घर की लड़ाई सड़क पर आई

बिखराव (बाएं से) एक आयोजन में संजय ससंह, रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद सतवारी
बिखराव (बाएं से) एक आयोजन में संजय ससंह, रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद सतवारी

कोढ़ में खाज वाली कहावत को साकार करते हुए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुराने और बड़े नेता ही बगावती तेवर पर उतर आए हैं. हाल में चार राज्यों में पार्टी की करारी हार हो चुकी है. आम चुनाव नजदीक हैं. अपनी 80 लोकसभा सीटों के साथ जिस उत्तर प्रदेश को राजनीतिक लिहाज से देश का सबसे अहम सूबा माना जाता है वहां का हालिया घटनाक्रम कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं लगता.

पहले तो कांग्रेस के गढ़ समझे जाने वाले अमेठी के राजा व सुल्तानपुर से कांग्रेस के सांसद संजय सिंह ने अपने जन्मदिन पर भाजपा नेताओं को घर पर बुला कर पार्टी को दुविधा में डालने का काम किया. अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक प्रमोद तिवारी सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की मदद से राज्यसभा का रास्ता चुन चुके हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस की हैसियत राज्यसभा सीट के लिए उम्मीदवार उतारने की नहीं थी. लेकिन सारा खेल सपा की मदद से हुआ. यह अलग बात है कि तिवारी की जिद के आगे कांग्रेस को उन्हें पार्टी का चुनाव चिन्ह देना पड़ा. कांग्रेस के ही एक नेता सवाल करते हैं, ‘अब लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में पार्टी के नेता किस मुंह से सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी या भाजपा को घेर पाएंगे?’ 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 22 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से काफी उम्मीदें थीं. लेकिन ये 2012 के विधानसभा चुनाव में टूट गईं. उसके विधायक दहाई का भी आंकड़ा नहीं पार कर पाए. अब जब 2014 के लोकसभा चुनाव सिर पर हैं तो ऐन वक्त पर पार्टी के पुराने धुरंधर ही उसके लिए सिरदर्द बन रहे हैं.

सबसे पहले गांधी परिवार के गढ़ अमेठी की बात करते हैं. अमेठी राजघराने के राजा व सुल्तानपुर से सांसद संजय सिंह पार्टी से नाराज चल रहे हैं. उनकी यह नाराजगी कई बार खुले मंच से भी जाहिर हो चुकी है. राजा साहब की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण अपनी कुर्सी से जुड़ा है. जिस सुल्तानपुर लोकसभा सीट से संजय सिंह सांसद हैं, वहां से 2014 में वरुण गांधी का लड़ना तय माना जा रहा है जो उनके पुराने मित्र संजय गांधी के बेटे हैं. इसके चलते संजय सिंह को अपनी सीट भाजपा के पाले में जाती दिख रही है. दूसरी ओर जिस अमेठी राजघराने के वे राजा हैं वहां से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी खुद चुनाव लड़ते हैं. ऐसे में संजय सिंह के सामने अपनी कुर्सी को लेकर संशय बना हुआ है. सूत्र बताते हैं कि कुर्सी बचाने के लिए ही संजय सिंह आजकल भाजपा से नजदीकी बढ़ा रहे हैं. भाजपा से उनकी नजदीकियां पहले तो अंदरखाने थीं, लेकिन कुछ दिन पूर्व ये उस समय सार्वजनिक हुईं जब उनके घर पर भाजपा के नेताओं का जमावड़ा लगा. मौका था राजा साहब का जन्मदिन. जन्मदिन के बहाने राजमहल में जो राजनीतिक सरगर्मी थी उसमें वही चंद कांग्रेसी शामिल थे जिनसे राजा साहब के पारिवारिक रिश्ते थे. बाकी भीड़ भाजपा नेताओं की थी.

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब संजय सिंह अपनी ही पार्टी से नाराज हैं. इससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी रानी अमिता सिंह कांग्रेस के टिकट पर अमेठी विधानसभा से कांग्रेस की प्रत्याशी थीं. चुनाव में वे खेत रहीं. उस समय भी संजय सिंह ने हार का ठीकरा राहुल व सोनिया के उन करीबी लोगों पर फोड़ा था जो अमेठी व रायबरेली का प्रबंधन देखते हैं. फिलहाल संजय सिंह तहलका से बातचीत में खुद के कांग्रेस के साथ ही रहने की बात कहते हैं, लेकिन सुल्तानपुर व अमेठी के दूसरे कांग्रेसियों को ऐसा नहीं लगता. कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे एक कांग्रेसी कहते हैं, ‘भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तर प्रदेश से ही हैं और ठाकुर बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं. बीच में कुछ समय संजय सिंह भाजपा के साथ भी रहे हैं. ऐसे में चुनाव के समय ऊंट किस करवट बैठेगा अभी यह कहना जल्दबाजी होगी.’

उधर, यह सब चल ही रहा था कि नौ बार लगातार विधायक रह चुके प्रमोद तिवारी ने आलाकमान की मुश्किलंे बढ़ा दीं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के कद्दावर राज्यसभा सांसद काजी रशीद मसूद के अयोग्य ठहराए जाने के बाद एक सीट खाली हुई थी. विधानसभा में विधायकों के संख्या बल के आधार पर कांग्रेस के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि वह अपने किसी नेता को राज्यसभा तक पहुंचा सके. लिहाजा पार्टी शांत थी. इस सबके बीच प्रतापगढ़ जिले से कांग्रेस विधायक प्रमोद तिवारी ने खुद के राज्यसभा जाने का रास्ता चुन लिया. इस काम के लिए उन्होंने सपा से मदद लेने में भी कोई गुरेज नहीं किया. कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि खुद सोनिया गांधी नहीं चाहती थीं कि राज्यसभा के लिए उनकी पार्टी से कोई सपा की मदद से चुना जाए क्योंकि ऐसा करने से जनता के बीच चुनाव से ठीक पहले गलत संदेश जाता. सवाल उठे कि इसके बाद पार्टी कार्यकर्ता किस मुंह से चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ बिगुल फूंकने का काम करेगा. लेकिन प्रमोद तिवारी की जिद के आगे कांग्रेस हाईकमान को भी घुटने टेकने पड़ गए. ऐन वक्त पर पार्टी को तिवारी को अपना चुनाव चिह्न तक देना पड़ा.
वैसे देखा जाए तो उत्तर प्रदेश कांग्रेस में तिवारी की सपा से नजदीकियों पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि 1989 के बाद सूबे में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो तिवारी के सभी पार्टियों से रिश्ते मधुर ही रहे हैं. यही कारण है कि कई बार कांग्रेस को असहज स्थिति का सामना भी करना पड़ा है. कांग्रेस के एक पुराने नेता कहते हैं, ‘1991 से 2012 तक लगातार 21 साल तक विधानमंडल दल का नेता रहने के बावजूद प्रमोद तिवारी को उनके इसी स्वभाव के कारण प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी नहीं दी गई.’

इसके बावजूद सभी हथकंडे अपना कर तिवारी खुद राज्यसभा पहुंच गए हैं. वहीं उनके जाने से खाली हुई उनकी सीट पर बेटी मोना तिवारी की दावेदारी मानी जा रही है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री तहलका को बताते हैं कि प्रमोद तिवारी के सपा की मदद से राज्यसभा में जाने से कांग्रेस का कोई लेना-देना नहीं है. वे कहते हैं, ‘कांग्रेस ने पहले ही अपना रुख साफ कर दिया था कि कोई भी बड़ा नेता राज्यसभा सीट को लेकर सपा से बातचीत नहीं करेगा. तिवारी के नामांकन के समय भी वहां पार्टी का न तो महासचिव मौजूद था और न कोई सचिव. पार्टी की ओर से सपा से कोई सपोर्ट भी नहीं मांगा गया था.’ मिस्त्री की बातों से साफ हो जाता है कि पार्टी के न चाहते हुए भी तिवारी ने सपा का सहयोग लेकर एक तरह से पार्टी को खुलेआम चुनौती देने का काम किया है.

दूसरी ओर सपा ने भी इस बहाने एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया है. एक ओर उसने तिवारी को राज्यसभा भेज कर कांग्रेस व बसपा के बीच बढ़ रही नजदीकियों पर विराम लगाने का काम किया है. दूसरी तरफ कांग्रेस की रैलियों व आंदोलनों में उसके नेता कानून व्यवस्था सहित कई मुद्दों पर राज्य सरकार को घेरने की जो रणनीति बनाए हुए थे सपा के इस दांव ने उसे भी कमजोर करने का काम किया है. सपा के सूत्र बताते हैं कि इन्हीं सब कारणों को देखते हुए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह भी इस बात पर अड़े थे कि रशीद मसूद वाली सीट पर अगर कोई कांग्रेस से राज्यसभा जाएगा तो वे प्रमोद तिवारी ही होंगे.
हालांकि तिवारी को राज्यसभा भेज कर सपा भले ही अपना हित साधने का प्रयास कर रही है, लेकिन स्थितियां उसके लिए भी कम असहज नहीं हैं. आजमगढ़ से लेकर बरेली तक अपनी तमाम रैलियों में मुलायम सिंह यादव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महंगाई व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार को घेरने की कोशिश की है. ऐसे में सपा के सामने भी समस्या है. एक ओर तो वह कांग्रेस को खुले मंच से भला-बुरा कह रही है और दूसरी ओर अपने नेताओं को दरकिनार करके उसी के नेता को पुरस्कार स्वरूप राज्यसभा भेज रही है.

उधर, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनौतियां यहीं खत्म नहीं होतीं. चुनावी तैयारियों के लिहाज से देखें तो सपा व बसपा ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं और वे प्रचार के मोर्चे पर भी डट गए हैं. उधर, कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा भी अभी खड़ा नहीं हो पाया है जबकि नया प्रदेश अध्यक्ष बने करीब एक साल हो रहा है. पार्टी सूत्र बताते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री खुद हाईकमान को बता चुके हैं कि स्वास्थ्य कारणों से वे पूरे प्रदेश का तूफानी दौरा नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में पार्टी के सामने चुनाव से ठीक पहले एक ऐसा नया अध्यक्ष ढूंढ़ने की चुनौती भी है जो संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा करने के साथ-साथ गुटबाजी से भी दूर रहे. प्रदेश में कांग्रेस की हालत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि यहां पार्टी के स्टार प्रचारक राहुल गांधी की रैलियां फ्लॉप रही हैं. अलीगढ़ में उनकी चुनावी रैली हो चाहे हमीरपुर में, हर जगह सपा व भाजपा के मुकाबले कहीं कम लोग जुट रहे हैं. राहुल की रैलियों में भीड़ नदारद देख अब उनकी रैलियों पर ही विराम लगा दिया गया है.

2014 के लोकसभा चुनाव के लिए हाईकमान ने जिन मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपते हुए प्रभारी बनाया है वही मिस्त्री मध्य प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से टिकट चयन समिति के चेयरमैन बनाए गए थे. वहां कांग्रेस की हालत सबके सामने है. अब देखना यह है कि 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा व भाजपा के सामने मिस्त्री का चुनाव प्रबंधन कितना कारगर होता है.

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