छत्तीसगढ़: संकट में उद्योग

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ऐसे में स्पॉन्ज आयरन से बनने वाले उत्पाद में प्रति मीट्रिक टन तकरीबन 28 हजार 700 रुपया खर्च होता है. अब मिनी स्टील प्लांटों के सामने संकट ये है कि रोलिंग मिलों में लगने वाले इंगट की कीमत फिलहाल 26 हजार 700 रुपए प्रति मीट्रिक टन है. वहीं तैयार माल 31000 रुपए (प्रति मीट्रिक टन) की कीमत में बाजार में उपलब्ध है. बाजार में तय कीमतों के कारण मिनी स्टील प्लाटों को लागत से कम मूल्य पर माल बाजार को देना पड़ रहा है. दरअसल असल मुद्दा बड़े और छोटे उद्योगों की खींचतान का भी है. अधिकांश बड़े स्टील प्लांटों के पास खुद की आयरन ओर खदानें और पॉवर प्लांट हैं. ऐसे में उन्हें उत्पाद तैयार करने में अपेक्षाकृत कम लागत आती है. लेकिन मिनी स्टील प्लाटों को कच्चे माल और बिजली के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में मिनी स्टील प्लांट बाजार में बड़े उद्योगों का सामना नहीं कर पा रहे हैं. यही कारण है कि 2007 से 2013 तक करीब 85 मिनी स्टील प्लांट पूरी तरह बंद हो चुके हैं.

अब इस पूरे मामले में राज्य सरकार का नज़रिया बिलकुल अलग है. पहले बिजली की बात करें तो छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक सुबोध सिंह कहते हैं, ‘ एमएसपी (मिनी स्टील प्लांट) को हम दूसरे राज्यों की तुलना में सस्ती बिजली दे रहे हैं. अव्वल तो सिंह मानते ही नहीं कि एमएसपी हड़ताल पर हैं. वे कहते हैं कि जाकर देख लीजिए..कई प्लांट चल रहे हैं. सुबोध सिंह कहते हैं कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के असर के कारण मिनी स्टील प्लांटों को घाटा हो रहा है और उसका दोष विद्युत मंडल के सर मढ़ा जा रहा है. विशेष राहत पैकेज की मांग पर सिंह तर्क देते हैं कि राज्य सरकार अपनी तरफ से पहले से ही उन्हें राहत दे रही है. सरकार ने मिनी स्टील प्लांट पर लगने वाले 8 प्रतिशत विद्युत शुल्क घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है. उद्योगों के आग्रह पर ही सरकार ने विद्युत की दरें नहीं बढ़ाई हैं. सिंह सवाल करते हैं कि हम इससे ज्यादा और क्या राहत दे सकते हैं.’

[box]बाजार में तय कीमतों के कारण मिनी स्टील प्लाटों को लागत से कम मूल्य पर माल बाजार को देना पड़ रहा है. दरअसल असल मुद्दा बड़े और छोटे उद्योगों की खींचतान का भी है.[/box]

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सत्यनारायण शर्मा कहते हैं, ‘मिनी स्टील प्लांट की मांगे जायज हैं. छत्तीसगढ़ सरकार सरप्लस बिजली का दावा करती है तो ऐसे में छोटे उद्योगों की मांग पर बिजली की दरें कम क्यों नहीं कर सकती. वे आगे कहते हैं कि इन उद्योंगों से ढाई लाख लोगों का रोजगार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुडा हुआ है. साथ ही मिनी स्टील प्लांट ही विद्युत मंडल के सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं. जो बिजली के बिल के रूप में लाखों रुपए चुकाकर सरकार का राजस्व बढ़ा रहे हैं. शर्मा आरोप लगाते हैं कि ऊर्जा और खनिज दोनों ही महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री रमन सिंह के पास हैं. ऐसे में उन्हें उद्योगपतियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.’

छत्तीसगढ़ में उद्योगपतियों पर लगने वाला डिमांड चार्ज की देश के दूसरे राज्यों से तुलना करें तो ये ज्यादा नज़र आता है. केवल एक मध्य प्रदेश को छोड़ दें (मप्र में भी ज्यादा डिमांड चार्ज वसूला जा रहा है. 380 रुपए प्रति केवीए) तो हरियाणा में 130 रुपए मांग प्रभार लिया जाता है तो ओडिशा में 250 रुपए डिमांड चार्ज लिया जा रहा है. आंध्रप्रदेश में 350, गुजरात में 270 और महाराष्ट्र में 190 रुपए प्रति केवीए डिमांड चार्ज वसूला जाता है. लेकिन इन राज्यों में बिजली की दर प्रति यूनिट महंगी है. मसलन हरियाणा में मिनी स्टील प्लांटों से 4.60 रुपए प्रति यूनिट बिजली बिल वसूला जाता है. डिमांड चार्ज जुड़ने के बाद ये 5.11 रुपए प्रति यूनिट हो जाता है. यही हाल दूसरे राज्यों का भी है. दरअसल सरकार एक और तो अन्य राज्यों की तुलना में सस्ती बिजली देने का दावा करती है लेकिन डिमांड चार्ज ज्यादा लगाती है.

छत्तीसगढ़ सरकार के ऊर्जा सचिव अमन कुमार कहते हैं, ‘राज्य सरकार हर स्तर पर उद्योगों को राहत देने का काम कर रही है. चाहे बिजली की बात हो या स्पॉन्ज आयरन की. एनएमडीसी से मिनी स्टील प्लांटों को सस्ता स्पाँज आयरन मिल सके, इसके लिए खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह कई बार केंद्रीय इस्पात मंत्रालय को पत्र लिख चुके हैं. इसमें राज्य की भूमिका बेहद सीमित है. हम सिवाए केंद्र सरकार से गुहार लगाने के और कुछ नहीं कर सकते.’ अब स्थानीय उद्योगपतियों और सरकार की खींचतान में नुकसान आखिरकार प्रदेश का ही हो रहा है. तेजी से औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरते छत्तीसगढ़ के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं. वो भी ऐसे समय जब राज्य सरकार देश-विदेश के बड़े उद्योगपतियों को प्रदेश में निवेश के लिए बार-बार न्यौता भेज रही हो.

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