घुसपैठ का नुकसान

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कहने की जरूरत नहीं है कि इस तमाशे में ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ और ‘पार्टी विथ डिफरेन्स’ का दावा करने वाली भाजपा की नैतिकता और अनुशासन की धोती सार्वजनिक तौर पर खुल रही है. लेकिन मुश्किल यह है कि पार्टी इसकी शिकायत किससे करे. आखिर चैनलों में भाजपा के अंदरूनी सत्ता संघर्ष के बारे में चल रहे किस्से-कहानियों, साजिशों, उठापटक और खेमेबंदी से जुड़ी ‘खबरों’ का स्रोत खुद भाजपा और संघ के नेता हैं. सच यह है कि ‘खबरों’ के नाम पर चल रहे इन किस्से-कहानियों में सबसे ज्यादा कथित ‘खबरें’ भाजपा और संघ के विभिन्न गुटों के नेताओं की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ ‘प्लांटेड स्टोरीज’ हैं.

खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर ‘खबरें’ भाजपा बीट कवर करने वाले उन रिपोर्टरों के जरिए आ रही हैं जो खुद भी भाजपा के इस या उस खेमे के करीब माने जाते हैं. इन रिपोर्टरों की पहुंच भाजपा या संघ के अंत:पुर तक है और कुछ उनके किचन कैबिनेट तक में शामिल हैं. इनमें से कई रिपोर्टर चैनलों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण के नाम पर भाजपा के विभिन्न गुटों या खेमों के प्रवक्ता-से बन जाते हैं और संबंधित गुटों का बचाव करते दिखने लगते हैं. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. भाजपा और चुनिंदा पत्रकारों के बीच रिश्ता बहुत पुराना है. अतीत में इनमें से कई पत्रकार बाद में पार्टी में एमपी और मंत्री भी बने हैं.

सच पूछिए तो भाजपा या संघ में पत्रकारों की यह घुसपैठ काफी अंदर तक है. लेकिन इसके उलट मीडिया के अंदर भाजपा की घुसपैठ भी काफी दूर तक रही है. इस घुसपैठ के नतीजे राम जन्मभूमि अभियान के दौरान दिखे और इन दिनों नरेंद्र मोदी को लेकर मीडिया के एक बड़े हिस्से के उत्साह में भी दिखाई दे रहा है. लेकिन भाजपा-न्यूज मीडिया के इस ‘मुहब्बत’ की कीमत वे पाठक-दर्शक चुका रहे हैं जिन्हें देश के मुख्य विपक्षी दल के बारे में ‘खबरों’ के नाम पर ‘प्लांटेड स्टोरीज’ और कानाफूसियों-अफवाहों से काम चलाना पड़ रहा है.