क्या 2014 में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

0
103

अगड़ी जातियां
2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को जो असाधारण सफलता मिली थी उसमें उसके परंपरागत वोटबैंक के अलावा अगड़ी जातियों के वोट की भी अहम भूमिका रही थी. इसको एक आंकड़े से समझा जा सकता है. 2007 के विधानसभा चुनाव में राजपूतों के कुल वोट का 20 फीसदी सपा को मिला था जबकि 2012 में यह आंकड़ा बढ़कर 26 फीसदी हो गया. इसी तरह से ब्राह्मण वोट 2007 में 10 फीसदी था जो 2012 में बढ़कर 19 फीसदी तक जा पहुंचा. सपा को मिली 224 सीटें भी इस बात की तस्दीक करती हैं कि सपा को लगभग सभी वर्गों के वोट मिले थे.

लेकिन सपा इस भरोसे नहीं बैठ सकती है. स्थितियां 2012 से काफी हद तक बदल चुकी हैं. ब्राह्मण कभी भी सपा का परंपरागत वोटर नहीं रहा है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में सवर्ण वोटों की राजनीति करने वाली भाजपा और कांग्रेस के पतन के बाद से सूबे की दो महत्वपूर्ण ठाकुर और ब्राह्मण जातियों ने अपने लिए अलग ठिकाने ढूंढ़ लिए हैं. ब्राह्मण जहां बसपा के करीब हुआ वहीं ठाकुर सपा के साथ खड़ा हो गया. लेकिन 2012 में ब्राह्मणों ने बसपा के ऊपर सपा को तरजीह दी. उसकी कुछ वजहें थीं. प्रधान बताते हैं, ‘मायावती के शासन में सबको लगता था कि ब्राह्मणों की पूछ बढ़ गई है लेकिन सच्चाई ये थी कि सिर्फ सतीश मिश्रा के परिजनों और रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया जा रहा था.’ 2012 में जो ब्राह्मण वोट सपा को मिला वह असल में मायावती के खिलाफ दिया गया था न कि सपा के समर्थन में. इस बीच डेढ़ सालों के दौरान सपा की जो छवि बनी है उसने ब्राह्मणों को तेजी से सपा से दूर किया है. छवि यह कि सपा सरकार तुष्टीकरण की हद तक जाकर मुसलमानों को खुश करने में लगी हुई है बाकी किसी की सुनवाई नहीं हो रही.

दूसरी तरफ जो ठाकुर मतदाता पिछले काफी समय से सपा के साथ खड़ा था वह भी कुछ हद तक लोकसभा चुनावों में सपा से दूर हो सकता है. मुलायम सिंह ने ठाकुरों को अपने साथ जोड़ने के लिए राजा भैया समेत कुछ लोगों को सरकार में मंत्री बानाकर उन्हें खुश करने की कोशिश जरूर की है लेकिन उत्तर प्रदेश के ठाकुरों में इस समय एक दूसरी हवा चल रही है. उत्तर प्रदेश में क्षत्रियों के सबसे बड़े नेता राजनाथ सिंह इस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और चुनाव बाद की कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं जिनमें प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर भी विचार हो सकता है. सो उत्तर प्रदेश में एक लहर भाजपा की तरफ से ऐसी बनाई जा रही है कि एक बार फिर से ठाकुर को प्रधानमंत्री बनाना है. स्वाभाविक है अगर भाजपा का यह दांव चल गया तो सपा को नुकसान हो जाएगा. इसकी एक बानगी कुछ दिन पहले लखनऊ की सड़कों पर लगे होर्डिगों में दिखी. भाजपा के ठाकुर नेताओं ने राजा भैया के समर्थन में पोस्टर लगवाए ‘सत्य परेशान हो सकता है किंतु पराजित नहीं’. इसके बाद आनन-फानन में अखिलेश यादव ने राजा भैया को उत्तर प्रदेश की कैबिनेट में फिर से शामिल कर लिया. शाहिद सिद्दीकी इसे इस तरह से देखते हैं कि पूरे के चक्कर में मुलायम सिंह के हाथ से आधा भी निकल गया है.

तीसरा मोर्चा
तीसरा मोर्चा भानुमति का वह कुनबा है जिसकी ईंट और रोड़े चुनाव के बाद तो जुड़ सकते हैं, चुनाव के पहले यह असंभव है. कमाल फारुखी को विश्वास है कि तीसरा मोर्चा जरूर बनेगा. उनके मुताबिक, ‘कांग्रेस आज की तारीख में अकेले तो सरकार बना नहीं सकती. भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए उसे किसी न किसी का समर्थन करना ही होगा.’ खुद मुलायम सिंह यादव भी चुनाव से पहले कोई गठजोड़ या मोर्चा खड़ा करने की इच्छा नहीं रखते. आजमगढ़ की चुनावी सभा में उन्होंने खुद सबसे कहा, ‘चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा ही सत्ता में आएगा. अगर आप लोगों ने मुझे मजबूत करके दिल्ली भेजा तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम दिल्ली में इस बार चमत्कार कर देंगे.’

तीसरे मोर्चे के गठन और मुलायम सिंह को इसका नेता बनने की स्थितियों में थोड़ा फर्क है. इसलिए इस पर दो तरह से सोचने की जरूरत है. मुलायम सिंह यादव के अलावा वाममोर्चा, तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू, बीजेडी, डीएमके, एडीएमके, टीडीपी, एनसीपी आदि तीसरे मोर्चे की संभावित पार्टियां हैं. इनमें से सबसे अहम हैं वामपंथ वाली पार्टियां. ले-देकर इनका राजनीतिक वजूद केरल और प. बंगाल में है. केरल में इतनी सीटें नहीं हैं कि कोई उसके दम पर केंद्र में आने की सोच सके. पश्चिम बंगाल में जो राजनीतिक स्थितियां हैं उनमें एक बार फिर से ममता बनर्जी के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. कांग्रेस विरोध की राजनीति तो ममता बनर्जी भी करती हैं और इस लिहाज से वे तीसरे मोर्चे की स्वाभाविक साझेदार हो सकती हैं. लेकिन मुलायम सिंह के साथ उनका हालिया इतिहास इतना कड़वा है कि शायद ही वे मुलायम सिंह का कोई भी सपना साकार होने दें. राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर मुलायम सिंह ने 24 घंटे के अंदर ममता बनर्जी को गच्चा देकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया था.

कर्नाटक में करुणानिधि के बजाय जयललिता के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. पर उनकी नरेंद्र मोदी के लिए नरमाहट जगजाहिर है. इस लिहाज से अगर तीसरे मोर्चे की संभावित पार्टियों में से तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी पार्टियां अगर साथ न दें तो तीसरा मोर्चा और उसका नेता किस जमीन पर खड़ा होगा?

मुलायम सिंह को तीसरे मोर्चे का नेता बनने के लिए एक और लड़ाई लड़नी होगी सीटों की संख्या के स्तर पर. मुलायम सिंह तीसरे मोर्चे के नेता तभी बन सकते हैं जब वे ‘फर्स्ट अमंग ईक्वल’ हों यानी इसमें शामिल सभी पार्टियों में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाले बन जाएं. मुलायम सिंह ऐसा सोच भी सकते हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सबसे ज्यादा 80 सीटें हैं. इस लिहाज से अगर वे 35-40 सीटें जीतने में कामयाब होते हैं तो वे तीसरे मोर्चे के नेता बन सकते हैं. यदि वे ‘वन अमंग ईक्वल’ रह जाते हैं यानी 20-22 सीटों तक सीमित रह जाते हैं तब शायद ही कोई उन्हें नेता मानने को तैयार होगा. मुलायम सिंह की दिक्कत यह है कि आज की हालत में वे अधिकतम 20-22 सीटों तक पहुंचते ही दिख रहे हैं. सपा के एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में, ‘मुजफ्फरनगर के बाद हमारा मिशन 2014, मिशन 14 सीट पर सिमट कर रह गया है. मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पूरा दृश्य बदल गया है. आज की तारीख में तीसरा मोर्चा नॉन स्टार्टर है.’

तीसरा मोर्चा यथार्थ से इसलिए भी दूर है कि जिन नेताओं के भरोसे इसके गठन की बात की जा रही है वे कभी भी एक-दूसरे की मुसीबत में साथ खड़े होते नहीं दिखते. आज यदि लालू प्रसाद यादव जेल में हैं तो मुलायम सिंह, चंद्रबाबू, नवीन पटनायक, करुणानिधि आदि किसी भी नेता की तरफ से संवेदना जताने वाला एक भी बयान देखने-सुनने को नहीं मिलता है. इसी तरह जब मुलायम सिंह को बार-बार यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई के जरिए ब्लैकमेल किया गया तब भी इनमें से ज्यादातर ने थोड़े-बहुत मुंह-जबानी खर्च के अलावा ज्यादा कुछ करने की कोशिश नहीं की. कहने का अर्थ है कि बेहद सीमित सरोकारों वाले इस मोर्चे की नियति इसके बनने से पहले ही तय है.

उत्तर प्रदेश का अंकगणित
उत्तर प्रदेश को अमूमन तीन हिस्सों में बांटकर देखें तो इसके राजनीतिक यथार्थ को समझने में थोड़ी सहूलियत हो जाएगी – पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश. इनमें से पूर्वी और मध्य वाले हिस्से परंपरागत रूप से मुलायम सिंह के मजबूत गढ़ रहे हैं जबकि पश्चिमी हिस्सा आम तौर पर उनसे रूठा ही रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 26 जिले आते हैं जिनमें कुल 27 लोकसभा सीटें हैं. मौजूदा समय में इनमें से नौ सपा के पास हैं. यह तब है जब सपा ने 2009 के लोकसभा चुनाव में बहुत बुरा प्रदर्शन किया था. अब हम मध्य यानी अवध वाले क्षेत्र पर नजर डालते हैं. इस इलाके में लोकसभा की करीब 21 सीटें आती हैं. यह इलाका भी मुलायम सिंह का परंपरागत समर्थक रहा है. फिलहाल यहां की 21 में से सपा के कब्जे में पांच सीटें हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 24 लोकसभा सीटें हैं. फिलहाल इनमें से सपा के पास सिर्फ पांच सीटें हैं. इसके अलावा छोटे-छोटे दो और इलाके हैं रुहेलखंड और बुंदेलखंड जहां लोकसभा की चार-चार सीटें हैं. बुंदेलखंड से सपा के दो सांसद हैं जबकि रुहेलखंड से एक सांसद है.

सीटों के ये आंकड़े 2009 के लोकसभा चुनाव के हैं. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने अपनी स्थिति में चमत्कारिक सुधार किया था. कहें तो इस सुधार ने ही मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की उम्मीद दी थी. लेकिन डेढ़ सालों के दौरान ही हालात हाथ से निकल गए लगते हैं. पश्चिम की 24 में से लगभग 20 सीटें ऐसी हैं जिन पर मुस्लिम आबादी 40 फीसदी के ऊपर है. इन सीटों पर सपा का वजूद पहले से भी ज्यादा डगमगाता दिख रहा है. इसी तरह से पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश की करीब 15 सीटों पर मुसलमान 35 फीसदी या इससे ऊपर हैं. अगर आजमगढ़ की सभा को संकेत मानें तो यहां भी सपा की हालत पतली होनी तय है. अगर ऐसा होता है तो मुलायम सिंह की सीटों का आंकड़ा किसी सूरत में 20-22 के आगे नहीं पहुंच सकता, और 30-35 का आंकड़ा पार किए बिना वे तीसरे मोर्चे के नेता बन नहीं सकते.

लेकिन मुलायम सिंह यादव सिर से पैर तक विशुद्ध रूप से राजनीतिज्ञ हैं. उन्होंने पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में में शामिल कराने की कोशिश के जरिए जो दांव फेंका है वह अगर कामयाब रहा तो मुस्लिम वोटों की भरपाई के साथ ही वे सामाजिक न्याय का नया समीकरण भी खड़ा करने में कामयाब होंगे. पिछड़ी जातियों में इन जातियों की जनसंख्या एक चौथाई से भी ज्यादा है और ये परंपरागत रूप से भाजपा और बसपा को वोट करती आई हैं. मुलायम सिंह सियासत के पंडितों पर यकीन करने के बजाय अपने राजनीतिक कौशल पर यकीन रखते हैं. उनकी अगाध श्रद्धा भारतीय वोटरों की उस अल्पजीवी याददाश्त में भी है जिसने उन्हें 2007 के कुशासन के बावजूद 2012 में फिर से सत्ता तक पहुंचाया है. उन्हें फिर से विश्वास है कि जो वोटर 1984, मेरठ, मलियाना, भागलपुर, 1992 को भूल चुका है वह मुजफ्फरनगर को भी भूल जाएगा. इसी विश्वास के दम पर वे कहते हैं कि एक बार वे मुजफ्फरनगर जाएंगे तो सबकी शिकायतें दूर हो जाएगीं.

लेकिन यह समय दूसरा है. अखिलेश यादव और राहुल गांधी को मुजफ्फरनगर में लोगों ने काले झंडे दिखाए और आज तक मुलायम सिंह वहां जाने का साहस नहीं जुटा सके हैं. उन्हें भी समझना होगा कि यह समय दूसरा है. आज 2002 के गुनहगारों को जनता भूलने के लिए तैयार नहीं है.

मुलायम सिंह को 2012 ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने का एक अवसर दिया था इससे इनकार नहीं किया जा सकता. मगर यह अवसर जिस तरह की जनाकांक्षाओं की बुनियाद से निकला था उसकी अनदेखी करके मुलायम ने न केवल अपने बल्कि कभी संभावनाओं के पुंज की तरह देखे जा रहे अखिलेश के भी भविष्य को अंधकार में डाल दिया. इसका नतीजा यह है कि फिलहाल मुलायम मार्का राजनीति का एक भी कलपुर्जा ठीक से काम नहीं कर रहा है. ऐसे में उनके सात रेसकोर्स पहुंचने की संभावना फिलहाल खत्म नहीं तो बेहद धूमिल जरूर दिखती है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here