चुनावी ख़र्च की सीमा बढ़ाना कितना वाज़िब?

मेरा मानना है कि अगर चुनाव आयोग भी इस मामले पर आँखें बन्द करे बैठा है, तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इस पर तत्काल दख़ल देने की ज़रूरत है, अन्यथा इन नेताओं की ऐशपरस्ती और अनाप-शनाप चुनावी ख़र्चे के चलते लोगों का जीवन यूँ ही महँगाई, बेरोज़गारी, मोटे कर (टैक्स) और काम ज़्यादा, वेतन कम की उलझनों में उलझा रहेगा और देश में ग़रीबी भी बढ़ती रहेगी तथा ग़रीबों की संख्या भी। इसी तरह अगर उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें, तो उस साल सभी पार्टियों ने क़रीब 5,500 करोड़ रुपये ख़र्च किये। कहा जाता है कि इनमें से तक़रीबन 1,000 करोड़ रुपये नोट के बदले वोट पर ख़र्च किये गये। यह चुनाव भी देश के 2017 तक के सभी विधानसभा चुनावों से महँगा था।

सवाल यह है कि राजनीतिक दलों के पास इतना मोटा पैसा कहाँ से आता है? पहले यह माना जाता था कि पार्टी फंड से राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं और पहले इसे उजागर भी करना होता था। लेकिन अब यह हिसाब भी पार्टियाँ नहीं देतीं। भाजपा की अगर बात करें, तो उसने तो अपने तमाम हिसाबों को उजागर करना कब से बन्द कर रखा है।

सवाल यह है कि सन् 1980 से अस्तित्त्व में आयी भाजपा महज़ चार दशक में इतना पैसा कहाँ से पा गयी? जिसके चलते वह हर चुनाव में पानी की तरह पैसा बहा रही है और उसने देश भर में हज़ारों आलीशान कार्यालय बना लिये। जबकि वहीं दूसरी तरफ़ देश के आर्थिक हालात बुरी तरह ख़राब होती जा रहे हैं और भुखमरी, महँगाई, बेरोज़गारी व ग़रीबी लगातार बढ़ती जा रही है। यह सवाल कांग्रेस से भी पूछना उतना ही ज़रूरी है, जितना भाजपा से। क्योंकि कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं है। लेकिन भाजपा ने जिस तरह से पैसों का दुरुपयोग शुरू किया है, इससे पहले किसी भी पार्टी ने नहीं किया। यहाँ तक कि अटल बिहारी बाजपेयी के दौर में ख़ुद भाजपा ने इस तरह से जनता के पैसे को चुनावों में नहीं बहाया।

हालाँकि यह भी एक सच है कि चुनाव आयोग द्वारा तय ख़र्च की सीमा को हर पार्टी ने हर चुनाव में पार किया है। लेकिन चुनाव आयोग ने इस पर कभी अंकुश लगाने की कोशिश नहीं की। यही वजह है कि अब सभी पार्टियाँ निरंकुश हो गयी हैं और चुनावों में अनाप-शनाप ख़र्च करती हैं, जिनमें चुनावी ख़र्च की इस दौड़ में सत्ताधारी भाजपा सबसे आगे दिखायी पड़ रही है। जहाँ एक ओर चुनावी ख़र्च की सीमा को बढ़ाये जाने के बाद ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने सहमति जतायी है, वहीं तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर असहमति जतायी है। चुनावी ख़र्च की सीमा बढ़ाने पर उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग का यह फ़ैसला साफ़तौर पर भ्रष्टाचार और काले धन को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होगा। यह फ़ैसला हैरान कर देने वाला है; इसलिए मैं चुनाव आयोग के इस फ़ैसले की निंदा करता हूँ। ज़ाहिर है कि जिस समय चुनावों को धन-बल से मुक्त करने की माँग ख़ूब हो रही है, उस समय चुनावी ख़र्च सीमा बढ़ाया जाना वाक़र्इ हैरत में डालने वाला है। क्योंकि चुनावी ख़र्च की सीमा बढऩे से कम बजट वाली पार्टियों को मुश्किल का सामना कर पड़ सकता है। दरअसल चुनावी ख़र्च की सीमा बढ़ाये जाने वालों की दलील है कि राजनीतिक दल समय-समय पर यह कहते रहे हैं कि चुनावी ख़र्च की अब तक जो सीमा तय है, वह व्यावहारिक नहीं है। प्रत्याशियों पर तय सीमा से ज़्यादा ख़र्च करने और पैसे बाँटने के आरोप भी लगते रहे हैं। लिहाज़ा यदि चुनावी ख़र्च सीमा को बढ़ा दिया जाएगा, तो उम्मीदवारों को अपने हलफ़नामे में झूठ नहीं बोलना पड़ेगा।

फ़िलहाल चुनाव में इस साल होने वाले पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों की भारतीय निर्वाचन आयोग ने तारीख़ तय कर दी है। इसी के साथ आगामी चुनाव वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में आचार संहिता लागू हो गयी है। सभी राज्यों में 10 फरवरी से लेकर 7 मार्च तक सात चरणों में मतदान होगा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव की मतगणना 10 मार्च को होगी। कोरोना से बचाव के लिए ज़रूरी दिशा-निर्देशों के बीच मतदान होगा और चुनावी प्रक्रिया में लगे सभी अधिकारी व कर्मचारियों को कोरोना टीके लगे होने चाहिए और मास्क लगा होना चाहिए।

मतदान केंद्रों पर सैनिटाइजर, मास्क जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी और मतदाता केंद्रों की संख्या भी बढ़ायी जाएगी, ताकि भीड़ एक ही मतदान केंद्र पर ज़्यादा न जुटे। यह सब तो ठीक है, लेकिन क्या चुनाव आयोग पार्टियों द्वारा पैसा ख़र्च करके मतदान बूथों के आसपास बेतरतीब भीड़ जुटाने पर भी अंकुश लगाएगा? राजनीतिक जानकार कहते हैं कि चुनाव आयोग अब उसी के पक्ष में काम करता है, जिसके हाथ में सत्ता होती है। यही वजह है कि वह पार्टियों के मोटे ख़र्च और तमाम दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाने पर भी आँखें बन्द किये रहता है। क्योंकि अगर वह विपक्षी दलों पर अंकुश लगाएगा, तो उसे सत्ता पक्ष में जो पार्टी होगी, उस पर भी अंकुश लगाना पड़ेगा। इसीलिए वह किसी पर भी अंकुश नहीं लगाता।

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं।)