चुनावी रण के समीकरण

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मगर भाजपा की मानें तो यह सारी जोड़तोड़ लीड के अंतर को तो कम कर सकती है, लेकिन कांग्रेस की तयशुदा हार को नहीं बदल सकती. भाजपा प्रवक्ता प्रकाश सुमन ध्यानी कहते हैं,‘ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद कांग्रेस है. वह पहले अपनी अंतर्कलह से ही निपट ले. उत्तराखंड का इतिहास राष्ट्रीय धारा में बहने का रहा है. समूचे राष्ट्र में मोदी लहर चल रही है. इस आंधी से कांग्रेस को कोई नहीं बचा सकता.’

साफ है कि इन चुनाव को भाजपा मोदी लहर पर केंद्रित कर देना चाहती है. मगर मोदी लहर के असर को कांग्रेस मानने को तैयार नहीं. मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं,‘उत्तराखंड में सिर्फ विकास की लहर है. जनता तरक्की चाहती है. सुनियोजित तरीके से जनता का ध्यान मुद्दों से हटाकर व्यक्ति विशेष पर केंद्रित करने की नाकाम कोशिश हो रही है.’

दो चिर प्रतिद्वंदी दलों के बीच सिमटी इस चुनावी जंग में तीसरे विकल्प के तौर पर आम आदमी पार्टी, यूकेडी व वामपंथियों का साझा मोर्चा अपनी-अपनी सामर्थ्य के हिसाब से मैदान में है. मगर उनसे दिल्ली सरीखे करिश्मे की उम्मीद नहीं की जा सकती. मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है और हर सीट पर दोनों दलों की अलग-अलग चुनौतियां हैं. नेतृत्व परिवर्तन के बाद विजय बहुगुणा और हरीश रावत की भूमिकाएं बदल जाने के बाद इसका असर टिहरी सीट पर पड़ सकता है. जहां खड़े होकर रावत कभी बहुगुणा पर निशाने साधते थे, वहां आज बहुगुणा हैं.  रावत चाहते थे कि टिहरी सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा चुनाव लड़ें, लेकिन बहुगुणा ने पत्नी की बीमारी का बहाना बना दिया. वे अपने बेटे साकेत के लिए टिकट के जुगाड़ में लगे रहे. बेटे का टिकट फाइनल होने के बाद बहुगुणा देहरादून में डेरा डाल चुके हैं. उपचुनाव में हार के बाद साकेत टिहरी सीट पर खासे सक्रिय रहे हैं, लेकिन सत्ता से पिता की विदाई के बाद उनके लिए टिहरी का समर आसान नहीं रह गया है जहां भाजपा ने शाही परिवार की माला राज्यलक्ष्मी शाह को फिर से मैदान में उतारा है.

तीर्थनगरी हरिद्वार में मुख्यमंत्री की पत्नी रेणुका और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के मैदान में होने से हरिद्वार हॉट सीट बन गई है. निशंक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. वे कहते हैं,‘मैंने क्षेत्र में काम किया है. मुस्लिम समुदाय में भी मुझे समर्थन मिल रहा है. मेरे पक्ष में लहर नहीं जुनून है.’

मगर हरिद्वार के चुनावी समीकरण काफी उलझे हुए हैं. इस सीट पर मुस्लिम व दलित वोटों की तादाद 35 फीसदी से भी अधिक है. इस वोट बैंक पर बसपा की नजर है. बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी हाजी इस्लाम को उतारा है. बसपा जितना बेहतर प्रदर्शन करेगी, उसका सियासी नुकसान कांग्रेस को होगा. यही वजह है कि कांग्रेस का भी पूरा फोकस इसी वोट बैंक पर है. निशंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती भितरघात को ‘मैनेज’ करने की भी है. उनकी घेराबंदी के लिए कांग्रेस त्रिपाठी अयोग की जांच रिपोर्ट का जिन्न बोतल से बाहर निकाल सकती है. मुख्यमंत्री इसका संकेत कर चुके हैं. फिलहाल पार्टी में बहुचर्चित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले का ब्रहमास्त्र छोड़ने के सियासी नफे-नुकसान को लेकर मंथन चल रहा है.

नैनीताल और अल्मोड़ा (सुरक्षित) में भी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है. नैनीताल में कांग्रेस ने दो बार के सांसद केसी सिंह बाबा पर फिर से दांव खेला है. भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी उनके सामने हैं. अल्मोड़ा में भाजपा के अजय टम्टा और निवर्तमान सांसद प्रदीप टम्टा के बीच मुकाबला है. सारे क्षत्रपों के मैदान में होने से युद्ध में अकेले पड़े टम्टा मोदी लहर के सहारे चुनावी वैतरणी पार कर लेना चाहते हैं.

भाजपा की निगाह लोक सभा चुनाव के बाद के हालात पर भी लगी है. ये चुनाव सूबे में राजनीतिक आपदा की आहट भी दे रहे हैं. जानकारों का मानना है कि दिल्ली में तख्ता पलटा तो उसकी आंच उत्तराखंड पर आएगी. सहयोगियों के समर्थन पर टिकी रावत सरकार की यही सबसे बड़ी बेचैनी है.

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