंद था और सौ के नोटों की भारी कमी देखने को मिल रही थी ऐसे में कई मरीजों ने तो प्राइवेट डाक्टरों के पास ही जाना बंद कर दिया था, सरकारी अस्पतालों में धक्कों से बचने के लिए मेडिकल स्टोरों से दवा लेकर भगवान भरोसे उपचार करते रहे। भूपेन्द्र और राहुल ने बताया कि प्राईवेट अस्पताल में कम से कम फीस 400 से 600 सौ रुपये के बीच है ऐसे में उनके पास पुराने नोट पांच सौ और एक हजार के रूपये चलन में नहीं थे ऐसी स्थिति में उन्होंने खुद को भगवान पर छोड़कर मेडिकल स्टोरों से दवा खरीदकर 20 से 25 रुपए में अपने इलाज खुद कर लिया।नामी -गिरामी पंच सितारा अस्पताल में तो अमीर ही जाते है इसलिये वहां पर जीएसटी का विरोध सुनाई नहीं देता है।

ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष कैलाश गुप्ता ने बताया कि दवाओं पर पहले 5 प्रतिशत टैक्स लगता था पर अब जीएसटी लगने से 12 से 18 प्रतिशत तक लगने लगा है। उन्होंने बताया कि बड़ी दवा कंम्पनियों ने भी एमआरपी बढ़ा दी है इसके कारण दवाएं मंहगी हुई। उन्होंने सरकार से मांग की है कि दवाओं को जीएसटी से दूर रखना चाहिए अन्यथा कई मरीज ऐसे हैं जो सरकारी अस्पतालों मेे तो इलाज करा लेते हैं और सरकारी दवा जो मिल जाती है उसी से काम चला लेते है पर डाक्टरों द्वारा ही लिखी गई मंहगी दवाओं को खरीदने से बचते हैं। यह मरीजों के स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं है।