चरार-ए-शरीफ आतंकवादी हमला

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दरगाह में किसी भी तरह की कार्रवाई का मतलब था पूरे राज्य की जनता की धार्मिक भावनाओं को आहत करना. लेकिन इसके साथ ही यथास्थिति भी कायम नहीं रखी जा सकती थी.

कहा जाता है कि इसी बीच नौ मई को आतंकवादियों के कमांडर मस्त गुल के निर्देश पर उसके साथियों ने शहर के एक इलाके में आग लगा दी. कुछ ही घंटों में यह आग शहर के एक बड़े हिस्से में फैल गई. चरार-ए-शरीफ की दरगाह भी इस आग की चपेट में आ गई. इस मौके का फायदा उठाकर आतंकवादी भागने लगे तो सेना से उनकी मुठभेड़ हुई और इस दौरान 20 आतंकवादी मारे गए. सेना अब दोनों स्तर पर काम कर रही थी. आखिरकार जब आग पर काबू पाया गया तब तक शहर का दो तिहाई हिस्सा जलकर खाक हो चुका था. चरार-ए-शरीफ दरगाह का एक बड़ा हिस्सा भी इसमें जलकर तबाह हो गया. उधर मरने वाले आतंकवादियों की संख्या 25-30 हो चुकी थी.  इस पूरी कार्रवाई में आखिरकार शहर को आतंकवादियों के कब्जे से मुक्त करवा लिया गया लेकिन इसकी एक असफलता यह रही कि आतंकवादियों का कमांडर अपने कई साथियों के साथ चरार-ए-शरीफ से सुरक्षित निकलकर सीमापार पहुंचने में कामयाब रहा.

बाद में केंद्र सरकार ने इस दरगाह का पुनर्निर्माण करवा दिया, लेकिन यह घटना उस समय कई महीनों तक जम्मू-कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों की वजह बनी रही.

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