चुनावी चुनौतियाँ

इंटरनेट मीडिया की इस जंग की कांग्रेस ने मज़बूत तैयारी करते हुए सोशल मीडिया के लिए बड़ा बजट रखा है। कांग्रेस का सोशल मीडिया सरल शब्दों में अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए फोटोग्राफर, कंटेंट राइटर से लेकर वीडियो एडिटर तक की मदद ले रहा है। कांग्रेस दूर-दराज के उन इलाकों में, जहाँ पहुँचना सम्भव नहीं, वहाँ सोशल मीडिया और इंटरनेट मीडिया के ज़रिये पहुँच रही है।

मणिपुर में अफ्सपा क़ानून बड़ा मुद्दा

मणिपुर में चुनावी पारा चढ़ रहा है। विकास की कहानियाँ नागालैंड की हिंसा के बाद अफ्सपा के बड़े विरोध के रूप में सामने आ रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह असम और नागालैंड के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर चुके हैं। नागालैंड सरकार का दावा है कि उसने राज्य से यह क़ानून हटाने के लिए एक समिति गठित कर दी है। उसकी सिफ़ारिशों के आधार पर सूबे से इस क़ानून को वापस लेने की बात सिरे चढ़ सकती है।

जहाँ तक चुनाव की बात है, 2017 में यहाँ जब विधानसभा के चुनाव हुए थे, भाजपा ने जनमत से कांग्रेस की 15 साल तक चली सत्ता छीन ली थी। मणिपुर सहित उत्तर-पूर्वी राज्यों के अधिकांश मुख्यमंत्री अफ्सपा को हटाने के हक़ में सामने आये हैं। कांग्रेस ने तो मणिपुर विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आने पर अफ्सपा को बिना देरी वापस लेकर पूर्ण रूप से हटाने के लिए केंद्र पर दबाव बनाने का वादा किया था।

मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष का कहना है कि उसने अपनी सत्ता के दौरान सात विधानसभा क्षेत्रों से यह क़ानून हटा दिया था। उन्होंने कहा- ”अगर कांग्रेस 2022 में सत्ता में वापस आती है, तो मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में पूरे मणिपुर से अफ्सपा को पूर्ण रूप से हटाने का फ़ैसला कर लिया जाएगा।’’

जहाँ तक भाजपा की बात है, उसने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा साल के आख़िर तक चार बार मणिपुर जा चुके हैं। कई रैलियाँ की हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भी राज्य की यात्रा की है। शाह ने कहा कि एन. बीरेन सिंह सरकार के तहत क़ानून और व्यवस्था की स्थिति, शिक्षा, बिजली और अन्य बुनियादी ढाँचों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भाजपा मणिपुर में इनर लाइन परमिट शुरू होने को भुनाने की कोशिश में भी है। वो वोटर को याद दिला रही है कि यह मणिपुर को पार्टी का सबसे बड़ा गिफ्ट है। बता दें इनर लाइन परमिट मणिपुर में कुछ समूहों की लम्बे समय से माँग रही है। यह वो दस्तावेज है, जिसमें अन्य राज्यों के भारतीय नागरिकों को सीमित अवधि के लिए संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने की इजाजत है।

साल 2017 में मणिपुर में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी थी। वैसे तो चुनाव में कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, भाजपा ने एनपीपी, एनपीएफ और लोक जनशक्ति पार्टी के सहयोग से सरकार बनायी थी। कांग्रेस के कई विधायक दलबदल कर चुके हैं। इसमें राज्य के पार्टी प्रमुख गोविंददास कोंथौजम भी शामिल हैं, जबकि पूर्व मंत्री और बिष्णुपुर से छ: बार के कांग्रेस विधायक गोविंददास कोंटौजम भाजपा में शामिल हो गये। हालाँकि अब भाजपा की गठबन्धन सहयोगी एनपीपी के साथ लड़ाई की जानकारियाँ बाहर आ रही हैं। कॉनराड संगमा की एनपीपी चार में से दो मंत्रियों को कैबिनेट से हटाये जाने से निराश हैं। अफ्सपा को वापस लेने की माँग करने वाले संगमा ने कहा- ”एनपीपी इस बार अकेले चुनाव में उतरेगी और मणिपुर में करीब 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।’’

कांग्रेस अभी भी जनता में जमी हुई है, जबकि भाजपा और नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) भी मैदान में जमे हुए हैं।

गोवा की तस्वीर नहीं साफ़

गोवा में विधानसभा चुनाव अन्य चार राज्यों के साथ ही होने हैं। वहाँ हाल के हफ्तों में ममता बनर्जी की टीएमसी अचानक काफ़ी सक्रिय हुई है। उधर भाजपा ने कहा था कि वह अकेले चुनाव लड़ेगी। जहाँ तक कांग्रेस की बात है उसके और गोवा फारवर्ड पार्टी के बीच चुनावी गठबन्धन हुआ है।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज़्यादा 17 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा को 13, अन्य को 10 सीटें मिली थीं। विधानसभा में कुल 40 सीटें हैं और बहुमत के लिए वहाँ 21 सीटों की ज़रूरत रहती है।

हाल में टीएमसी को तब बड़ा झटका लगा था, जब इसके पाँच सदस्यों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इन लोगों ने टीएमसी पर लोगों को बाँटने का आरोप लगाया था। उधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी मैदान में दम ठोक रही है। उसने हाल में कहा कि वह 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी।

गोवा में भाजपा की सरकार है और हाल में पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने राज्य का दौरा करके कांग्रेस सहित विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि उन्होंने कहा की पिछली सरकारों ने सत्ता को मेवा सझकर खाने का काम किया, जबकि भाजपा जनता की सेवा में भरोसा रखती है।

उधर, कांग्रेस भी चुनाव पूरी तैयारियाँ कर रही है। पार्टी नेता राहुल गाँधी दिसंबर में राज्य का दौरा कर चुके हैं। पार्टी वापस सत्ता में लौटने के लिए आतुर है।

पंजाब में पार्टियाँ चौकन्नी

पंजाब में एक अदालत में ब्लास्ट और गुरुद्वारे में बेअदबी के मामले और दो लोगों की पीट-पीटकर हत्या के मामले चुनाव में मुद्दा बन सकते हैं। किसानों के 22 संघ भी चुनाव में कूदने को उतावले हैं। दिसंबर का महीना किसान आन्दोलन के नज़रिये से कई रंग लेकर आया। मोदी सरकार के किसानों की माँगें मानने और कुछ को लेकर वादा करने पर संयुक्त किसान मोर्चा ने भरोसा किया और एक साल से अधिक समय से चल रहे अपने आन्दोलन को स्थगित कर दिया। निश्चित ही किसान आन्दोलन और किसानों की माँगों के लिए यह बड़ी घटना थी। लेकिन इसके बाद एक और बड़ी घटना यह हुई कि किसान आन्दोलन के बड़े अगुआ रहे गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने अपनी पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया। निश्चित ही पंजाब के विधानसभा चुनाव से पहले किसानों के एक प्रभावशाली गुट के खुलेतौर पर राजनीति में आने का असर पड़ेगा। यह माना जाता है कि पंजाब के गरम स्वभाव वाले सिख युवा चढ़ूनी को पसन्द करते हैं। ऐसे में यह माना जा सकता है कि यदि चुनाव तक चढ़ूनी अपना एक राजनीतिक ढाँचा खड़ा करने में कामयाब रहे, तो निश्चित ही वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहेंगे। हालाँकि यह भी सच है कि चढ़ूनी पंजाब की नहीं, हरियाणा की राजनीति में ज़्यादा सक्रिय रहे हैं।

किसान आन्दोलन की सारी लड़ाई चढ़ूनी ने हरियाणा में ही लड़ी और वह रहने वाले भी हरियाणा के कुरुक्षेत्र के ही हैं। वैसे इतिहास में चढ़ूनी आम आदमी पार्टी के नज़दीक रहे हैं और अभी भी माना जाता है कि उनके पार्टी बनाने में आम आदमी पार्टी की दिलचस्पी हो सकती है। अभी तक कांग्रेस, आप, अकाली दल, पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और भाजपा मैदान में थे। अब चढ़ूनी की पार्टी संयुक्त संघर्ष पार्टी की मैदान में आडटी है। अमरिंदर सिंह के अपनी पार्टी बनाने के बाद चढ़ूनी पंजाब की राजनीति के नये स्टार हैं। देखना है कि वह ख़ुद को कितना जमा पाते हैं। उनके लिए यह चुनौती बड़ी है और उन्हें चुनाव से पहले राजनीतिक ढाँचा खड़ा करना होगा, जो 117 विधानसभा सीटों वाले पंजाब में उतना आसान भी नहीं होगा। अब सवाल यह है कि क्या चढ़ूनी पंजाब की राजनीति में किसानों के नाम पर बड़ा ध्रुवीकरण कर पाएँगे? एक सीमा तक युवाओं को साथ जोडऩे में भले वह सफल हों; लेकिन चुनाव में जीतने के लिए बहुत चीजों की दरकार उन्हें रहेगी। नहीं भूलना चाहिए कि किसानों की लड़ाई लडऩे में सहयोग करने वाली पंजाब में कई ताक़तें रही हैं। राजनीतिक दलों की ही बात करें, तो कांग्रेस सबसे ज़्यादा खुले तौर पर किसानों के साथ रही। उसने किसान आन्दोलन के शुरू से ही ज़मीन पर समर्थन किया और भाजपा का मुखर विरोध कृषि क़ानूनों को लेकर किया।

आम आदमी पार्टी, जो पंजाब में चुनाव के लिए अभी से पूरी ताक़त झोंक रही है; ने भी किसानों के आन्दोलन का समर्थन किया। अकाली दल को लेकर ज़रूर यह आरोप लगता रहा है कि उसने बहुत देरी से तीन कृषि बिलों का विरोध किया, जबकि हरसिमरत कौर के रूप में अकाली दल सीधे मंत्रिमंडल में शामिल था। शुरू में कई ऐसे बयान आये, जिसमें अकाली दल अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने कृषि बिलों का लोकसभा समर्थन किया था।

जहाँ तक पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की बात है, तो कांग्रेस सरकार के नाते उन्होंने किसान आन्दोलन का समर्थन किया। चूँकि यह कांग्रेस की घोषित लाइन थी, उन्हें समर्थन करना ही था। हालाँकि जैसे ही कांग्रेस से उनके रिश्ते तल्ख़ हुए और मुख्यमंत्री पद खोना पड़ा। इसके बाद तो अमरिंदर सिंह सीधे मोदी सरकार और भाजपा के पाले में खड़े दिखे। उन्होंने कहा कि केंद्र तीन कृषि क़ानूनों को वापस ले ले, तो वह भाजपा को समर्थन देने को तैयार हैं। अब जबकि केंद्र सरकार ने तीन कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया है और कैप्टन ने इसका सारा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को दिया है, उससे कम-से-कम कैप्टन अमरिंदर सिंह तो इसका चुनावी लाभ लेने से वंचित रह गये। पंजाब में किसान आन्दोलन के कारण सबसे ज़्यादा नुक़सान का खतरा भाजपा ही झेल रही है। आज भी पंजाब में यदि किसी राजनीतिक पार्टी के नेता या कार्यकर्ता किसानों से सीधे समर्थन माँगने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, तो वे भाजपा के ही लोग हैं। भाजपा के नेता तो तीन कृषि क़ानून वापस लेने के अपनी ही केंद्र सरकार के फ़ैसले के बावजूद यह मानकर चल रहे हैं कि जनता से उसे ज़्यादा समर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जहाँ तक आम आदमी पार्टी (आप) की बात है, उसे भरोसा है कि उसे किसानों का विरोध तो किसी भी सूरत में नहीं झेलना पड़ेगा। कांग्रेस की तरह आप भी किसान आन्दोलन के साथ दिखती रही है। लेकिन अब किसान नेता चढ़ूनी के अपनी ही राजनीतिक पार्टी बना लेने से कांग्रेस और आप दोनों के खेमे इस बात से परेशान हैं कि किसान वोट बाँट सकते हैं। यहाँ यह बता देना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि गुरनाम सिंह चढ़ूनी 40 किसान संगठनों वाले संयुक्त किसान मोर्चा के सक्रिय सदस्य रहे हैं और किसान आन्दोलन के दौरान हरियाणा में अपने किसान संगठन हरियाणा भारतीय किसान यूनियन के ज़रिये काफ़ी सक्रिय रहे। चढ़ूनी की राजनीति चढ़ूनी ने जब अपनी राजनीतिक पार्टी संयुक्त संघर्ष पार्टी का ऐलान किया, तो उन्होंने कहा कि राजनीति में वह स्वच्छ और ईमानदार लोगों को आगे लाने के मक़सद से आये हैं और जनता की सेवा करना चाहते हैं। वैसे चढ़ूनी ख़ुद पंजाब विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे, न उनकी किसी राजनीतिक दल से गठबन्धन को लेकर कोई बात हुई है। हालाँकि चढ़ूनी ने यह ज़रूर कहा है कि उनकी पार्टी प्रदेश की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जो फ़िलहाल तो सम्भव नहीं दिखता।

अभी उनके किसी सम्भावित गठबन्धन की कोई चर्चा नहीं; लेकिन हैरानी नहीं होगी, यदि कांग्रेस या आप में से किसी एक के साथ उनका तालमेल बन जाए। भाजपा के साथ उनके जाने की सबसे कम सम्भावना दिखती है। हालाँकि यह बहुत दिलचस्प है कि राजनीति के कई जानकार यह जानते हुए कि चढ़ूनी के आने से सबसे ज़्यादा नुक़सान कांग्रेस और आप का होगा। क्योंकि उनके राजनीति में आने को भाजपा की राजनीति के हिसाब से मुफीद मानते हैं। चढ़ूनी युवाओं के अलावा पंजाब की जत्थेवंदियों में काफ़ी पैठ रखते हैं। हालाँकि इससे उनकी नवगठित पार्टी पंजाब में चुनाव जीत सकती है, यह सोचना फ़िलहाल तो अतिशयोक्ति ही होगी। देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह किसी दल से चुनावी गठबन्धन करते हैं या नहीं। चढ़ूनी का मक़सद राजनीति में मज़बूत होकर ख़ुद को किसी बड़े किसान नेता के तौर पर उभारना है। वैसे भी हाल के किसान आन्दोलन में उनका बड़ा रोल रहा है और हरियाणा में उन्होंने अपने संगठन के ज़रिये जिस तरह किसान आन्दोलन को धार दी, उससे वह एक मज़बूत किसान नेता के रूप में स्थापित हुए हैं। चढ़ूनी ने राजनीतिक पार्टी बनाने का फ़ैसला अचानक ही नहीं किया है। उनके इस क़दम की चर्चा बहुत पहले शुरू हो गयी थी। पंजाब के किसानों ने ही मोदी सरकार के तीन कृषि क़ानूनों का सबसे ज़्यादा विरोध किया था। जो बड़ा किसान आन्दोलन इस विरोध खड़ा हुआ, उसमें गुरनाम सिंह चढ़ूनी अहम अगुआ की भूमिका में थे। ऐसे में यह तो दिख ही रहा था कि आने वाले समय में पंजाब की चुनावी जंग में वह भी भूमिका निभाएँगे।

यह बिल्कुल सही है कि किसान आन्दोलन और पंजाब कांग्रेस के भीतर चल रही उठापटक ने प्रदेश की सियासत को उलझा कर रख दिया है। कांग्रेस हाल के महीनों में एक बार फिर पंजाब में सरकार दोहराती दिख रही थी। दूसरे दल उसके आसपास भी नहीं थे। लेकिन उसके बाद घटनाओं ने ऐसी पलटी मारी कि आँकड़े अब काफ़ी बदलती दिख रही हैं। चुनाव तक कांग्रेस ख़ुद को कितना सँभाल पाती है, यह देखने वाली बात होगी। ऐसा नहीं कि चढ़ूनी पहले चुनावी जंग में नहीं कूदे हैं। वह बतौर निर्दलीय प्रत्याशी हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। हालाँकि उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। यही नहीं सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पत्नी बलविंदर कौर भी आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं। पति की तरह उन्हें भी हार का कड़वा स्वाद चखना पड़ा था। चढ़ूनी ने भले पंजाब में अपनी पार्टी बनाने का ऐलान किया; लेकिन उनके पास अभी तक पंजाब का छ: महीने पुराना स्थायी पता नहीं है। चुनाव आयोग के नियम कहते हैं कि जिस राज्य में कोई व्यक्ति विधानसभा का चुनाव लडऩा चाहता है, उस राज्य का उसके पास कम-से-कम छ: महीने पुराना स्थायी पता होना ज़रूरी है। शायद यही कारण है कि उन्होंने ख़ुद चुनाव लडऩे से इन्कार किया है।

चढ़ूनी का इतिहास देखें, तो वह राजनीति में दिलचस्पी रखते रहे हैं और आम आदमी पार्टी के राजनीति में उभरने के बाद उसके नज़दीक रहे हैं। याद रहे सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में तो आम आदमी पार्टी ने चढ़ूनी को पार्टी का टिकट तक देने के पेशकश की थी। लेकिन उस समय एक मुकदमे में उलझे होने के कारण चढ़ूनी चुनाव नहीं लड़ पाये थे और पार्टी ने उनकी पत्नी को टिकट दिया था। ऐसे में यह कयास लग रहे हैं कि राजनीति में पार्टी बनाकर उनका आना आम आदमी पार्टी को लाभ पहुँचाने के इरादे से हुआ है। किसान नेताओं पर नज़र पंजाब में चढ़ूनी सहित किसान आन्दोलन के दूसरे नेताओं पर अब राजनीतिक दलों की नज़र है। विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भारतीय किसान यूनियन के प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल को अपने समर्थन में लाने की कोशिश में है। राजेवाल को किसी समय अकाली दल के करीब माना जाता था। फ़िलहाल आम आदमी पार्टी की भी उन पर नज़र है। शिरोमणि अकाली दल ने भाजपा के साथ सम्बन्ध तोडऩे के बाद बसपा से गठबन्धन कर लिया था। अकाली दल को पिंड (गाँवों) की पार्टी माना जाता है। वर्तमान में वह किसानों के गढ़ में खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए तरस रही है; जबकि किसानों का उसे कभी समर्थन रहा था।

पंजाब की किसान राजनीति के बड़े चेहरे देखें, तो इनमें दर्शन पाल, बलवीर सिंह राजेवाल, जोगिंदर सिंह उगराहां खास हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि केंद्र के किसानों के मुद्दों के आगे झुकने से इस वर्ग को ताक़त मिली है। किसान और खेती पंजाब में एक बृहद राजनीतिक असर रखने वाला क्षेत्र हैं। पंजाब का सारा आर्थिक आधार खेती रहा है। सूबे में 75 से 78 फीसदी लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़े हैं। ज़ाहिर है अब इस बार का चुनाव किसान और खेती के मुद्दे के रूप में बदल रहा है। इनमें खेतों में काम करने वाले लाखों मजदूर भी हैं।

यह तो प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों की बात है। यदि अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों, क्षेत्रों और वर्गों की बात करें, तो ज़ाहिर होता है कि इसमें गाँवों से लेकर शहरों तक आबादी शामिल है। इनमें आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट उद्योग भी है, जिसका बड़ा तबका पंजाब में है। ट्रेडर्स भी हैं और एजेंसियाँ भी और शहर से लेकर गाँव के दुकानदार भी। अच्छी फ़सल किसान को बाजार में खरीदारी का अवसर देती है और ज़ाहिर है इससे कई छोटे कारोबार चलते हैं। इन सभी वर्गों से जुड़े लोग सीधे तौर पर सूबे राजनीति को प्रभावित करते हैं।

यही कारण है कि किसान और खेती चुनाव में नज़रअंदाज नहीं किये जा सकते। ऐसे में किसान आन्दोलन ने किसानों को पंजाब की राजनीति में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक कर दिया है। यही कारण है कि आन्दोलन से जुड़े रहे संयुक्त किसान मोर्चा के बड़े चेहरों पर पंजाब के राजनीतिक दल नज़रें गढ़ाये बैठे हैं। मक़सद एक ही है- चुनाव में उनकी किसान में पैठ का फ़ायदा उठाना। भाजपा से दूरी भाजपा से किसान अभी भी नाराज़ हैं, इसका असर इस बात से स्पष्ट होता है कि भाजपा से गठबन्धन की ख़बरों के बाद शिरोमणि अकालीदल (संयुक्त) में बाकायदा फूट पड़ गयी। पार्टी के नेता रणजीत सिंह ने भाजपा के साथ सीटों के तालमेल का खुले रूप से विरोध किया है। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) को अपने गठबन्धन का हिस्सा बनाने के संकेत दिये थे। शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के अधिकतर नेता जिस तरह भाजपा के साथ गठबन्धन के ख़िलाफ़ हैं, उससे निश्चित ही अमरिंदर-भाजपा गठबन्धन को झटका लगेगा। यह दिलचस्प है कि अमरिंदर सिंह के कुछ साथी नेता भाजपा के साथ गठबन्धन को लेकर आशंकित रहे हैं। हालाँकि अमरिंदर सिंह को लगता रहा है कि भाजपा के साथ जाना ही बेहतर रहेगा।

शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के नेता और पूर्व सांसद रणजीत सिंह का कहना है- ‘भाजपा के साथ किसी भी तरह के गठबन्धन के व्यक्तिगत रूप से मैं सख़्त ख़िलाफ़ हूँ। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता इस बारे में साफ राय ज़ाहिर कर रहे हैं। पंजाब में भाजपा का जबरदस्त विरोध है। लिहाज़ा सभी इस बात को जानते हैं कि भाजपा के साथ जाना बहुत नुक़सानदेह साबित होगा। ‘रणजीत सिंह साफ कर चुके हैं कि पार्टी का भाजपा के साथ गठबन्धन होता है, तो वह पार्टी का हिस्सा नहीं रहेंगे। पार्टी यह रिपोर्ट लिखे जाने तक 91 उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुकी थी। कुल मिलाकर पंजाब विधानसभा चुनाव में किसान एक बड़ा मु्द्दा बनने जा रहा है। यह देखना होगा कि अगले दो महीने में राज्य की राजनीति क्या रंग लाती है? कांग्रेस सरकार में काफ़ी उठा-पटक से अटकलें लगायी जा रही कि विधानसभा चुनाव के बाद लटकी हुई विधानसभा भी आ सकती है। अगर ऐसा हुआ, तो सभी राजनीतिक दल सरकार की कोशिशें करेंगे, ऐसे में हो सकता है कि कुछ अबूझ गठबन्धन बनें।

 

“बड़े राजनीतिक दल पूँजीवादियों के फ़ायदे वाली नीतियाँ बनाते हैं और ग़रीबों को नज़रअंदाज़ करते हैं। ऐसी राजनीति के कारण ही पूँजीवादियों का देश पर कब्ज़ा होता जा रहा है। इस कारण आम आदमी की बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। देश को लूटने वाले ऐसे लोगों को बाहर निकालने की ज़रूरत है। हमारी पार्टी की पहचान धर्मनिरपेक्ष रहेगी और यह समाज के सभी वर्गों के कल्याण के लिए काम करेगी। हमारा मानना है कि कृषि क्षेत्रों में बड़े बदलावों की ज़रूरत है, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिल सके। साथ ही ऐसी फ़सलों की पैदावार की ज़रूरत है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में माँग हो।’’

गुरनाम सिंह चढ़ूनी

संयोजक, संयुक्त संघर्ष पार्टी