क्या शिवराज, अटल जैसे होकर उनके जितना हासिल करने की राह पर हैं?

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पहला मामला उमा भारती से जुड़ा है. जब पार्टी में उमा की वापसी के समय शिवराज ने हाईकमान के सामने यह शर्त रखी कि वे मध्य प्रदेश की राजनीति और यहां के शासन-प्रशासन में किसी तरह का हस्तेक्षप नहीं करेंगी तो पार्टी ने शिवराज की यह शर्त स्वीकार कर ली. उमा को पार्टी में आए दो साल से ऊपर हो गए, वे भोपाल नियमित आती भी हैं लेकिन दो वर्षों में एक भी ऐसा मौका नहीं आया जब उन्हें किसी ने कोई राजनीतिक सभा संबोधित करते, राज्य की राजनीति और शासन-प्रशासन में हस्तक्षेप या कोई नकारात्मक टिप्पणी करते सुना हो. उल्टे आज वे शिवराज की तारीफ करते दिखाई दे रही हैं.

दूसरा बड़ा मामला पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा से जुड़ा है. उनके पहले कार्यकाल की समाप्ति के बाद सभी को लग रहा था कि झा फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाएंगे. यहां तक कि झा भी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे. लेकिन रातों रात संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे प्रभात जा का पत्ता कट गया और मुख्यमंत्री ने अपने विश्वासपात्र और मित्र नरेंद्र तोमर को प्रदेश अध्यक्ष बनवा दिया. झा ने इस घटना के बाद कहा, ‘मुझे हटाने का फैसला पोखरण विस्फोट की तरह गुप्त रखा गया.’ झा की इस बात से स्पष्ट होता है कि वे शिवराज से कितने नाराज रहे होंगे. लेकिन कुछ दिनों की नाराजगी के बाद कोई और ठौर न मिलता देख उन्होंने भी शिवराज की प्रशंसा करने में ही अपनी राजनीतिक भलाई समझी.

तीसरा मामला भोजशाला से जुड़ा है. धार्मिक रूप से अतिसंवेदनशील इस मामले में शिवराज ने पूरी तरह अपनी मर्जी चलाई. विवाद सुलझाने के लिए प्रदेश के तमाम नेताओं और मंत्रियों को किनारे करते हुए शिवराज ने प्रशासन को मामला सुलझाने की जिम्मेवारी सौंप दी. यहां तक कि पुलिस की कार्रवाई में तमाम हिंदूवादी नेता पीटे गए लेकिन उसके बाद भी शिवराज प्रशासन की तारीफ करते नजर आए. गिरिजांशकर कहते हैं, ‘यह मामला अपने आप में बेहद अहम है. आप सोचिए हिंदू-मुस्लिमों के बीच के संघर्ष में पुलिस के हाथों हिंदू नेता पीटे गए और शिवराज को किसी ने कुछ कहा नहीं. ये अपने आप में शिवराज की मजबूत स्थिति की ओर इशारा करता है.’

एक तरफ शिवराज ने राज्य में अपने आप को धीरे-धीरे सबसे ताकतवर और लोकप्रिय बनाया तो दूसरी तरफ दिल्ली दरबार के लोगों की आंखों का भी वे तारा बने हुए हैं. नियमित माथा टेक कर दिल्ली के भाजपा नेताओं को खुश रखने का जितना आक्रामक प्रयास शिवराज ने किया है वैसा शायद ही आज तक भाजपा के किसी और नेता या मुख्यमंत्री ने किया होगा. यही कारण है कि शिवराज के दिल्ली दरबार के सभी लोगों से बेहद मधुर संबंध है. वहां भी कोई इनका विरोधी नहीं है. सबसे पहले आडवाणी को लें. पिछले दो-चार साल का अगर हिसाब लगाया जाए तो शायद मध्य प्रदेश ही वह राज्य है जहां भाजपा के ‘लौह पुरुष’ सर्वाधिक बार गए होंगे. चाहे प्रदेश में कोई सरकारी कार्यक्रम हो या आडवाणी का खुद का कोई निजी कार्यक्रम. हर दो-चार महीने में आडवाणी प्रदेश का एक चक्कर लगा ही आते हैं. आवभगत की स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सहित पूरी सरकार आडवाणी के लिए एक पांव पर खड़ी रहती है. कांग्रेस के एक नेता चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘आडवाणी जी प्रधानमंत्री तो नहीं बन पाए. लेकिन एमपी आकर उन्हें सुपर प्रधानमंत्री टाइप फीलिंग होती है.’

सुषमा स्वराज की बात करें तो जब उनके सामने इस बात का संकट खड़ा हुआ कि कहां से चुनाव लड़ें तो उनकी नजर मध्य प्रदेश पर पड़ी. एमपी में लड़ तो वे कहीं से भी सकती थीं लेकिन प्रश्न जीतने का था. शिवराज ने अपनी लोकसभा सीट विदिशा सुषमा के हवाले कर दी. सीट देने के साथ जीत की बधाई भी दे दी. आज शायद ही कोई ऐसा मंच है जहां उन्हें शिवराज की प्रशंसा करने का मौका मिले और वे ना करें. इन उदाहरणों से अगर आपको लगता है कि दिल्ली को साधने के शिवराज के प्रयास चरम पर हैं तो रुकिए. आडवाणी और सुषमा के बारे में कहा जा सकता है कि उनका एक कद है, बड़े नेता है इसलिए ऐसा किया होगा. सबसे मजेदार मामला तो भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी से जुड़ा हुआ है. हुआ यूं कि गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद से ही विरोधी उन्हें घेरने के लिए कहते कि जो आदमी आज तक पंचायत का चुनाव तक नहीं लड़ा उसको अध्यक्ष बना दिया. तंज कसने वालों में कांग्रेस वाले तो थे ही कुछ भाजपा वाले भी शामिल थे जो इस बात से नाराज थे कि पता नहीं संघ ने किसको उठाकर अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया है. न कोई नाम जानता है न चेहरा पहचानता है.

खैर, गडकरी ने इस बात को दिल पर ले लिया. दूसरी ओर शायद उनके मन में भी पीएम बनने के सपने उमड़ने-घुमड़ने लगे थे. लेकिन फिर वही यक्ष प्रश्न था, कहां से लड़ेंगे तो जीतेंगे. अब अध्यक्ष महोदय के लिए कोई अपनी सीट 2014 में खाली करने वाला दिख नहीं रहा था. दूसरी तरफ नागपुर की सीट संघ मुख्यालय के बावजूद जीतना मुश्किल था. सूत्र बताते हैं कि शिवराज ने गडकरी का मन भांपते हुए उनके कुछ कहने से पहले ही ऑफर दे दिया, ‘मध्य प्रदेश से लड़िए. जीत की गांरटी मैं लूंगा.’ तय हो गया गडकरी को इंदौर से 2014 लोकसभा का चुनाव लड़वाया जाएगा. गडकरी के बाद राजनाथ सिंह अध्यक्ष बने. नए अध्यक्ष से बेहतर संबंध बनाने का प्रयास शिवराज ने पहले दिन से ही शुरू कर दिया. जिस दिन राजनाथ सिंह की राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी हुई, उस कार्यक्रम में शिवराज ही एकमात्र भाजपा मुख्यमंत्री थे जो शामिल हुए थे.

शिवराज की सबको साधने की कला का ही परिणाम है कि आज राष्ट्रीय स्तर पर हर नेता उनकी तारीफ करता हुआ दिखाई देता है. एक तरफ सुषमा गुजरात से मध्य प्रदेश की तुलना करते हुए कहती हैं कि गुजरात सुशासन का मॉडल हो सकता है लेकिन एमपी संवेदनशीलता का मॉडल है तो राजनाथ शिवराज को एक काबिल और ईमानदार मुख्यमंत्री ठहराते हैं. खैर, यह तो भाजपा के नेताओं को साधने की बात थी. शिवराज ने तो राज्य में प्रदेश कांग्रेस और केंद्र की यूपीए सरकार को भी साधने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है. उसके परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं. पिछले साल गुजरात, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश सरकारों ने प्रधानमंत्री कार्यालय से अपने-अपने राज्यों के प्रमुख सचिवों को सेवा विस्तार देने संबंधी अनुरोध किया. गुजरात और तमिलनाडु का अनुरोध नामंजूर कर दिया गया. मध्य प्रदेश के प्रमुख सचिव को सेवा विस्तार मिल गया. जिस तरह से कांग्रेस के नेता भाजपा शासित अन्य राज्यों और नेताओं पर हमलावर रहते हैं, उस अनुपात में शायद ही कोई राष्ट्रीय नेता शिवराज शासित मध्य प्रदेश सरकार की आलोचना करता हुआ आपको दिखाई देगा. केंद्र सरकार के कई मंत्री प्रदेश सरकार की समय-समय पर प्रशंसा करते देखे जा सकते हैं.

राज्य की स्थिति यह है कि प्रदेश कांग्रेस के गिने-चुने नेताओं को छोड़कर बाकी नेता शिवराज को कोई खास घेरते हुए दिखाई नहीं देते हैं. कांतिलाल भूरिया के पहले सुरेश पचौरी जब प्रदेश अध्यक्ष थे तो  कहा जाता था कि शिवराज ने पचौरी को ‘पटा’ लिया है. अनेक राज्यों में जहां स्थिति यह रहती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहते वहीं मध्य प्रदेश में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. तीन साल पहले जब पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का देहांत हुआ था तो शिवराज और पचौरी भी वहां पहुंचे थे. वापसी में शिवराज ने पचौरी से कहा कि कहां आप सड़क के रास्ते से होते हुए भोपाल जाएंगे. मेरे हेलिकॉप्टर में साथ चलिए. तब पचौरी को शिवराज के साथ हंसते-बोलते उड़नखटोले में बैठकर जाते देखकर प्रदेश कांग्रेस के वहां मौजूद कई नेताओं के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा था. जब 2010 में मध्य प्रदेश कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी की मृत्यु के बाद भोपाल स्थित कांग्रेस भवन में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था तो अचानक शिवराज सिंह चौहान वहां पहुंच गए. भाजपा के किसी नेता के कांग्रेस मुख्यालय आने की यह पहली घटना थी और इसलिए भी कि चौहान बिना बुलाए ही वहां पहुंच गए थे. और तो और, तब तक कांग्रेस का भी कोई वरिष्ठ नेता वहां नहीं पहुंचा था.

पिछले साल टाइम पत्रिका ने अपनी कवर स्टोरी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर कहा था. इसके बाद भाजपा की पूरी लीडरशीप मनमोहन पर हमलावर हो गई थी. प्रधानमंत्री पर हमलावर भाजपा और उनका बचाव करने में जुटे कांग्रेसी उस समय चकित रह गए जब भाजपा का ही नेता मनमोहन के बचाव में आ गया. शिवराज सिंह चौहान ने मनमोहन सिंह का बचाव करते हुए कहा, ‘हम अचीवर हैं या अंडरअचीवर इसके लिए हमें किसी विदेशी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है. मनमोहन सिंह पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं, इसलिए सभी को उनका सम्मान करना चाहिए.’ समय-समय पर जहां भाजपा के नेता गांधी-नेहरू परिवार पर लगातार हमले करते रहते हैं वहीं शिवराज ने इससे परहेज किया है. आज तक सोनिया गांधी या राहुल गांधी के खिलाफ उन्होंने कभी कोई अप्रिय टिप्पणी नहीं की है. प्रदेश कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं का काम शिवराज सरकार में जितनी तेजी से होता है उतनी तेजी से तो कांग्रेस के जमाने में भी नहीं होता था. इस आदमी ने कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं को अच्छी तरह से पटा लिया है. वो इनके काम करता है, बदले में ये लोग चुप रहते हैं.’

[box]भाजपा के पास दिल्ली में जो नेता हैं उनमें चुनाव जीतने और जिताने की क्षमता रखने वालों का अभाव है. ऐसी स्थिति में शिवराज वहां मजबूती से उभरेंगे[/box]

विधानसभा से लेकर सड़क तक अगर कांग्रेस के नेता शिवराज सरकार को घेरते भी हैं तो उनके निशाने पर मुख्यमंत्री नहीं बल्कि उनकी सरकार या उसके मंत्री होते हैं. सदन के अंदर कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेता कई बार इस बात को दोहराते हुए पाए गए हैं कि शिवराज तो ईमानदार हैं लेकिन उनकी सरकार भ्रष्ट है. 2011 में जब कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था तो उस समय नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने विधानसभा में सरकार को घेरते हुए जो भाषण दिया उसकी शुरुआत ही उन्होंने शिवराज की अच्छाइयां गिनाते हुए की. उनके शुरुआती भाषण को सुनकर ऐसा लगा मानो एक दोस्त दूसरे दोस्त को संबोधित कर रहा हो. इस तरह की स्थिति शायद ही आपको कहीं दिखाई दे जब विपक्ष सरकार पर हमला करते समय यह ध्यान भी रखता हो कि कहीं सीएम को चोट न लग जाए.

भले ही मोदी ने बहुत तेजी से कॉरपोरेट जगत को अपना मुरीद बना लिया है लेकिन इस मामले में शिवराज ने भी काफी प्रयास किया है. राज्य में हर साल होने वाली निवेश बैठकों से राज्य में कितना निवेश, विकास और रोजगार सृजन होता है यह अध्ययन का मामला है लेकिन इनसे शिवराज ने अपनी छवि उद्योग जगत में चमकाने की कोशिश जरूर की है. यही कारण है कि जब प्रदेश भाजपा के नेताओं से इस संबंध में बात होती है तो वे अनिल अंबानी की उस बात का जिक्र करने के बाद अपनी बात शुरू करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था, ‘मुझे शिवराज सिंह चौहान में अपने पिता जैसी दूरदृष्टि दिखाई देती है.’ शिवराज के इन्हीं व्यक्तिगत, राजनीतिक और कूटनीतिक गुणों के कारण उस संभावना और चर्चा का जन्म होता है कि वे 2014 में भाजपा के सत्ता में आने पर उसके नेतृत्व वाली सरकार में प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से गठबंधन की राजनीति का आज दौर है उसमें शिवराज सबसे फिट नजर आते हैं. वे कुछ उसी तरह के सेक्युलर और लिबरल हैं जिस तरह संघ के स्वयंसेवक होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी हुआ करते थे. जिस तरह की समस्या मोदी को प्रोजेक्ट करने में आ रही है या आ सकती है, वह शिवराज के साथ नहीं है. वे सभी को स्वीकार्य होंगे. और दूसरी तरफ आडवाणी जिस एनडीए के विस्तार की बात कर रहे हैं वह शिवराज जैसे व्यक्ति के टॉप पर होने के कारण संभव हो सकता है. रशीद कहते हैं, ‘ देखिए, इसे दो तरह से देखे जाने की जरूरत है. मान लीजिए अगर पार्टी मोदी को आगे लाती है तो ये संभव है कि वो उसकी कुछ सीटें बढ़वा दें. लेकिन वो बढ़ी हुई सीटें इतनी नहीं होंगी कि उनके दम पर 272 के पार पहुंचा जा सकता हो. वहीं दूसरी तरफ अगर शिवराज सामने आते हैं तो ये बिल्कुल संभव है कि पार्टी की अपनी सीटें ना बढ़ें लेकिन शिवराज के नेतृत्व के कारण उसे 272 के पार पहुंचाने के लिए अनेक राजनीतिक दल अपना हाथ भाजपा की ओर बढ़ाने के लिए जरूर तैयार दिखाई देंगे.’

जानकार मानते हैं कि शिवराज नवीन, नीतीश, जयललिता, ममता आदि समेत सभी गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी नेताओं को स्वीकार्य होंगे. मोदी की तरह किसी को शिवराज से आपत्ति नहीं होगी. वे किसी के लिए अछूत नहीं हैं. कैलाश जोशी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पार्टी ऐसे ही व्यक्ति को बतौर पीएम आगे बढ़ाएगी जिस पर घटक दलों की भी सहमति हो. शिवराज के पक्ष में दूसरी बात यह जा सकती है कि मध्य प्रदेश भाजपा के उन गिने-चुने राज्यों में शुमार हो गया है जहां सरकार बिना किसी अस्थिरता के चल रही है. राज्य में ऐसा नहीं कि विकास का कोई आंदोलन खड़ा हो गया हो. अब भी यहां पिछड़ापन है, भुखमरी है, कुपोषण है, महिलाओं के प्रति हिंसा की घटनाएं आए दिन अखबारों में आती रहती हैं, भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले पिछले कुछ समय में सामने आए हैं लेकिन इसके बाद भी शिवराज को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने पूर्व की कांग्रेस सरकार से कई गुना बेहतर काम किया है. गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘चाहे रोड, बिजली, पानी का मामला हो या कृषि का, शिवराज के शासन में हर क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार हुआ है. यही कारण है कि आज कांग्रेस का प्रधानमंत्री भी एमपी को बीमारू राज्य नहीं मानता.’ हाल ही में राष्ट्रपति की तरफ से मध्य प्रदेश को कृषि क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए कृषि कर्मण अवॉर्ड दिया गया. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि एमपी में सब कुछ अच्छा हो गया है, लेकिन हां आपको शिवराज सिंह की इस बात के लिए प्रशंसा जरूर करनी होगी कि उन्होंने एक शुरुआत की है, जो धीरे-धीरे रंग ला रही है.’

राज्य में चलाई जा रही दर्जनों योजनाओं को दूसरे राज्यों ने कॉपी किया है. ऐसे में भाजपा के लिए मध्य प्रदेश भी एक मॉडल के रूप में उभर रहा है. एक ऐसा मॉडल जो गांव और गरीबों से मिलकर बना है. इस तरह से भाजपा के पास गुजरात के बाद दूसरा मॉडल मध्य प्रदेश का हो सकता है. शिवराज को लेकर संघ का रुख भी उनका सबसे मजबूत पक्ष है. जानकार कहते हैं कि शिवराज के साथ संघ का समर्थन इस कारण तो रहेगा ही कि वे उसके एजेंडे को लगातार आगे बढ़ाते हैं, उसे शिवराज इसलिए भी प्रिय हैं क्योंकि संघ को पता है यह आदमी बहुत आगे बढ़ जाने पर भी कभी अकड़ नहीं दिखाएगा. उनकी हमेशा सुनता रहेगा. संघ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि संघ शिवराज सिंह चौहान को दूसरे वाजपेयी के रूप में तैयार करना चाहता है. इससे संघ अपने दो हित साधने की सोच रहा है. पहला- शिवराज के रूप में उसे मोदी की एक काट मिल जाएगी. जिनके बढ़ते कद से संघ खुद परेशान है. दूसरा शिवराज संघ का स्वयंसेवक और उसका आज्ञाकारी होने के साथ ही चुनावी राजनीति में घटक दलों को भी स्वीकार्य रहेंगे जिससे सत्ता में आने की संभावना बनी रहेगी.

इन्हीं वजहों से भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को भी शिवराज स्वीकार्य हो सकते हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं,  ‘मोदी जी का व्यक्तित्व और काम करने का तरीका ऐसा है जिससे सभी भयभीत रहते हैं. सबको लगता है कि अगर ये आदमी टॉप पर आया तो किसी की नहीं सुनेगा. अगर वो पीएम बने तो सब कुछ वहीं रहेंगे. ऐसे में बाकी नेताओं का हाल गुजरात के मंत्रियों और वहां के अन्य नेताओं जैसा ही हो जाएगा. लेकिन शिवराज जी के साथ ऐसा नहीं है.’ शिवराज के पीएम रेस में सफल होने की एक और परिस्थिति का उदाहरण देते हुए रशीद कहते हैं, ‘ये बिलकुल संभव और स्वाभाविक है कि भाजपा के दिल्ली वाले नेता शुरुआत में तो खुद को पीएम बनवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दें, लेकिन अगर वो अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाते हैं तो उनके बीच सोनिया गांधी बनने की होड़ लग जाएगी. सब त्याग की मूर्ति बन किंगमेकर बनना चाहेंगे. और ऐसी स्थिति में शिवराज उनकी पहली पसंद होंगे.’

शिवराज के डार्क हॉर्स साबित होने संबंधी प्रश्न के जवाब में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान मंत्रिमंडल में सबसे वरिष्ठ बाबूलाल गौर कहते है, ‘सबसे पहला अधिकार पीएम पद पर आडवाणी जी का है. वो बाकी लोगों से हर मामले में बेहतर हैं. राज्य में हमारी सरकार बहुत अच्छी चल रही है. अगली बार भी हम शिवराज जी के नेतृत्व में विधानसभा जीतेंगे. उसके बाद ही बाकी चीजें देखी जाएंगी.’ जानकार भी मानते हैं कि शिवराज सिंह के पीएम पद का दावेदार होने या न होने का मामला आगामी प्रदेश विधानसभा परिणामों पर काफी हद तक निर्भर करेगा. दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक मनीष दीक्षित कहते हैं, ‘अगर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह अगली बार फिर से जीत कर आ जाते हैं तो ऐसी स्थिति में मोदी की बराबरी में खड़े हो जाएंगे. फिर इनके पीएम पद का दावेदार बनने से इनकार नहीं किया जा सकता.’

राजनीतिक पंडितों का ऐसा भी आकलन है कि शिवराज के दिल्ली आने की स्थिति में उनका मजबूत होना तय है क्योंकि भाजपा के पास दिल्ली में जो राष्ट्रीय नेता हैं उनमें चुनाव जीतने और जिताने की क्षमता रखने वालों का बेहद अभाव है. ऐसी स्थिति में शिवराज वहां मजबूती से उभरेंगे. गिरिजाशंकर कहते हैं, ‘आडवाणी और सुषमा की जो भी सभाएं आजकल होती हैं वो भाजपा शासित राज्यों में ही होती हैं. आडवाणी का पहले वाला करिश्मा रहा नहीं. ये उन्हें खुद भी अपनी पिछली रथ यात्रा से पता चल गया होगा. दूसरी तरफ सुषमा की स्थिति ये है कि उन्हें अपने आप को लोकसभा पहुंचाने में बेहद मशक्कत करनी पड़ रही है. पूरी पार्टी को वो कैसे लोकसभा पहुंचाएंगी. जेटली राज्य सभा वाले हैं और राजनाथ का अपने ही राज्य में कोई जनाधार नहीं रहा. मोदी आज सिर्फ इस कारण से दबाव बना पा रहे हैं क्योंकि वो लगातार चुनाव जीत कर आ रहे हैं. यही ताकत शिवराज भी आगामी विधानसभा जीत कर हासिल कर लेंगे.’

खैर, शिवराज प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनते हैं या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन एक चीज स्पष्ट है कि अगर उन्होंने अपनी राजनीति और व्यवहार की गति और दिशा यही बनाए रखी तो निश्चित तौर पर वे आने वाले समय में भाजपा के उन-गिने चुने चेहरों में शामिल होंगे जिन पर भाजपा का भविष्य निर्भर होगा.

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