शरद पवार: जहां पावर वहां पवार

चुनावी रणनीति पवार साथ-साथ

पवार और विवाद

शरद पवार का नाम अक्सर ही विवादों में रहता है. टूजी घोटाला, स्टाम्प पेपर घोटाला, कृष्णा घाटी विकास निगम में हुआ भ्रष्टाचार, आईपीएल विवाद, पुणे में हुआ जमीन घोटाला इन सबमें किसी न किसी रूप में पवार का नाम जरूर आया है. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुधाकर राव नाईक ने पवार पर आरोप लगाया था कि पवार ने उन्हें उल्हासनगर के मशहूर अपराधी और नेता पप्पू कालानी के साथ सख्ती से न पेश आने की हिदायत दी थी. गौरतलब है कि कालानी कांग्रेस के टिकट पर दो बार चुनाव जीत चुका है. पवार के ऊपर दाऊद इब्राहिम से संबंध होने के भी आरोप लग चुके हैं.

शरद पवार और राकांपा

शरद पवार के निकटतम सिपहसालारों में से एक रह चुके संजय खोड़के कहते हैं, ‘शरद पवार बहुत ही अनुशासित जीवन जीते हैं. वह सुबह छह-साढ़े छह बजे तक उठ जाते हैं और आठ बजे से उनका लोगों से मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है जो रात साढ़े नौ बजे तक चलता रहता है. यह उनकी रोज की दिनचर्या है, जो चुनाव के वक्त भी ऐसी ही रहती है, बस उनके काम करने की अवधि 15 घंटे तक पहुंच जाती है.’ खोड़के आगे बताते हैं, ‘वह समय के बहुत पाबंद हैं. यदि उन्होंने किसी कार्यकर्ता को समय दिया है, तो उस दौरान कोई बड़ा नेता भी आ जाए, तो भी वह कार्यकर्ता को दिए हुए समय तक उसके साथ ही चर्चा करते हैं.’

खोड़के के मुताबिक, खेती-बाड़ी, शिक्षा, व्यापार, उद्योग- कोई भी क्षेत्र हो, उनकी जानकारी बेमिसाल होती है. उनकी एक खास बात यह है कि वह यदि किसी व्यक्ति से कुछ पांच मिनट भी चर्चा कर लेते हैं, तो उसका नाम कभी नहीं भूलते. अगली बार मिलने पर वह उसे उसके नाम से ही संबोधित करते हैं. खोड़के बताते हैं, ‘चुनावी रणनीति अलग चीज है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर वह सभी को साथ लेकर चलते हैं. पवार साहब की सबसे खास बात यह है कि वह किसी कठिनाई से विचलित नहीं होते और संयम बरतते हैं.’

राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश पवार कहते हैं, ‘शरद पवार को राजनीति का चाणक्य कहा जाता है. वह दो तरीके से काम करते हैं. एक तरीका है सामाजिक बदलाव लाना जैसे महिलाओं के लिए आरक्षण लाना, अन्य पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण की पैरवी करना. लेकिन दूसरा तरीका है राजनीतिक सेंधमारी करना, दूसरे दलों के लोगों को अपने दल में ले आना, सत्ता के लिए जोड़-तोड़ करना आदि.’

पवार के साथ 20 वर्षों तक काम कर चुके खोड़के कहते हैं, ‘उन्होंने चुनाव के वक्त बहुत मेहनत की थी, लेकिन उन्होंने जिन पर भरोसा किया, वे खरे नहीं उतर सके. विधानसभा चुनाव में पार्टी जरूर हार गई है, लेकिन पवार साहब का कद कभी कम नहीं हो सकता. उनका कद राजनीति की हार-जीत के ऊपर निकल चुका है.’

हालांकि मराठी अखबार ‘दिव्य मराठी’ के मुख्य संपादक कुमार केतकर की इस बारे में राय कुछ अलग है. तहलका से बात करते हुए वह कहते हैं,  ‘राजनीति में शरद पवार और उनकी पार्टी दोनों का कद कम हुआ है. उन्होंने भले ही कांग्रेस से गठबंधन कर रखा हो, लेकिन उनका मन कभी कांग्रेस के साथ नहीं था. वह शुरू से ही गांधी परिवार के विरोधी थे. सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए वह कांग्रेस के साथ थे, वरना कांग्रेस का साथ वह 2009 में ही छोड़ रहे थे जब कांग्रेस के जीतने में शुबहा था. लेकिन जब कांग्रेस की 206 सीटें आईं, तो वह कांग्रेस के साथ हो लिए.’

राजनीति में शरद पवार और उनकी पार्टी दोनों का कद कम हुआ है. उन्होंने भले ही कांग्रेस से गठबंधन कर रखा हो, लेकिन मन कभी कांग्रेस के साथ नहीं था

केतकर के मुताबिक, ‘जब 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हारी, तभी से पवार भाजपा के संपर्क में थे. विधानसभा चुनावों के पहले ही उनके और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बीच समझौता हो गया था, जिसके अनुसार अगर भाजपा विधानसभा चुनाव अकेली लड़ेगी तो राकांपा भी चुनाव अकेली लड़ेगी. इसीलिए जैसे ही भाजपा ने शिवसेना से गठबंधन तोड़ा, राकांपा ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया और चुनाव के बाद भाजपा को बाहर से समर्थन का एलान कर दिया था. पवार हमेशा सत्ता में रहना चाहते हैं. उनकी वफादारी विचारधारा से नहीं, बल्कि सत्ता से है.’

प्रकाश भी मानते हैं कि उनके दल का प्रभाव घट रहा है. प्रकाश कहते हैं, ‘महाराष्ट्र में राकांपा का प्रभाव कम होता जा रहा है. राष्ट्रवादी कांग्रेस एक सामंतवादी पार्टी है. यह आम जनता से जुड़ी पार्टी नहीं है. यहां एक व्यक्ति की इच्छा के अनुसार काम होता है, न कि लोगों की इच्छा के मुताबिक. यह पार्टी यशवंतराव चव्हाण के मॉडल को माननेवाली पार्टी के रूप में स्थापित हुई थी, लेकिन यह लोग उनको भुला चुके हैं और बिना किसी नीति के काम करते हैं.’

प्रकाश के मुताबिक, ‘पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा के क्षेत्रों में भी पार्टी का प्रभाव कम हुआ है. रही बात खानदेश, विदर्भ और कोंकण की, तो पार्टी का वहां पर पहले भी इतना प्रभुत्व नहीं था. अगर भाजपा-शिवसेना की सरकार ने आनेवाले पांच साल में अच्छा काम कर दिखाया, तो राकांपा के अस्तित्व पर संकट आ सकता है.’

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