…जमाना है पीछे

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2006 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करते ही खुशबू को अपने बेहतरीन प्रदर्शन के चलते एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला. इसे स्वीकार करके वे दिल्ली आ गईं. बहुराष्ट्रीय कंपनी की चमक-दमक और मोटी पगार वाली नौकरी भी उनको ज्यादा दिनों तक बांध न सकी और तीन महीने बाद ही वे इसे छोड़ इसरो से जुड़ गईं. हालांकि इसरो में उन्हें अपनी पहली नौकरी की तुलना में काफी कम वेतन मिलना था. खुशबू बताती हैं, ‘पैसों के लिए मैं इसरो का प्रस्ताव ठुकराने की सोच भी नहीं सकती थी. देश के लिए कुछ करना था और इसके लिए इसरो के साथ जुड़ने से अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता था. कई लोगों को तो लगता था कि मैं चांद पर गई थी. ’

खुशबू भले ही चांद पर न गई हों लेकिन उन्होंने चांद की ऊंचाई जरूर हासिल कर ली है. आज वे कई लड़कियों के लिए आदर्श बन चुकी हैं. वे बतौर इंजीनियर इसरो में अपनी पहली पदोन्नति भी प्राप्त कर चुकी हैं. खुशबू कई कॉलेजों और संस्थाओं के छात्रों को संबोधित करके उन्हें इंजीनियरिंग के क्षेत्र में संभावनाओं की जानकारी और प्रेरणा देती रही हैं.

खुशबू का मानना है कि असंभव कुछ भी नहीं होता और यदि एक बार कुछ करने की ठान लो तो फिर धर्म, जाति, शहर, माहौल जैसी कोई भी चीज इंसान का रास्ता नहीं रोक सकती. उनकी कथनी ही नहीं, करनी ने भी यह साबित किया है.

होम पेज: महिला विशेषांक

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