जांच की आंच

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सवालों के घेरे में अजीत जोगी (ऊपर ) और उनके करीबी माने जाने वाले नेता कवासी लखमा (नीचे ) पर घटना के बाद से ही आरोप लग रहे हैं.

झीरम घाटी हत्याकांड की पड़ताल कर रही एनआईए ने अभी किसी राजनेता को क्लीन चिट नहीं दी है. आठ माओवादियों को गिरफ्तार करने और 27 के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने के साथ एजेंसी की जांच अभी जारी है.

एनआईए ने पिछले एक साल में अब तक की अपनी इंवेस्टिगेशन के दौरान पाया है कि झीरम घाटी हत्याकांड में 100 माओवादी शामिल थे. इनमें नक्सलियों के शीर्षस्थ नेताओं के नाम भी शामिल हैं.  एजेंसी ने हमले में शामिल नक्सलियों को पकड़ने का काम पुलिस अधीक्षकों को दिया है. इन्हें नक्सलियों के नाम, पते, पोजीशन समेत कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं. लेकिन बावजूद इसके एजेंसी अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है कि इस हृदयविदारक हत्याकांड में राजनीतिक संलिप्तता थी या नहीं. एनआईए के आईजी संजीव सिंह तहलका को जानकारी देते हैं, ‘जिस दिन जांच समाप्त हो जाएगी हम कोर्ट में चार्जशीट फाइल कर देंगे. स्थानीय मीडिया में एनआईए द्वारा गृहमंत्रालय को रिपोर्ट सौंपने वाली जो भी बातें चल रही हैं वे सब गलत हैं. न हमने कोई रिपोर्ट सौंपी है न ही भविष्य में हमें कोई रिपोर्ट किसी को देनी है. हम सीधे चार्जशीट फाइल करेंगे.’ मीडिया में आई इन खबरों कि जांच में राजनीतिक साजिश की संभावना को एनआईए ने खारिज कर दिया है, पर बात बढ़ाते हुए संजीव कहते हैं, ‘फिलहाल हमने किसी स्थिति से इंकार नहीं किया है. कई बिंदुओं पर जांच होना अभी बाकी है.’

आने वाले दिनों में इस घटना के चश्मदीद रहे कुछ कांग्रेसी नेताओं के बयान एनआईए के सामने होने हैं. वीसी शुक्ल के प्रवक्ता रहे दौलत रोहड़ा भी इन गवाहों में शामिल हैं. वे बताते हैं, ‘ मुझे 26 जून, 2013 को एनआईए की तरफ से फोन आया था कि मेरी गवाही ली जानी है, लेकिन उसके बाद बयान के लिए कोई बुलावा नहीं आया.’

इस घटना को राजनीतिक साजिश बताने वालों में सबसे मुखर स्वर महेंद्र कर्मा के पुत्र दीपक कर्मा और नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश पटेल के रहे हैं. दीपक कहते हैं कि उन्होंने इस संबंध में एनआईए को कुछ दस्तावेज भी सौंपे हैं. कर्मा घटना की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से फोन पर बात कर मदद करने का आग्रह किया है.

इस पूरे मामले पर गौर करने लायक एक बात यह भी है कि राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिर तक चुप्पी साधे रखी थी. अब केंद्र में भाजपा सरकार आते ही

एजेंसी का जिन्न बोतल से बाहर निकलकर राज्य की राजनीति में हलचल मचाने लगा है. ऐसे में एनआईए की आगे की जांच में कुछ बड़े नेताओं के नाम आते हैं तो कमोबेश शांत रहने वाली छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल जैसे हालात बन जाएंगे.

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