चैनल और आपदा

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लेकिन एक बार जब न्यूज चैनल उत्तराखंड आपदा की कवरेज में उतरे तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया. चैनलों में अधिक से अधिक रिपोर्टिंग टीम भेजने और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में सबसे पहले पहुंचने का दावा करने की होड़-सी लग गई. चैनलों के जाने-पहचाने स्टार एंकरों/रिपोर्टरों के अलावा दर्जनों रिपोर्टर/कैमरामैन आपदाग्रस्त इलाकों में ओबी वैन के साथ उतर गए. कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था. जल्दी ही बचाव में लगे वायु सेना और राज्य सरकार के हेलिकॉप्टर्स पर चढ़कर आपदाग्रस्त इलाकों तक पहुंचने और राहत व बचाव की ‘एक्सक्लूसिव’ कवरेज दिखाने की होड़ में स्टार रिपोर्टरों की हैरान-हांफती-उत्तेजनापूर्ण रिपोर्टें चैनलों पर छा गईं. पीपली लाइव से हालात बन गए.

यह और बात है कि उत्तराखंड और वहां के भूगोल-पारिस्थितिकी से अनजान रिपोर्टर उसकी भरपाई नाटकीयता और तबाही के विजुअल्स से करते नजर आए. हद तो यह कि कई चैनल केदारनाथ की तबाही के बीच मंदिर के बचे रहने के चमत्कार से अभिभूत दिखे. उधर, ‘विकास’ की चिंता में हमेशा दुबले और पर्यावरणवादियों को ‘विकास’ के दुश्मन बताने वाले चैनलों के संपादक-एंकरों को इलहाम हुआ कि उत्तराखंड में बेलगाम और विनाशकारी ‘विकास’ के कारण ही यह प्राकृतिक आपदा वास्तव में, मानव-निर्मित आपदा है. चैनलों पर अचानक पर्यावरणवादियों की पूछ बढ़ गई. हिमालय में मौजूदा अनियंत्रित ‘विकास’ के मॉडल पर तीखे सवालों के बीच चैनलों के स्टूडियो गर्म हो गए.

लेकिन जल्दी ही यह गुस्सा मोदी बनाम राहुल और कांग्रेस-बीजेपी की तू-तू-मैं-मैं में स्खलित हो गया. यह संकेत है कि कुछ ही दिनों में उत्तराखंड की त्रासदी चैनलों की सुर्खियों से उतर जाएगी. आपदा भुलाई जाने लगेगी. स्टार एंकर/रिपोर्टर दिल्ली लौट आएंगे. हिमालय की कराह पीछे छूट जाएगी. चैनलों पर फिर से ‘विकास’ का अहर्निश कोरस शुरू हो जाएगा. जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. लेकिन क्या मानव निर्मित आपदा की शुरुआत यहीं से नहीं होती है?

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