जासूसी के हम्माम में सब..

0
179

राजनेताओं के ईमेल और टेलीफोन हफ्तों और कई बार महीनों संग्रहीत रहते हैं. ‘एनएसए’ के मुख्यालय में सैकड़ों कर्मचारी उन्हें पढ़ने, सुनने, उनका अनुवाद और विश्लेषण करने का काम करते हैं. बाद में उन्हें अमेरिकी विदेश, वित्त या रक्षा मंत्रालय अथवा सीआईए, एफबीआई जैसी गुप्तचर संस्थाओं या राष्ट्रपति के अधीनस्थ राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पास भेज दिया जाता है. ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ का कहना है कि राष्ट्रपति ओबामा को पांच वर्षों तक पता नहीं था कि विदेशी राजनेताओं की भी जासूसी की जा रही है. न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, वॉशिंगटन में भारत, फ्रांस, जापान, इटली, यूनान, मेक्सिको आिद 38 देशों के दूतावास और ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ का मुख्यालय भी ‘एनएसए’ की जासूसी के शिकार हैं. जिन देशों की जासूसी में अमेरिका को सबसे अधिक रुचि है, उनमें भारत को पांचवें नंबर पर बताया जा रहा है.

जासूसी का भूत
इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका और ब्रिटेन के सिर पर विश्वव्यापी जासूसी का भूत सवार है. दोनों देश इस पर अंधाधुंध पैसा बहा रहे हैं. लेकिन, सच यह भी है कि दुनिया के सभी देश एक-दूसरे की जासूसी करते हैं. दरअसल सब ही राजनीतिक, औद्योगिक या आतंकवादी आशंकाओं से पीड़ित हैं और जानना चाहते हैं कि कौन कितने पानी में है. जहां तक आतंकवाद से लड़ने की बात है तो ‘एनएसए’ के प्रमुख कीथ अलेक्जैंडर ने अमेरिका की एक संसदीय जांच समिति से अक्टूबर में कहा कि उनकी संस्था की सक्रियता का ही फल है कि सितंबर 2001 के बाद से अमेरिका में कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई है. उनकी संस्था द्वारा दी गई जानकारियां दूसरे देशों में तीन दर्जन इस्लामी आतंकवादी हमलों को विफल बनाने में काम आईं. जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के प्रमुख ने भी सितंबर में स्वीकार किया था कि अमेरिका से मिली सूचनाओं के आधार पर जर्मनी में कम से कम आठ आतंकवादी हमलों को समय रहते विफल कर दिया गया.भारत को भी इस तरह की सूचनाएं मिलती रही हैं. भारतीय अधिकारियों को  तो अमेरिका में प्रशिक्षण भी मिलता है.

इसी तरह, सच्चाई यह भी है कि जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोप के जो देश आज अमेरिका और ब्रिटेन की असीमित जासूसी पर भौंहें टेढ़ी कर रहे हैं वे कल तक एक दूसरा ही राग अलाप रहे थे. वे खुद भी दूध के धुले नहीं हैं. विश्वव्यापी जासूसी के गोरखधंधे में वे भी अमेरिका और ब्रिटेन के घनिष्ठ सहयोगी रहे हैं, और अब भी हैं.

इसीलिए, ब्रिटेन व अमेरिका को नीचा दिखाने वाले एडवर्ड स्नोडन के जयजयकारी इस बीच खुद भी सकते में आ गए हैं. स्नोडन के दस्तावेजों से उनकी अपनी सरकारों की करतूतों का भी कच्चा चिट्ठा खुल गया है. इन दस्तावेजों के आधार पर ‘गार्डियन’ ने नवंबर की शुरुआत  में उजागर किया कि ग्लासफाइबर वाले केबलों में सेंध लगा कर टेलीफोन और इंटरनेट दूरसंचार पर जो निगरानी रखी जाती है, उसकी तकनीकी विधि ब्रिटेन के ‘जीसीएचक्यू’ ने जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और स्वीडन की गुप्तचर सेवाओं के सहयोग से तैयार की है. ‘जीसीएचक्यू’ ने इन देशों की गुप्तचर सेवाओं को बताया कि वे संचार लाइनों की निगरानी संबंधी अपने देशों के कड़े नियमों की काट किस तरह निकाल सकती हैं. जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के बारे में ‘जीसीएचक्यू’ की टिप्पणी थी, ‘जर्मनी के निगरानी नियमों को बदलने या उनकी नई व्याख्या करने के बीएनडी प्रयासों में हमने उसे मदद दी.’

स्नोडन से मिले दस्तावेजों के आधार पर अमेरिकी पत्र ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने लिखा कि स्पेन और फ्रांस के नागरिकों के टेलीफोन उनकी अपनी ही गुप्तचर सेवाएं सुनती और ‘एनएसए’ को दिया करती थीं. यही बात ‘एनएसए’ के प्रमुख कीथ अलेक्जैंडर ने भी अमेरिका की संसदीय जांच समिति के सामने कही थी. उन्होंने कहा था कि ‘ये सूचनाएं हमने और हमारे सभी नाटो-मित्रों ने हम सभी देशों की सुरक्षा और सैनिक कार्रवाइयों में मदद के लिए जुटाईं.’  अलेक्जैंडर ने इस सुनवाई में यह भी कहा कि यूरोपीय देश भी अमेरिका में जासूसी करते हैं.

हैकिंग का कानूनी अधिकार
नवंबर के आरंभ में ‘गार्डियन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटिश ‘जीसीएचक्यू’ की नजर में फ्रांस की गुप्तचर सेवा ‘डीजीएसई’ भी सहयोग एवं आदान-प्रदान के लिए भारी तत्परता’ दिखाती है. जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के बारे में पहले से ही पता था कि उसके पास जर्मनी के भीतर इंटरनेट संचार के प्रमुख केंद्रों में घुसपैठ करने की कानूनी सुविधा है. उसे कानूनी अधिकार है कि वह विदेशों के साथ 20 प्रतिशत दूरसंचार की जांच-परख किया करे. कौन जान सकता है कि जांच-परख के नाम पर बीनएडी के भेदिये कब क्या कर रहे हैं और वे 20 प्रतिशत तक ही सीमित रहते हैं या इससे आगे भी जाते हैं.

जर्मन पत्रिका ‘डेयर श्पीगल’ ने जुलाई में रहस्योद्घाटन किया था कि जर्मनी की गुप्तचर सेवाएं अमेरिका की ‘एनएसए’ के जासूसी तौर-तरीकों और साधनों की सबसे उत्साही अनुगामी हैं. ‘एनएसए’ के अधिकारी बीएनडी को अपना अहम सहयोगी मानते रहे हैं. अमेरिकी सरकार जर्मनी के साथ जासूसी सहयोग को बढ़ाने में भारी दिलचस्पी रखती है. इसीलिए उसने जर्मनी की घरेलू गुप्तचर सेवा ‘संघीय संविधान सुरक्षा कार्यालय’को ‘एक्सकीस्कोर’ जैसा आधुनिक सॉफ्टवेयर तक दिया, जिससे कंप्यूटर हार्ड डिस्क जैसे कई प्रकार के डेटा-धारकों का तेजी से अध्ययन किया जा सकता है. ‘एनएसए’ के जनवरी 2013 के एक दस्तावेज में जर्मन सरकार की इस बात के लिए सराहना की गई है कि उसने ‘जी-10 कहलाने वाले कानून की व्याख्या में संशोधन किया है, ताकि गोपनीय किस्म की सूचनाएं अपने विदेशी सहयोगियों को भी देना बीएनडी के लिए आसान हो जाए.’

शिकार ही शिकारी भी
यानी यूरोप के जो देश अपने आप को अमेरिका और ब्रिटने के जासूसी हमले का शिकार बता कर आज विलाप कर रहे हैं, वे स्वयं भी कुछ कम शिकारी नहीं रहे हैं. यूरोप के लगभग सभी देशों के सभी नागरिक जानते हैं कि उनकी अपनी ही लोकतांत्रिक सरकारें हजार तरह से उनकी रग-रग पर नजर रखे हुए हैं. अब अमेरिका और ब्रिटेन भी यदि उन पर नजर रखने लगे हैं तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?  इसी वजह से जनसाधारण के स्तर पर वैसी कोई खलबली नहीं दिखाई पड़ती, जैसी राजनीतिक मंचों पर हो रही नौटंकी में दिखाई पड़ती है. लोग यह भी कहते हैं कि इस सारी जासूसी से डरे वह जो कोई गलत काम कर रहा है. जो साफ-सुथरा है, वह भला हाय-तौबा क्यों मचाए?

जनता जितनी शांत है, नेता उतने ही अशांत हैं. अमेरिका की मुखर आलोचक जर्मनी की पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी कुछ ज्यादा ही अशांत है. उसके एक सांसद हान्स क्रिस्टियान श्ट्रौएबले एक टेलीविजन पत्रकार के साथ अक्टूबर के अंत में गुपचुप अचानक मॉस्को पहुंच गए. 31 अक्टूबर को वे एडवर्ड स्नोडन से मिले और उसी शाम बर्लिन वापस लौट कर घोषणा की कि यदि स्नोडन को किसी तरह की आंच नहीं पहुंचे, तो ‘वह बर्लिन आने या मॉस्को में ही प्रश्नों के जवाब देने के लिए तैयार है.’ श्ट्रौएबले ने जर्मन सरकार के नाम स्नोडन का लिखा एक पत्र भी दिखाया, जिस में उसने जर्मनी से बातचीत करने के प्रति सहमति जताई है.

जर्मन सरकार धर्मसंकट में
जर्मनी में अमेरिकी जासूसी के आयाम और खुद जर्मन गुप्तचर सेवाओं की भूमिका का पता लगाने के लिए एक संसदीय जांच समिति गठित करने की बात चल रही थी. श्ट्रौएबले शायद सोच रहे थे कि वे मॉस्को में स्नोडन से अपनी गुप्त मुलाकात के माध्यम से इस जांच का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं. लेकिन हो इसका उल्टा रहा है. जर्मन सरकार धर्मसंकट में पड़ गई है. वह एक ऐसे व्यक्ति से बात कैसे करे जिसने जर्मनी के परम मित्र अमेरिका के साथ विश्वासघात किया है? जिसके नाम अमेरिका ने गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण का विधिवत आवेदन किया है? और, जिसने  अब तक की गोपनीयताओं पर से पर्दा उठा कर स्वयं जर्मन गुप्तचर सेवाओं के मुंह पर भी कालिख पोती है?

स्नोडन की अमेरिकी नागरिकता छिन गई है. उसके पास कोई पासपोर्ट नहीं है. उसे रूस में इस शर्त पर शरण मिली है (और वह भी एक साल के लिए) कि रूसी भूमि छोड़ते ही उस की शरण निरस्त हो जाएगी. ऐसे में उस का जर्मनी आना तभी संभव है, जब जर्मनी या उसकी पसंद का कोई दूसरा देश उसे शरण दे और अमेरिका से पंगा मोल ले. कौन करेगा यह सब?  1948 में रूसी नाकेबंदी से घिरे उस समय के पश्चिमी बर्लिन की रक्षा से लेकर 1990 में विभाजित जर्मनी का एकीकरण संभव बनाने तक अमेरिका के जर्मनी पर इतने सारे उपकार हैं कि वह तो अमेरिका को ललकारने की सोच भी नहीं सकता. और वह ऐसा करे तो विश्व महाशक्ति अमेरिका भी उसके कान ऐंठने का साहस दिखा सकता है.

जर्मन सरकार के नाम अपने पत्र में स्नोडन ने लिखा है, ‘सच बोलना कोई अपराध तो नहीं है.’ उसने गंभीरता से नहीं सोचा कि सच बोलना अपराध तो नहीं है, पर आफत को न्यौता देना तो हो ही सकता है. एक ऐसा सच, जिससे देशद्रोह और विश्वासघात की गंध आती हो, उसे सम्मान दे कर अपने यहां भी उसके अनुकरण का जोखिम उठाना भला कौन-सा देश चाहेगा? स्नोडन ने भारत से भी शरण मांगी थी. शायद इसीलिए भारत ने भी कान में तेल डाल लिया. हर देश के पास जासूसी संस्थाएं हैं. हर देश अपने जासूसों से यही अपेक्षा रखता है कि वे संखिया जहर खा लेंगे, पर मुंह नहीं खोलेंगे.

(लेखक जर्मन रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी सेवा के प्रमुख रह चुके हैं) 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here