खूंटे से बंधी जम्हूरियत

‘ठीक ही सुना था, क्या!’ ‘यही कि कानून के हाथ लंबे होते हंै!’ ‘लेकिन हम यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठे भी तो नहीं रह सकते…’ ‘न जाने किस मनहूस घड़ी में चोरी करने चले थे!’ ‘सुना है कि कई थानों की पुलिस आ गई है!’ ‘पुलिस! अबे क्राइम ब्रंाच, सीआईडी वाले, सूंघने वाले कुत्ते तक आ चुके हैं… तीन पुलिसवाले तो लाइन हाजिर भी कर दिए गए हंै… छापे पे छापे पड़ रहे हैं! ऐसे तो पुलिस खूनी-आतंकवादी के पीछे नहीं पड़ती है, जैैसे हमारे पीछे पड़ी हुई है! ‘कसम है! अब जो आगे से चोरी की तो!’

‘इससे पहले तो कभी पुलिस- वाले यूं हाथ धो के हमारे पीछे नहीं पड़े…’ ‘…तो इससे पहले हमने कब किसी मंत्री के यहां हाथ मारा था!’ ‘भैंसंे मिल जाएं, तो शायद पुलिसवाले हम पर रहम कर दें.’  ‘मुझे तो आंखों के आगे अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है…’ ‘अंधेरे में इन भैंसों को हम आजाद कर देगें! तब शायद हमारी जान बच जाए.’

अरे यह क्या! यहां तो ‘हाथ आया मुंह न लगा’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. चोर चोरी के माल को अपने कब्जे से स्वत: मुक्त करने जा रहे हैं. अब जब वे दोनों भैंसों को बंधनमुक्त कर रहे हैं, तब भैंसें उत्साह और गर्व से जोर-जोर से नारे लगा रही हैं.

‘हम कोई उठाई हुई साइकिल नहीं!’ ‘हम कोई छिनी हुई चेन नहीं! ‘हम कोई छेड़ी हुई लड़की नहीं!’ ‘हम कोई जली हुई झोपड़ी नहीं!’ ‘हम कोई विस्थापित नहीं!’ ‘हम कोई राहत शिविर नहीं!’ ‘हम कोई ठंड से मरते शिशु नहीं!’ ‘हम कोई गरीब की लुगाई नहीं!’ ‘हम कोई दंगाई नहीं!’

इस वक्त भैंसें आजाद हो गई हैं और आजाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के एकल दिशा मार्ग पर कूल्हे मटकाते हुए उनका झुंड बड़ी बेफिक्री से अपने ठिकाने की ओर चला जा रहा है.

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