गंगा किनारे जाने के लिए टूटेंगी बनारस की गलियां

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तकरीबन एक दशक पहले काशी विश्वनाथ परियोजना की रूपरेखा बनी थी। जिसे बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। जब भाजपा सरकार सत्ता में आई तो सेवा निवृत नौकरशाहों ने इस योजना को बाहर निकलवाया और उस पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ से मंजूरी भी ले ली।

मुख्यमंत्री ने 31 जनवरी को वाराणसी पहुंच कर पूरी योजना की जानकारी अधिकारियों से ली। वाराणसी विकास प्रधिकरण के सचिव विशाल सिंह इस परियोजना के नोडल अधिकारी हैं। उनका कहना है कि यह गलत सूचना है कि हज़ारों लोग और कई सौ परिवार विस्थापित होंगे। यह भी गलत सूचना है कि कई ऐतिहासिक -धार्मिक स्थल टूटेंगे। उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थों के चलते लोग इस तरह का मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। दरअसल ऐसे लोगों के अपने मकान दुकान स्टोर रूम इन धार्मिक-ऐतिहासिक धरोहरों में बने हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग मंदिरों में भी रहते हैं। ऐसे लोगों से ऐतिहासिक – धार्मिक महत्व के स्थलों को मुक्त कराया जाएगा।

गंगा किनारे गलियों का घना घेरा

काशी की गलियां ऐसी हैं जहंा दिन-दोपहरी में भी उजास नहीं पहुंचती । कुछ गलियां इतनी पतली हैं कि दो आदमी एक साथ नहीं गुजऱ सकते। जो बंबई-कलकत्ता की सड़कों पर खो जाने से डरते हैं वे यदि काशी की गलियों में चक्कर काटें तो दिन भर वे  चक्कर काटेंगे पर भूल जाएंगे कि उन्होंने कहां से गली की शुरूआत की थी। कई गलियोंं में तो काफी दूर आगे जाने पर रास्त भी बंद मिल सकता है। नतीजा यह होगा कि आपको फिर गली की उस छोर तक वापस आना पड़े जहां से गड़बड़ा कर आप मुड़ गए थे। कुछ गलियां ऐसी हैं कि आगे बढऩे पर मालूम होगा कि आगे रास्ता बंद है। लेकिन गली के छोर पर पहुंचने पर देखेंगे कि बगल में एक पतली गली सड़क से जा मिली है। गलियों का तिलिस्म इतना रहस्यमय है कि बाहरी की कौन कहे इसी शहर के वशिंदे भी जाने में हिचकते हैं। कुछ तो गलियां ऐसी है जिनमें बाहर निकलने के लिए किसी दरवाजे या मेहराबदार फाटक के भीतर से गुजरना पड़ता है।

कहते हैं कि यहां कई ऐसी भी गलियां हैं जिनसे बाहर निकलने के लिए चार से चौहद रास्ते हैं। जिस गली से आप घर पहुंच सकते हैं उसी से आप श्मशान या नदी के किनारे भी जा सकते हैं।

सोचिए यदि इन गलियों में कभी शंकर भगवान के किसी वाहन से मुलाकात हो जाए और अचानक किसी बात से नाराज़ हो कर वह आपको हुरपेट ले तो जान बचाकर भागना भी मुश्किल हो जाए । और फिर उन गलियों में जो आगे रास्ता बंद हो। आप पीछे भाग नहीं सकते आगे रास्ता बंद है।  अगल-बगल के सभी मकानों के भीतर लोहे की भारी सांकल लगी हैं उधर सांड महराज हुरेपेट आ रहे है। अगर बीमा कंपनियां उचित समझे तो बीमा एजेंट इन गलियों में ज़रूर भेजे। फिर गंदगी की बात तो कहां नहीं है। हर शहर गंदा है वहीं बनारस की कुछ ही गलियां चकाचक हैं।

जिन गलियों में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, बरसात के मौसम का भी पता नहीं चलता वहां भी लोग यदि छता लगा कर चलते हैं तो कारण है गंदगी। बनारसी गली में तीन मंजिलें, चार मंजिलें से बिना नीचे देखे पान की पीक थूक सकता है, पोंछे का पानी फैंक सकता है, कूड़े का अंबर गिरा  सकता है। इस सत्कार्य में लिसड़ा व्यक्ति जब गालियां देता है तो सुनकर भाई लोग प्रसन्न होते हैं।

बंदरों के लिए गलियां प्रिय क्रीड़ा स्थल है। ऐसी घटनाएं सुनने में आती हैं कि अचानक छत से एक बड़ा रोड़ा सिर पर आ गिरा और बड़ी आसानी से स्वर्ग में सीट रिजर्व हो गई।